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पाण्डवाज़ की फिल्म ‘यकुलाँस’ भारतीय सिनेमा के लिये एक सम्मान है

अगर आप केवल टी-शर्ट में ‘पहाड़ी’ लिखकर तनकर चलने वाले पहाड़ियों में हैं तो ‘यकुलाँस’ का पहला मिनट उत्साह से देखने के बाद आपके मन में क्या है? क्यों हैं? फ़ॉरवर्ड करके देखो तो, गाना सिंक नहीं कर रहा है, खाली बना दिया जैसे कई सवाल-जवाब आने लाजमी हैं. हां अगर आपके भीतर पहाड़ के जीवन का जरा सा हिस्सा भी बांकी है तो ‘यकुलाँस’ के पहले 18 मिनट में पहाड़ के दैनिक जीवन के संघर्ष का संगीत है. बिना पहाड़ में रहे कभी सांसों के उस संगीत को महसूस नहीं किया जा सकता जो हल उठाने में लगे जोर से बनता है या फिर स्वेटर खोलने में साँसों के उतार चढ़ाव से. लकड़ी पर की जाने वाली कुल्हाड़ी की चोट से ज्यादा फोन पर ‘हैलो’ की आवाज कैसे चीरती है इसे महसूस वही कर सकता है जिसके भीतर पहाड़ बचा हो. धार में जानवरों को ले जाते समय होंठों से निकाले जानी वाली आवाज, रेडियो पर आने वाली खर-खर के साथ आने वाले गीत, चढ़ाई चढ़ने में क़दमों की आवाज, चिड़िया, बकरी, जानवरों की घंटी और नदी व हवा की आवाज, यही तो हमारे पहाड़ों में बचा हुआ अजर संगीत है. पहाड़ के दैनिक जीवन के संगीत की एक मजबूत भूमिका पर शुरु होती है पाण्डवाज़ की फिल्म ‘यकुलाँस’.
(Pandavaas Yakulaans Review)

यहां ‘यकुलाँस’ को शार्ट फिल्म न कहकर फिल्म कहना समझदारी है क्योंकि यह एक नई दुनिया की सैर कराती है. पाण्डवाज़ की फिल्म ‘यकुलाँस’ उनकी टाइम मशीन सीरीज की चौथी वीडियो है जिसे भारतीय सिनेमा के लिये एक सम्मान कहा जा सकता है. फ्यूजन या फोक के नाम पर जो कुछ भी भारत में परोसा जा रहा है उसके सामने पाण्डवाज़ की फिल्म ‘यकुलाँस’ एक नज़ीर पेश करती है. उम्मीद तो यही की जानी चाहिये कि सिनेमा की समझ रखने वाले लोग इस फिल्म को उसका वाज़िब सम्मान जरुर देंगे. भोजपुरी और पंजाबी सिनेमा की ओर लगातार ढलते जा रहे उत्तराखंड के कलाकारों के लिये तो यह फिल्म एक जरुरी अध्याय है जिसका उन्हें बारीकी से अध्ययन कर काम करने का सलीका सीखना चाहिये.

‘यकुलाँस’ फिल्म के लिये तकनीकी भाषा में कई सारे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है पर आम भाषा में कहा जाये तो ‘यकुलाँस’ पहाड़ में रहने वाले एक आम पहाड़ी पिता की कहानी है. एक ऐसी कहानी जो हमारे अपने घर में हर रोज घट रही है या घट चुकी और जिससे मुंह मोड़कर या आँखें मूंदकर हम सभी बड़े-बड़े शहरों में बैठे हैं. ‘यकुलाँस’ की कहानी का अंत वैसा ही है जैसा हम अपने पिता के लिये चाहते हैं.   
(Pandavaas Yakulaans Review)

अगर जीवन को लेकर जरा सी समझ है तो समय निकालकर ‘यकुलाँस’ को देखा जाना चाहिये. फिल्म का संगीत महसूस करने के लिये यह फिल्म दर्शक के भीतर पहाड़ के जीवन की एक सामान्य समझ की जरूरत मांगती है. पाण्डवाज़ की टीम कुछ जगहों पर सब टाइटल्स का प्रयोग कर दर्शकों के लिये इसे और आसान जरुर कर सकती थी.   

28 मिनट में उच्च हिमालय के जीवन को इस संजीदगी से पेश करने के लिये पाण्डवाज़ की टीम बधाई की तो पात्र है ही साथ में उनके इस साहस के लिये पूरी टीम की सरहाना की जानी चाहिये. 28 मिनट को समेटने में लगे तीन वर्षों की इस मेहनत पर फिल्म के निर्देशक कुणाल डोभाल के साथ एक लम्बी बातचीत काफल ट्री जल्द प्रकाशित करेगा. फ़िलहाल तो केवल इस संगीत में खोने का समय है:
(Pandavaas Yakulaans Review)

काफल ट्री डेस्क

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