फोटो: सुधीर कुमार
यह शोध हमारे विश्वविद्यालय में वनस्पति-विज्ञान के प्रोफ़ेसर साहब ने किया था. हिंदी समाज के आम प्राध्यापक की तरह वो एकेडेमिक विषयों पर हिंदी में बोलने में संकोच करते थे, जब मज़बूरी हुई तब भी दो-चार वाक्य हिंदी में बोलने के बाद अंग्रेजी में शिफ्ट कर जाते थे. अपनी इसी खासियत की वजह से वो हम लोगों के बीच से पहले वाईस-चांसलर बने. मगर मेरी जिज्ञासा वो कभी नहीं शांत कर पाए; जब मैंने पूछा कि ‘कुटज’ का बोटेनिकल नाम क्या है, वो बोले थे, देखना पड़ेगा, उन्होंने यह नाम कभी सुना नहीं.
(Nainital Article by Batrohi)
असल में नैनीताल की पहचान उसकी झील के कारण है; अगर वो न हो तो शायद इस शहर का अस्तित्व ही नहीं होता. हमें याद है, जब उनके शोध की सूचना एक अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुई, चारों ओर तहलका मच गया था और उस साल नैनीताल में पर्यटकों की आमद एक चौथाई भी नहीं रह गई थी. हम जैसे कुछ कल्पनाशील लोगों को यह कीड़ा पाताल लोक से पृथ्वी में घुसा ऐसा विषाणु लगा था जो समय-समय पर आकर यहाँ के लोगों के दिमाग को कुतर कर अव्यवस्थित कर जाता है. हालाँकि जिन दिनों हम ये अनुमान लगा रहे थे, तब इस वायरस की खोज नहीं हुई थी, मगर इस नयी खोज के बाद हमें अपने अनुमान पर यकीन होता चला गया था.
हम लोगों ने 1966 में एक साथ पोस्ट-ग्रेजुएशन किया था, वह एम. एससी करने के फ़ौरन बाद प्राध्यापक लग गए थे और हम सालों तक ठोकर खाते रहे. उनकी इस असाधारण मेधा के कारण ही हम उनकी बातों पर सवाल उठाने की हिम्मत नहीं करते थे और उनकी गिनती संसार के बड़े पादप-विज्ञानियों में करने लगे थे.
छोटे-से कस्बानुमा इस शहर में उन दिनों हम दो जिगरी दोस्त थे, मैं और नंदकिशोर भगत. मेरी तरह भाषा और साहित्य की दुनिया में जीने वाला भगत भाषा के नए प्रयोगों में विश्वास करता था और अनेक तरह की शरारतें करता रहता. मगर मेरे इलाहाबाद जाने के बाद उसकी दुनिया छोटी-सी रह गई थी हालाँकि शब्दों की बाजीगरी का उसका शौक बना रहा.
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इलाहाबाद से लौटने के बाद मैं तो कॉलेज में लग गया मगर वो पहले ही जंगलात दफ्तर में बाबू लग चुका था. उन्हीं दिनों पिलानी में बिरला इंजीनियरिंग संस्थान को बसाकर वापस लौटे पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रिय शिष्य मशहूर गणितज्ञ शुकदेव पांडे नैनीताल के अपने घर ‘दीना कॉटेज’ में आ बसे थे. मेरा अस्थायी घर भी वहीं पर था. एक दिन उन्होंने मुझे सुझाया कि राजस्थान में जिस प्रकार वह वहां की संस्कृति पर केन्द्रित पत्रिका ‘मरु भारती’ निकलते थे, मुझे यहाँ से भी एक पत्रिका निकालनी चाहिए. पत्रिका के प्रकाशन का खर्च वो खुद वहन करेंगे. हम लोगों ने मिलकर ‘उत्तराखंड भारती’ नाम तय किया और पंजीकरण के लिए आवेदन भेज दिया.
पांच या सात अंक निकल पाए थे कि एक दिन शुकदेवजी ने मुझे बुलाया और कहा कि प्रकाशक के रूप में मैं उसमें नंदकिशोर भगत का नाम लिखना शुरू कर दूं. पत्रिका में प्रकाशक के रूप में मेरी पत्नी का नाम जा रहा था और हम दोनों मिलकर अपने ही घर में सम्पादकीय कार्यालय स्थापित करके जी-जान से जुटे हुए थे. कभी किसी ने प्रकाशक के रूप में मेरी पत्नी के नाम को लेकर ऐतराज़ नहीं किया था. पत्रिका के मुद्रण व्यय के अलावा बाकी सारा खर्च मैं ही उठा रहा था; अलबत्ता पत्रिका शुकदेवजी की संस्था ‘उत्तराखंड सेवा निधि’ के बैनर तले प्रकाशित होती थी.
