समाज

सावन के महीने शिव और कृष्ण के प्यारे साँप और नाग

साँप-सर्प, नाग-अजगर का नाम सुनते ही बदन में सिहरन और दिमाग में बैठा डर घनीभूत हो जाता है. जानकार कहते हैं कि सर्प तो बड़ा शर्मीला होता है. आदमजात को देखते ही लुकने- छिपने-सरक जाने की जुगाड़ करने लगता है. जंगल में खेतों में घास काटती आमा-ब्वारी-चेली की तेज दराती में कई बार घास के साथ हरे साँप भी कट जाते हैं. आमा बताती थी ये हरा वाला तो होता है काना, आँख कहाँ देखता है? बस्स पड़ा रहेगा.भेकाने और मुस चौपट करता है. खटपट सुने तभी लहराता है. पर भोत ज्यादा विष होता है रनकर में. बड़े जतन से झाड़ -झुड के निकलता है. दूसरी तरफ काले भूरे सरपट भागते छोटे बड़े कई तरह के साँप हैं पहाड़ में.इनमें कई बड़े जहरीले तो कई डरावने. इनके पीछे कई रहस्यमय कथा काथ भी जुड़ीं हैं जो अक्सर सुनी- सुनाई जातीं हैं.सुन कर झस्स तो होती ही है. इनको देख रोमांच भी होता है. डर तो हुआ ही. पर गाय और नाग दो ऐसे जीव हैं जिन्हें पहाड़ की लोक परंपरा में भी हमेशा से पूजनीय माना जाता है. सर्प को सुख -सम्पदा, अन्न- धन, घी -दूध दन्याली प्रदान करने वाले की मान्यता है. शास्त्रों पुराणों के हवाले से चली आई कथा है कि श्रवण शुक्ल पंचमी को ही ब्रह्मा जी ने नागों को, सर्पों को उनकी माता कद्रू के शाप से मुक्ति दिलाई थी.
(Snakes of Shiva and Krishna)

भविष्य पुराण की कथा है कि जब देवता और असुर के मध्य समुद्र मंथन हुआ तो मंदरांञ्चल परबत की मथानी बनी और वासुकि नाग की नेती. पहले कालकूट विष निकला जो शिव शम्भू गटक गये, नीलकण्ठ कहलाये. फिर आयीं कामधेनु गैया जो देवताओं के हिस्से आयीं. अब निकला उच्चैश्रवा नाम का अश्व, जो बहुत ही सफ़ेद दुग्ध धवल था. जब इस सफ़ेद घोड़े को नागों की माता कद्रू ने देखा तो वह अपनी सौत विनता से बोली कि देखो कितना सुन्दर सफ़ेद अश्व! पर इसके बाल तो काले दिख रहे हैं न? इस पर विनता ने कहा कि ये तो बस सफ़ेद है. काला तो एक भी बाल नहीं दिखता मुझे . अपनी बात का प्रतिवाद होते वह भी सौत के मुंह से. ऐसा अपमान. तो नागमाता कद्रू को क्रोध आ गया. सौत विनता से बोली, अब मेरी यह शर्त है कि अगर मैंने इस अश्व के केश काले दिखा दिये तो तुम मेरी दासी और अगर में ऐसा ना कर पायी तो मैं तुम्हारी दासी. सत्य को क्या प्रमाण सोच, वनिता ने शर्त मान ली. अब तो नागमाता कद्रू ने शर्त जीतने के लिए छल -बल का आश्रय लिया. उसने तुरंत अपने नागपुत्रों को बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि वह अपना आकार सूक्ष्म कर उस सफ़ेद अश्व उच्चैश्रवा के बालों पर चिपट जाएं जो यज्ञ से निकला. जिससे वह काला दिखने लगे. पर नागपुत्रों ने अपनी मां के ऐसे आदेश को मानने से इंकार कर दिया.आखिर यज्ञ से निकला सफ़ेद अश्व था सबने देखा था.

