बाद में जब इस यात्रा के बारे में नगन्यालजी से बातें हुवी तो उनके पास उनके बचपन के ढेरों किस्सों की खान मिली. बकौल नगन्यालजी – (Sin La Pass Trek 20)
गाँव की पवित्र शिला, जिसको प्राचीन समय से ही नाम दिया गया है ‘कुन्ती-ला’ बचपन में मैंने गांव के बुजुर्गों से इसी शिला मे बैठकर जिज्ञासा जाहिर किया था कि इसका नाम कुन्ती-ला क्यों पड़ा? तब नब्बे साल के एक बुजुर्ग ने बताया कि गांव मे दो बहने रहती थी कुन्ती घनारी, उन्हीं के नाम के कारण कुन्ति-ला (शिला) पड़ा. हमारे गांव से आगे तेदांग गांव वासियों का ईष्ट देव छ्युंग सै (छ्युंग देवता) हुवे. देवता की पूजा प्रक्रिया में अग्नि प्रज्वलन के लिए पुजारी जिसे वहां ‘धामी’ कहते हैं, द्वारा दो काष्ठों को रगड़ करके दिया प्रज्वलित किया जाने वाला हुवा. मारचिस-दियासलाई या अन्य माध्यमों को अपवित्र माना जाने वाला हुवा.
ये बात लगभग 45 बर्ष पहले की है. अकसर कभी-कभार जब पुराण-महाभारत के पन्ने पलटते हैं तो लगता है कि जब पांडव यायावर की जिन्दगी व्यतीत कर रहे थे, तो कहीं उनके तमाम पड़ावों मे से एक नागलिंग भी तो नहीं था. गांव के बुजुर्गों ने हमें ये जो कहानियां सुनाई थी, उन्होंने भी अपने बुजुर्गों से यही कहानी सुनी थी…
तब के जमाने में दारमा व जोहार घाटियों वालों के लिए तिब्बती व्यापारिक मंडी ‘सिल्ति’ और ‘ग्यानिमा’ थी और व्यास वालों की ‘तकलाकोट’ मंडी हुवा करती थी. दारमा के ‘वेदांग’ में भी तब एक मंडी हुवा करती थी जहां तिब्बत के व्यापारी व्यापार के लिए आते थे. 1962 के युद्ध के बाद तो व्यापार तो बंद हुवा ही इसके साथ ही आवागमन भी बंद हो गया. युद्व के बाद तो चीन की सीमा के पास बसे भारतवासियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा.
पहले कैलाश मानसरोवर जाना आम बात होती थी. मेरी माँ पांच बार गई थी और पिताजी तो हर साल व्यापार के लिए जाते ही थे. तब बचपन मे मां, तिब्बत की रहस्यमयी घाटियों के सांथ ही कैलाश-मानसरोवर के बारे मे बताया करते थी और पिताजी तिब्बत व्यापार में कठिनाई तथा कजाखी लुटेरे ‘ग्यमी’ के आतंक के बारे में बताते थे. घर आने के बाद मॉ-पिताजी की यात्राओं के वो डरावने किस्से आज भी चलचित्र के मानिन्द आंखों के सामने दिखने लगते हैं. मैं बच्चा ही था तो तिब्बत नहीं ले जाया गया. घर आने पर उनकी रहस्यमयी बातों से मैं कभी परीलोक में तो कभी दानवों के बीच भयानक डरावने वातावरण में पहुंच जाता था. उनके किस्से मैं इतनी एकाग्रता से सुनता था कि, आज के वक्त में जो लोग तिब्बत हो आये हैं उनके साथ भी अच्छी चर्चा कर लेता हूँ. (Sin La Pass Trek 20)
एक बात और. बहुत समय पहले जब मानसरोवर यात्री दारमा से होकर भी जाते थे, तब कैलाश तीर्थयात्रियों का एक दल जो साधुओं का था, नागलिंग गांव के तिज्या-फू में रूका. नागलिंग में एक जगह को गांव वाले तिज्या-फू कहा करते थे. तब दारमा वासी बारहो मास दारमा में ही रहते थे. आज की तरह नीचे धारचूला में तब उनकी बसावत नहीं थी. उन तीर्थयात्रियों में से एक साधु गम्भीर रूप से बीमार हो गया था. बीमार साधु ने सहयात्रियों से कहा कि मैं तो चल पाने में अक्षम हूँ, आप लोग तीर्थ यात्रा कर आओ. वापसी तक मैं बचा रहा तो मैं आप लोगों के साथ ही बापस जाऊंगा, अन्यथा ईश्वर के चरणों में तो बैठा ही हूं.
