पिछले डेढ़ साल की कोराना महामारी की अफरातफरी और लगभग कैदी जीवन के बीच पिछले हफ्ते हमने स्याही देवी की यात्रा करने की योजना बनाई. इस ट्रेक का प्रस्ताव गीता (पत्नी) की ओर से आया था. चूंकि उसे छोड़कर बाकी सभी लोग दो बार स्याही देवी की यात्रा कर आए थे, इसलिए इस बार हमारे पास टाल-मटोल करने की कोई गुंजाइश नहीं थी. अभिज्ञान, 8 वर्षीय बेटा, जो अब पहाड़ की संस्कृति में पूरी तरह से रच-बस गया है, किसी भी चढ़ाई के लिए तैयार रहता है, ने भी इस यात्रा के लिए भरपूर उत्साह दिखाया. जल्द ही हम इसकी तैयारी में लग गए. (Syahi Devi Temple Track)
16 अगस्त सुबह दस बजे हम शीतलाखेत के लिए चल पड़े. मजखाली से शीतलाखेत पहुंचने में सिर्फ 1 घंटा लगता है. हां पर कठपुड़िया से शीतलाखेत की लगभग 10 कि.मी की ड्राइव काफी जोखिम भरी है. कई जगह सड़क एक पहाड़ी रिज में बदल जाती है. सर्पीली और बेहद संकरी सड़क के दोनों ओर आपके बाएं-दाएं सैकड़ों फीट गहरी खाई देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
यूं तो शीतलाखेत को कुमाऊं के कुछ सबसे ऊंचे और ठंडे हिल स्टेशनों में एक माना जाता है, पर स्याही देवी मंदिर का इलाका इन सभी पर भारी पड़ता है. स्याही देवी मंदिर कत्यूर राजाओं द्वारा निर्मित एक प्रसिद्ध मंदिर है. इस मंदिर की ख़ास बात यह है कि इसे एक ही रात में बनाया गया था. हर साल हजारों लोग यहां दर्शन करने आते हैं. इस मंदिर की प्राचीनता और यहां के वातावरण की शांति आपके ऊपर इस कदर हावी हो जाती है कि आप एक पल के लिए अपना सुधबुध खो बैठेंगे. 132 वर्ष पहले सन 1898 में स्वामी विवेकानंद ने भी यहां की यात्रा की थी.
स्याही देवी का ट्रेक शुरु होता है शीतलाखेत से, जो लगभग 3 कि.मी लंबा ट्रेक है. ट्रेक शुरु करने से पूर्व हमने घर से लाया खाना चट कर लेना उचित समझा, उससे बैग का वजन भी हल्का हो जाता और एक-डेढ़ घंटे की चढ़ाई के लायक ताकत भी आ जाती. खाने के बाद 10 मिनट आराम करने के बाद हम चार लोग स्याही देवी की चढ़ाई पर चल निकले. आइए स्याही देवी मंदिर के इस रोमांचक और दिलकश ट्रेक को हम तस्वीरों के जरिए तय करते हैं.
ट्रेक के बेस पर पानी की मंद-मंद खलखलाहट ने हमारा ध्यान अपनी ओर खींचा. आवाज की दिशा में जाकर देखा तो पाया एक निर्मल जल-धारा अविचल बह रही थी. पहाड़ के लोगों के लिए ये जल-स्रोत ही उनके पेय-जल की मुख्य प्रणाली होती है, इसलिए अमूमन पहाड़ के लोग अपनी जल-धारा, स्रोत या नौले (पानी की छोटी सी बावड़ी जैसी संरचना) को प्रदूषित नहीं करते. इस जल को न छानने और न ही साफ करने की जरूरत पड़ती है. हां, पर मीठे जल के ये स्रोत बारिश में थोड़े गंदले हो जाते हैं, तब लोग इस पानी को उबाल कर या छानकर पीते हैं.
यदि आपको पहाड़ लुभाते हैं और आप प्रकृति की गोद में पैदल चलने के शौकीन हैं, तो अल्मोड़ा जिले के एक पर्वत शिखर पर स्थित स्याही देवी मंदिर आपके लिए एक दिलकश पर्यटन स्थल हो सकता है.
कई दिनों की लगातार बारिश के बाद आज मौसम ने हमारा साथ दिया था. खिली धूप के बीच पर्वत की शीतल हवा ने भी खूब अठखेलियां खेलीं. वर्ना बारिश के बाद फिसलन भरे रास्ते में दुर्घटना होने का डर बना रहता है.