अपने आदेश पर ना सुन नागमाता कद्रू अति क्रोधित हो उठी. अपनी बात मनते न देख शर्त हार जाने, विनता की, अपनी सौतन की दासी होने के भय से वह आपा खो बैठी. गुस्से में उसने अपने नागपुत्रों को श्राप दे डाला  कि पांडव वंश में जब राजा जन्मजेय सर्प सत्र करेंगे तो तुम सभी उस यज्ञ की प्रचंड अग्नि में जल कर भस्म हो जाओगे. जाओ अब दूर हो जाओ मेरे आगे से. क्रोध और आवेश में दिये नागमाता के इस श्राप से मुक्ति पाने को सभी नागपुत्र वासुकि नाग के साथ ब्रह्मा जी के पास जा पहुंचे. ब्रह्मा जी ने बात सुनी और उन्हें आश्वस्त किया. बोले कि वह भस्म होने, नष्ट होने की चिंता ना करें. बस आगे यायावर वंश में जरतकारू नामक ब्राह्मण से वह अपनी बहिन का विवाह करा दें. तब उनका पुत्र होगा आस्तीक जो बहुत तेजस्वी होगा. यह आस्तीक ही जनमजेय के सर्प यज्ञ को रोकेगा. ये तिथि श्रावण शुक्ल पंचमी की होगी. तभी से सावन की पंचमी को नाग पंचमी का त्यौहार मना.

प्रसिद्ध समाज शास्त्री हुए हैं फर्गुसन. वह लिख़ते हैं कि नाग पूजा उन प्राचीन पूजा पद्धतियों में एक है जिनके द्वारा मनुष्य ने अज्ञात शक्ति की पूजा अर्चना शुरू की. ऐसे प्रमाण दुनिया भर में मिलते हैं. मूर्ति पूजा में तो नागपूजा का विशेष जोर रहा ही. भारत में नाग पूजा सबसे ज्यादा प्रचलित रही. वैदिक परंपरा में आर्यों की पूजा पद्धतियों में यह शामिल हो गई थी.
(Snakes of Shiva and Krishna)

पहले सूरज, चंद्र, धरती, पानी, आग, हवा को देवता मन उनकी पूजा अर्चना की गई. जैसे जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ वैसे वैसे सामाजिक- सांस्कृतिक मूल्य भी परिष्कृत हुए. जहां पहले देवता को मात्र हाथ जोड़ नमन किया जाता वहीं कालांतर में हर देवता की पूजा पद्धति के साथ उसके अंग -प्रत्यंग की कल्पना- परिकल्पना भी की जाने लगी. फिर पूजा पद्धतियों में पल -प्रतिपल, दिन -वार, पक्ष -पैट, ऋतु -मास इत्यादि जैसे समय आधारित प्रतिमान भी निर्धारित किए जाने लगे. हर ऋतु, हर मौसम में होने वाले धन -धान्य की उपलब्धता के हिसाब से हर देवता को चढ़ाई जाने वाली भेंट व सामग्री भी तय होने लगीं, बढ़ने लगीं.

भविष्य पुराण में कहा गया कि पहले सूर्य देव की पूजा उन्हें हाथ जोड़, ‘ॐ अग्नि देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देवता..’ के आदर भाव से संपन्न हो जाती थी. तदन्तर इसमें एक चक्र, तीन नाभि, पांच अरे, आठ बंधों से युक्त व एक नेमि से सज्जित हजार योजना लम्बे स्वर्ण रथ जिनमें पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े भी सज्जित हुए. संकल्पना यह थी कि इस रथ के साथ हर माह चलते हैं अलग -अलग गण, गन्धर्व, ऋषि, यक्ष, राक्षस, अप्सराएं और नाग. सभी देवता सूर्य के रथ के साथ भ्रमण करते हैं. ऋषि उनकी स्तुति करते हैं, गन्धर्व स्तुति गान करते हैं. राक्षस रथ के पीछे चलते हैं तो अप्सराएं रथ के आगे नृत्य करती चलतीं हैं इस रथ के सारथी हैं अरुण तो रथ को बांध कर रखने वाले हैं नाग.