छह माह बाद साधुओं की टोली कैलाश की परिक्रमा कर जब वापस नागलिंग के तिज्या-फू में पहुंची तो उन्होंने देखा कि उनका सांथी साधू पहले से ज्यादा स्वस्थ्य है. आपस मे कुशलता पूछने के बाद नागलिंग मे ही छूट चुके सांथी साधू ने उनसे कैलाश यात्रा के बारे मे पूछा. इस पर कैलाश गये यात्रियों ने बताया कि उस रास्ते में जाने के बाद जब कैलाश के दर्शन होते हैं तो हर कोई उसे देखता रह जाता है. बहुत ऊंची बर्फीले चोटी है, उससे पहले समुद्र की तरह बहुत बड़ी झील है. उसमें स्नान करने के बाद कैलाश की परिक्रमा किया. और कई कहानियों को बताते वक्त वो ये बताना नहीं भूलते थे कि वो तिब्बत में तिज्या-फू में भी रूके थे. (Sin La Pass Trek 20)
उन्होंने साधू से पूछा कि वो स्वस्थ कैसे हुए और उसके बाद क्या किया. साधू ने बताया कि, नागलिंग के इस जगह को जिसे गांव वाले तिज्या-फू कहते हैं, इस भूमि में ऐसा महसूस होता है जैसे यहाँ सात बार सूर्योदय हो रहा है और सात बार ही सूर्यास्त भी होता है. ‘सात बार घाम झिलकनछै सात बार घाम बूड़नछै.‘ और इस ‘सौंग प्यि जन’ का नजारा दिसम्बर और जनवरी मे ही दिखाई देता है.
हे ह्या मूदार बिरमी जो रौकश्यन…
साधु ने बताया कि, यहां के लोग भोजन में च्यगड़ी-म्यिगड़ी का सेवन करते हैं.’ हुआ यह कि स्वास्थ्य लाभ के बाद साधू कभी-कभी गांव मे भी आने-जाने लगा था. एक बार गाँव में ज्यमा बनाते देखकर पूछा कि यह क्या बना रहे हो, उस गांव वासी ने ज्यमा का हिंदी-कुमाऊंनी शब्द नहीं आने के कारण यूं ही घुमावदार तिब्बत मे बहने वाली सिल्ति-यांग्ति का डिजाइन च्यंगड़ी-म्यिगड़ी कह दिया था.
साधु के इस वर्णन को सुनकर मानसरोवर से वापस आये यात्री दंग रह गए. वो बोले, हमने इतनी कठिन यात्रा की लेकिन उसके बाद भी इतना दुर्लभ दृश्य देखने से वंचित रह गए जो तुमने यहीं पवित्र जगह में सब महसूस कर लिया. बताते हैं कि गांव वालों ने ‘तिज्या’ मे रुके साधुओं की खूब आवभगत भी की थी. बाद में साधुओं का काफिला आगे निकल गया.’ (Sin La Pass Trek 20)
तब के जमाने में धारचूला को हम लोग ‘दल्ला’ कहते थे. ‘दल्ला’ मतलब गांव के निचली घाटी वाली जगह. वर्ष 1968 में, मैं कक्षा एक मे पढ़ने के लिए ‘दल्ला’ गया तो तब मैंने देखा कि वहां सारे मकान एक मंजिला होते थे वो भी पाथर वाले. नेपाल जाने के लिए काली नदी के उप्पर लकड़ी का डरावना पुल था. तब ‘दल्ला’ खुला-खुला सा महसूस होता था. अब तो ‘दल्ला’ ऊंची-ऊंची ईमारतों के कारण दमघोटू हो गया है. क्या कहें अब के वक्त में तो वो रूहानियां कहानियों के बस किस्से ही रह गए हैं.’ (Sin La Pass Trek 20)
जारी…
– बागेश्वर से केशव भट्ट
पिछली क़िस्त: बड़े दिल वाले होते हैं जसुली शौक्याणी के गांव ‘दांतू’ में रहने वाले लोग
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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.
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