समाज

जब ‘सुल्ताना डाकू’ पर भरोसा कर हल्द्वानी के लाला ने उसे अपनी तिजोरी की चाबी दे दी

कहा जाता है कि पुराने जमाने में भाबर के इस इलाके में डकैतों के भी अड्डे हुआ करते थे. सुल्ताना डाकू, जिसका वर्णन कॉर्बेट ने अपनी किताब में किया है, को यहाँ हल्द्वानी मुखानी या लामाचौड़ में गिरफ्तार किया गया था. प्यारे खां, रुस्तम खां का नाम भी यहाँ के डाकुओं में आता है.
(Sultana Daku in Haldwani)

सुल्ताना ठिगने कद का, गठीले बदन का डाकू था. उसके मन में गरीबों के लिए हमदर्दी थी. उसने कभी किसी दुर्बल व्यक्ति से पैसा नहीं छीना. वह गरीबों, असहायों की मदद भी किया करता था. गरीबों के घरों की लड़कियों के विवाह में मदद किया करता था और महिलाओं का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं कर सकता था.

कहा जाता है कि एक बार उसके दल का डाकू किसी नवविवाहिता को उठा लाया था जिसे उसने उपहार देकर ससम्मान घर भिजवाया और डाकू को कड़ा दंड भी दिया. इसलिए जगह-जगह उसके विश्वासपात्र खबरी हुआ करते थे. उनकी मदद से वह चालाकी से अपनी गिरफ्तारी से बच जाता था. उसका आतंक न सिर्फ तराई के इस क्षेत्र में था बल्कि वह अन्य प्रान्तों में भी डाके डाला करता था.

सुल्ताना के बढ़ते आतंक के कारण तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर पारसी विंढम के अनुरोध पर 300 चुने हुए पुलिसकर्मियों के साथ सरकार ने एक विशेष डाकू निरोधक दस्ता भेजा. यह दल तराई भाबर के पुलिस सुपरिटेंडेंट फ्रेड एन्डरसन (फ्रेडी यंग) के मातहत सुल्ताना को पकड़ने का प्रयास एक लम्बे समय तक करता रहा. जिम कॉर्बेट ने अपनी पुस्तक में सुल्ताना डाकू के विषय में बहुत कुछ लिखा है. कॉर्बेट सुल्ताना डाकू को पकड़ने वाले दल में भी थे.
(Sultana Daku in Haldwani)

सुल्ताना ने वर्तमान होतीलाल-गिरधारीलाल फार्म के तत्कालीन मालिक लाला रतनलाल के वहां चिट्ठी भिजवाकर 20000 रुपये की मांग कर डाली. उस समय हल्द्वानी में मोहल्ले के लोग सड़क में चारपाई लगाकर सो जाया करते थे. चिट्ठी भेजने के बाद स्वयं सुल्ताना ही आ पहुंचा और लाला से तिजोरी की चाभी मांगी. सड़क पर लगी चारपाई पर लेटे लाला ने सुल्ताना को चाभी दे दी. सुल्ताना ने तिजोरी खोली तो वह आश्चर्य से भर गया क्योंकि तिजोरी में बेशुमार धन था.

सुल्ताना ने लाला से बोला कि ‘मैंने तो सिर्फ 20000 रुपये की मांग की थी फिर मुझे चाभी क्यों दी’ तब लाला ने कहा तुम्हारी जुबान पर भरोसा है तुम 20000 से ज्यादा नहीं लोगे. इसके बाद सुल्ताना बगैर पैसा लिए ही लौट गया. लेकिन लाला ने उस पैसे से मथुरा में कुंए खुदवाए, धर्मशालाएं बनवायीं. उसी पैसे से एमबी स्कूल के लिए भी जमीन ली गयी.
(Sultana Daku in Haldwani)

स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी- स्मृतियों के झरोखे से’ के आधार पर.

इसे भी पढ़ें : बाबूराम ने इस तरह हल्द्वानी के एमबी कॉलेज की बुनियाद रखी

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

हिमालय के गुमनाम नायक की कहानी

इस तस्वीर में आपको दिख रहे हैं "पंडित नैन सिंह रावत" — 19वीं सदी के उन महान…

2 weeks ago

भारतीय परम्परा और धरती मां

हमारी भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही मां कह कर पुकारा गया है. ‘माता…

2 weeks ago

एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के…

3 weeks ago

बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान

संसार मिथ्या और जीवन भ्रम है, मनुष्य का मानना है वह जीवों में श्रेष्ठ व बुद्धिमान…

3 weeks ago

शकटाल का प्रतिशोध

पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र…

3 weeks ago

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 months ago