इस प्रकार सर्प एवं नाग सूर्य रथ की परिकल्पना में आये. गीता में कहा गया कि विष्णु भगवान शेषनाग यानि कि अनंत के बिछोने पे लेटे. खुद को भी वासुकि सर्प बताया. भोलेनाथ के गले का हार तो हैं ही नाग. फिर मूषक की सवारी वाले गणेश जी ने भी नागों को अपना भूषण बनाया. वैदिक कालीन देवता वरुण अर्थात जल ने नागपाश को धारण किया. यह भी धारणा बनीं कि शिवलिंग और उसके आसपास बने नाग काम के प्रतीक हैं.
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उत्तराखंड में नागों का प्रभाव शिव पूजा में भी प्रबल रहा. ब्रह्मा ने नागों को शाप दिया तो नागों ने पुष्कर पर्वत पर शिव शम्भू की प्रार्थना कर उन्हें प्रसन्न तो किया ही उनके कंठ के हार भी बने . फिर नागों के साथ साथ नदी, वृक्ष, शिला, पर्वत, यक्ष, ग्राम देवी व मातृ देवी के पूजन की परंपरा कालांतर में विकसित होती रही. हर गाँव में किसी विशाल पेड़ के नीचे नागदेवता का स्थान बना जहां उसका साथी नरसिंग देवता भी रहता. नरसिंग के प्रतीक रूप में रखा जाता लोहे का त्रिशूल और नागदेवता के रूप में लोहे का दो मुंह वाला नाग और इनके साथ होता लोहे का दीपक. रवि और खरीफ की दोनों फसलों में इनकी पूजा की जाती.

ह्युं हिमालु जाग, पयालु पाणी जाग,
गोवर्धन पर्वत जाग, राधाकुंड जाग, काला बैजनाथ जाग,
धौली दिप्रयाग जाग,
हरि-हर द्वार जाग, काशी विश्वनाथ जाग,
बूढ़ा केदार जाग, भोला तु शम्भू जाग,
काली कुमाऊं जाग, चोपड़ा चौथान जाग,
फटिंगा कलिंगा जाग, सोवन की गादी जाग.

सावन की शुक्ल पंचमी नाग पंचमी कही जाती है. इस दिन नागों की विधिवत पूजा की जाती है. मिट्टी के नाग बना उन्हें दूध से नहलाया जाता है . राजस्थान में तो नागपंचमी महोत्सव का रूप ले लेती है. नागों को दूध से स्नान करा दुग्ध पान कराया जाता है. घर में दरवाजे के दोनों ओर मिट्टी गोबर लकड़ी के नाग बना रखे जाते. धनवान लोग सोने चांदी के नाग बना कर रखते. फिर दूध -दही, दूब, गंध- पुष्प, रोली – अक्षत, घी, लड्डू- खीर जैसे नैवेद्य उन पर चढ़ते. ब्राह्मण नागों की पूजा कराता और दान दक्षिणा पाता. माना गया कि नाग पूजा से कुल में नागों का भय न होता. राजस्थान में नागपंचमी सावन के शुक्ल पक्ष के साथ कृष्ण पक्ष में भी मनाते हैं. जब षष्ठी रहित पंचमी पड़े तो यह नागपंचमी के रूप में मनाई जाएगी.इसके लिए चौथ को बाजरा और मोठ भिगोते हैं. लकड़ी के तख्ते पर रस्सी में सात  गांठ लगा उसे काले रंग से रंगते हैं. जिस पर दूध, घी, चीनी मिला कर चढ़ाते हैं.. सर्प की बांबी की मिट्टी में दूध मिला चूल्हे पर साँप की आकृति बना उस पे भी दूध, घी, चीनी चढ़ा पूजते हैं. बांबी की मिट्टी में चने और गेहूं के दाने बोये जाते हैं यह क्रिया ‘खत्ते -गाड़ना’ कहलाती है. जो घर में धन -धान्य के भरे होने की सूचक है.
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महाराष्ट्र में नागपंचमी के दिन किसी पीठ पे नौ नागों और उसके नौ बच्चों की आकृति बना कर पूजते हैं. घर में गोल मोदक बनते हैं. बाकी खाना उबाल के ही बनता है. काट, सेक, छौंक कर नहीं. तो गुजरात में भड़ों की कृष्ण पंचमी को नागपंचमी मनाते हैं. जिसे ‘नागर पंचमी’ कहा जाता है. केरल के ओणम में सर्प नौका दौड़ का उत्सव होता है.