बहुत बाद में मुझे पता चला की भगत का दीना कॉटेज में इस बीच आना-जाना बढ़ गया था, मैंने ही उसका परिचय शुकदेव जी से करवाया और उसके भाषा-कौशल की तारीफ की थी. शुकदेवजी के सुझाव को टाला नहीं जा सकता था, इसलिए प्रकाशक के रूप में उसका नाम जाने लगा. भगत के नाम के साथ एक और अंक निकला, मगर इस बीच शुकदेवजी की बातचीत कुमाऊँ विश्वविद्यालय के साथ हुई और उसे विवि को दे दिया गया, अलबत्ता संपादक मैं ही बना रहा.
अच्छी बात यह रही कि भगत की प्रतिभा को नैनीताल से ही प्रकाशित होने वाली पाक्षिक पत्रिका ‘नैनीताल समाचार’ के कॉलम ‘सौल कठौल’ में पहचान मिली. प्रकाशन की शुरुआत से ही ‘सौल कठौल’ इतना लोकप्रिय हुआ कि वह अख़बार की शैली बन गया. वाक्य के अंत में संगीत के टेक की तरह ‘बल’ का प्रयोग इतना हिट हुआ कि इलाके के तमाम युवाओं के द्वारा अपनी बातचीत, पत्रों और बाद में व्हाट्स ऐप में प्रयोग किया जाने लगा.
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शायद यह संयोग ही रहा होगा कि मनोहरश्याम जोशी ने अपने उपन्यास ‘कसप’ में ‘कुमाऊनी-हिंदी’ शीर्षक से जो भूमिका लिखी है, उसमें इसी शैली को अपनाया गया है. इससे भी रोचक संयोग यह है कि सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर केन्द्रित बॉलीवुड फिल्म ‘बत्ती गुल, मीटर चालू’ में नायक शाहिद कपूर (एसके पन्त), नायिका श्रद्धा कपूर (ललिता नौटियाल), सुष्मिता मुखर्जी (न्यायाधीश), फरीदा जलाल, सुधीर पांडे आदि सारे चरित्र इसी भाषा में संवाद बोलते हैं और यह शैली कुमाऊनी-गढ़वाली संवादों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने वाली पहली अभिव्यक्ति बनी. स्थानीयता को सहज-स्वाभाविक रूप में उजागर करने वाली आत्मीय संरचना.
यह भी एक संयोग ही रहा होगा कि उत्तराखंडी सरोकारों पर केन्द्रित पहली पत्रिका ‘उत्तराखंड भारती’ की ही थीम पर नैनीताल के दो उत्साही लेखकों पुष्पेश पन्त और शेखर पाठक ने एक पत्रिका ‘पहाड़’ का प्रकाशन नैनीताल से शुरू किया. पुष्पेश तो खाना-खज़ाने की अपनी स्वादिष्ट दुनिया में शिफ्ट कर गए, मगर शेखर पाठक ने अपनी अद्भुत मेहनत से इसे एक ज़रूरी पत्रिका के रूप में खड़ा कर डाला. आज इस पत्रिका का कोई विकल्प नहीं है; उसका एक मजबूत संपादक-मंडल और अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ लेखकों का प्रतिबद्ध पाठक-समूह है.
मतलब यह कि तीनों जगहों पर इसके आरंभकर्ताओं का परिश्रम हाशिये में चला गया. ऐसा मैं शिकायत के लहजे में नहीं लिख रहा, प्रतिभाओं को कोई रोक तो सकता नहीं, फिर भी बार-बार अहसास होता है कि ऐसा क्या था जो इन पत्रिकाओं के आरंभकर्ता की कोशिश से छूट गया? ‘उत्तराखंड भारती’ तो कब की अतीत बन चुकी है, ‘नैनीताल समाचार’ की छवि में भी उसके संपादक-प्रकाशक/कॉलम लेखक का न चेहरा उभरता और न नाम. पूर्वार्द्ध में वहां भी शेखर पाठक का रचनाकार सामने आता है और उत्तरार्द्ध में गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का जो निस्संदेह उत्तराखंड के निर्विवाद मजबूत स्तम्भ हैं. बाकी खम्बे भी मौजूद होते तो क्या बात थी! लेकिन वे नहीं हैं तो भी क्या किया जा सकता है? जो मौजूद हैं, काम तो उसी से चलाना है, यही वक़्त का तकाज़ा है.
(Nainital Article by Batrohi)
हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन.
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