घने जंगलों से होकर गुजरने वाले इस ट्रेक में हमें कई विहंगम दृश्य दिखाई पड़े. पहाड़ के घर हमेशा मुझे पहाड़ पर अटके-से दिखाई पड़ते हैं. इन घरों को बनाने में राजमिस्त्री के साथ परिवार के सभी सदस्य हाथ बटाते हैं. दुर्गम पहाड़ों पर कड़ी मेहनत से बने ये घर सैंकड़ों सालों तक सही-सलामत रहते हैं, परिवार के कई पीढ़ियों को बचपन से लेकर बूढ़े होते देखते हैं. इसलिए ये घर मानव की लंबी गहरी यादें संजोए रहती हैं. शायद इसलिए पहाड़ के लोग अपने पुश्तैनी घरों से ताउम्र लगाव महसूस करते हैं.
कुमाऊं हिमालय के सूखे मौसम और चीड़ के पेड़ों की बहुतायत के कारण उत्तराखंड के इस मंडल के जंगलों में आसानी से आग भड़क जाती है. हर साल सर्दियों के ठीक बाद से लेकर लगभग अप्रैल-मई तक आग लगने की घटना ज्यादा देखी जाती है. लाखों हेक्टेयर वनसंपदा आग की चपेट में आ जाती है.
बांझ के घने जंगलों से होकर गुजरने वाले पथरीले रास्ते से दिखने वाली नीली-स्लेटी पर्वत श्रृंखलाएं आपका मन मोह लेंगी.
आज कुमाऊं पर्वत मंडल के कई घर सूने पड़े हैं और दशकों से अपने बाल-बच्चों के वापस लौट आने की प्रतीक्षा में बूढ़े होते जा रहे हैं. इस स्याही देवी के ट्रेक में भी आपको कुछ घर दिखाई पड़ते हैं, पर सुखद बात है कि वे लोगों और परिवारों से आबाद दिखते हैं. ट्रेक से सटे एक घर के पास जाकर हम रुके लोगों से मिले और पानी पिया. नौले के अमृत तुल्य शीतल जल से हमारी थकावट दूर हो गई.
रास्ते में हम कई स्थानों पर रुके और विराम किया. रास्ते में जोरों की प्यास लग आई. साथ का पानी खत्म हो चुका था. ख़ैर जल्द की समीप के एक घर में जाकर हमने अपनी प्यास बुझाई.
लगभग डेढ़ घंटे की चढ़ाई के बाद हम दोपहर लगभग साढ़े बारह बजे हम स्याही देवी मंदिर पहुंचे. यह मंदिर लगभग 7100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. सर्दियों के दिन में इसके परिसर में बर्फ़ की सफ़ेद चादर बिछ जाती है. ट्रेक पर बर्फ़ जमने से यह काफी जोखिमभरा हो जाता है. आम ट्रेकरों के लिए जाड़े में इसका ट्रेक बंद हो जाता है. लगभग 900 साल पुराने इस मंदिर को कत्यूर शासक ने एक रात में तैयार किया था.)
मां कात्यायनी के अति प्राचीन मंदिर के साथ-साथ यह स्थल स्वामी विवेकानंद से भी जुड़ा है. दरअसल वर्ष 1898 में जब स्वामी विवेकानंद अल्मोड़ा आए थे तो कुछ दिनों के लिए स्वाही देवी पर्वत की एक कंदरा में एकांतवास और तप किया था.
कैसे पहुंचें:
स्याही देवी पहुंचने के लिए आप शीतलाखेत पहुंचें. अगर शीतलाखेत में ठहरना चाहें तो आपको यहां कई होम स्टे मिल जाएंगे, जहां आप सुविधाजनक रूप से ठहर सकते हैं. यहां कुमाऊं मंडल विकास निगम का भी होटल है. स्याही देवी के घने वन से घिरे पर्वत शिखर के लिए ट्रेक और कैम्पिंग का आनंद उठा सकते हैं. (Syahi Devi Temple Track)
मूल रूप से बेंगलूरु के रहने वाले सुमित सिंह का दिमाग अनुवाद में रमता है तो दिल हिमालय के प्रेम में पगा है. दुनिया भर के अनुवादकों के साथ अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद के वैश्विक प्लेटफार्म www.translinguaglobal.com का संचालन करते हैं. फिलहाल हिमालय के सम्मोहन में उत्तराखण्ड की निरंतर यात्रा कर रहे हैं और मजखाली, रानीखेत में रहते हैं.
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