सावन की शुक्ल पक्ष नाग पंचमी दक्षिण में नागर पंचमी कहलाती हैं. नाग की बाम्बियों के समीप पुष्प व सुगन्धित पदार्थ डाले जाते हैं. इसी प्रकार मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को भी नाग पूजा दक्षिणात्यों में प्रचलित है.

उत्तराखंड में नाग पहले से पूजनीय रहे. गढ़वाल में श्री कृष्ण के रूप में स्वीकारे नाग देवताओं के अनेक मंदिर हैं. वीरनेश्वर को समर्पित देवालय मवालस्यूं, चौथान पट्टी दूधातोली सहित इस जनपद में हैं. दशोली में तक्षक नाग, जौनसार में वसी नाग, विमहंण नाग, बढ़वा नाग, उलहण नाग वा नागपुर में वासुकि नाग की पूजा होती है. इतिहासकार बताते हैं की अलकनंदा घाटी में नाग जाति निवास करती थी जो नाग पूजक रही. पांडुकेश्वर में शेषनाग, पौड़ी में नागदेव, नेलंग – नीति घाटी में लोदियानाग, रठगांव में भेंकल नाग, मार्गों में बनपुर नाग, नागनाथ नागपुर में पुष्कर नाग, तलवर में मंगलनाग, भदूरा में हूण नाग, रमोली पट्टी में नागराज सेम, थाति कठूड़ में महाशर नाग, रैथल टकनौर में स्यूरिया नाग, रवाईं में कालिंग नाग सहित समस्त गढ़वाल में नाग श्री कृष्ण की उपासना भाव से पूजे जाते हैं.

उत्तराखंड में नाग गढ़पतियों की पूजा होती रही है. दानपुर में वासुकि नाग तो जौनसार उत्तरकाशी व टिहरी में सागराजा या सर्वनाग तो टिहरी भदूरा में हूण नाग की पूजा प्रचलित रही है. गुप्त सेम में वासुकि नाग तो सेम -मुखेम में शेषनाग पूजे जाते हैं. खेंट पर्वत पर सात नाग कन्याओं की अतृप्त आत्माओं की पूजा की परिपाटी रही है.

पौड़ी में बनेलस्यूं व कडवालस्यूं पट्टियों के बीच डांडा नागरजा में वैशाखी के दिन नागराजा का मेला होता है जिसमें गुड़ की भेली चढाई जाती है. टिहरी में रमोली पट्टी में ‘सेम का डांडा ‘ में नागतीर्थ है. जहां हर तीसरे साल इग्यारा गते मंगसीर को मेला होता है. सेम नागराज की जात दी जाती है. इसे कृष्ण जात भी कहा जाता है. इसमें चांदी के नागों का जोड़ा जल में चढ़ाया जाता है. नागपूजा के तीर्थ सेम-मुखेम, नागराजा का डांडा नागदेउ, नागराजाधार, विनसर, टिहरी गढ़वाल की रमोली पट्टी में शेषनाग सिद्धपीठ मुख्य रहे. यक्ष, किन्नर व नाग देवताओं को ‘व्यंतर देवता’कहा गया जो शुभ कर्मों में साथ रहते व रोगों से रक्षा करते. इसी तरह जौनपुर में बैट गाँव, श्रीकोट, भटोगा क्यारकुली, औतड़, गौगी, मयाणी बिच्छू, कुआं, मोलधार, वाडासारी, नागथात व नागटिब्बा में नागपूजा की जाती है.

गढ़वाल में नागों की पूजा अर्चना के भिन्न नाम वाले देवस्थल हैं जैसे रथगांव में भीखल नाग, नागनाथ में पुष्कर नाग, पौड़ी में नागदेव, पांडुकेश्वर में शेषनाग, दशौली में तक्षक नाग, तलवर में मंगल नाग, नीति घाटी में लोहियानाग, नागपुर में वासुकीनाग, कुमोट में वनपुर नाग के साथ बिमहणनाग, उलहण नाग, बड़वानाग, वासिनाग मुख्य हैं. इसके साथ ही अलग अलग गावों में जिन नाग देवताओं की विधिवत पूजा अर्चना की जाती है उनमें नागदेव, पुण्डरीक नाग, छड्देश्वर नाग, घददेश्वर नाग, चन्दनगिरि नाग, पुष्कर नाग, हूण नाग, बगासूनाग, कंबलनाग, बेरिंग नाग, भुईसर नाग, पंचसर नाग, कर्मजीत नाग, शेषनाग, भेंकल नाग, वामपानाग, कालिकनाग, लुद्देश्वर नाग, शिकारु नाग, वामपानाग जैसे अनेक मंदिर हैं.
(Snakes of Shiva and Krishna)

कुमाऊं में वीरनेश्वर के कई देवालयों के साथ धौली नाग, सुन्दर नाग, फेणी नाग, फिश नाग, खरही नाग, धूमरी नाग, हुंकार नाग, फुंकार नाग, बिलानाग, शेषनाग, तक्षक नाग शिशुनाग,पुष्कर नाग, बिसु नाग, पिंगल नाग के साथ बडाउूँ का बेणीनाग, पुंगराऊं का कालीनाग, छखाता नैनीताल का कर्कोटक नाग, अठीगाँव का वासुकि नाग, ग्वालदम का नागदेवता, दानपुर का वासुकि नाग, चम्पावत का नागनाथ, सालम का नागदेव पदमगीर, बसाड़ी महरपट्टी का शेषनाग, भगोटी का सितेश्वर नाग व वीर गणेश्वर का अनंत नाग प्रसिद्ध हैं.

सुबह सबेरे अनंत, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, शंखपाल, कम्बल, घृतराष्ट्र, तक्षक और कालिय का स्मरण करने से सर्वत्र विजय होती है और सर्पदंश से मुक्त रहने की मान्यता है. संध्या के बाद नागों को स्मरण करने की परंपरा है. मानव में निहित कुण्डलिनी शक्ति भी सर्पिणी का रूप मानी गई है. कृष्ण के रूप में नागराजा का आह्वान होता है. “ॐ जै इस्टदेवता! महाबली देवता! श्री भूमिया देवता! नागराजा देवता! सूता जगोंदों! रूठा मनोनदोँ!पयेडी पराज हिएड वाडुलि! श्रीकुल की भगवती झालीमाली देवी! श्री सत्यनारायण देवता! चार बुवंड की चंद्र बदनी! दयूल गढ़ की देवी! सुरकंडा माता! महिष मर्दिनी! गढ़वाल की भुवनेश्वरी माता! उत्तराखंड धाम का बद्रीविशाल भगवान! खांडा जस दे! माथा भाग दे! कंठ राग दे! माँगन का वर दे! पूजन का फल दे! श्री नागेंद्र देवता!
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जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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