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गहरे हरे रंग का गौरीकुंड और सिनला पास का शिखर

पंकज, पूरन और महेशदा तेजी से चल रहे थे. उनके पीछे कुछ दूरी पर संजय था और सबसे पीछे बेढब रकसेक को लादे मैं चल रहा था. मौसम खुशनुमा था तो मुझे अब चिंता नहीं थी कि हम दर्रे के पार बेदांग में कब पहुंचे. धीरे-धीरे उंचाई शुरू होने लगी और इधर सूरज ने भी छोटे कैलाश में अपनी किरणें बिखेरनी शुरू कर दी. यह दृश्य देखकर संजय और मैं ठिठक से गए. संजय अफ़सोस कर रहा था कि उसके रकसेक की वजह से मुझे परेशानी झेलनी पड़ रही है. मैंने उसे समझाया कि हिमालयी पथारोहण में एक-दूसरे की मदद करना यात्रा का एक आम अनुभव है. कुछ आगे बढ़े तो ग्लेशियर का वह मुहाना दिखाई देने लगा, जहां से कुट्टी यांगती नदी ग्लेशियर के आंचल को झटककर अपनी देहरी लांघती हुयी बाहर निकलती है. (Sin La Pass Trek 17)

आगे ग्लेशियर में एक गहरे हरे रंग की झील दिख रही थी, जिसे यहां गौरीकुंड का नाम दिया गया है. वैसे माउंटेनियरिंग भी भाषा में ग्लेशियर में बनी छोटी-बड़ी झीलों को ‘टार्न’ कहा जाता है. हमारे दाहिनी ओर कई जगहों पर लाल रंग से रास्ते के निशान बनाए गए थे. चलते-रुकते हुए संजय और मैं धीरे-धीरे आगे उंचाई को बढ़ रहे थे. बाकी तीनों साथी हमसे मीलभर आगे निकल चुके थे. पंकज के साथ महेशदा और पूरन भी आज बाज की तरह उड़ान भरते नज़र आ रहे थे. चलते हुए हमें लगभग पांच घंटे हो चुके थे. अब सिनला दर्रा सामने दिखाई देने लगा था. तीनों साथी वहां पहुंचकर हमारा इंतजार कर रहे थे. दर्रा अब तकरीबन दो सौ मीटर रह गया था.

चट्टानों के टूटने से पत्थर, रेत और कंकड़, ‘मोरेन’ में बदल चुके थे, जिसमें चलना रेत के उंचे टीले में चलने जैसा था. पांव बार-बार पीछे फिसल जाते थे. सांसों को थामते हुए एक जगह रुका तो देखा कि पंकज खाली हाथ तेजी से नीचे आ रहा है. पास आकर उसने मुझसे रकसेक देने को कहा लेकिन मैंने मना कर दिया. उसने जिद की तो मैं फिसलनदार मोरेन में ऊपर की ओर को यह कहते हुए दौड़ पड़ा कि, ‘अभी मैं बूढ़ा नहीं हुआ हूं.’ इस बार मैंने दर्रे केक़ शिखर पर जाकर ही दम लिया. वह संजय का रकसेक लेकर ऊपर पहुंचा.

हम करीब 5496 मीटर की उंचाई पर दर्रे के शीर्ष पर थे. इस दर्रे से नीचे उतरने को लेकर मैं अब आश्वस्त हो गया था. समय भी काफी था. चारों ओर हिमालय की उंची चोटियां जैसे हमें देखकर मुस्करा रही थीं. मित्र और बड़े भाई करन सिंह नगन्यालजी की यहां के बारे में कही बातें याद हो आई.

कुछ बुजुर्गों का कहना था कि सिनला पास से कैलाश पर्वत के दर्शन भी होते हैं. मैं चुपचाप हो हिमालय के विस्तार को निहारते हुए अनुमान लगा रहा था कि दूर तक फैले हिमालय की चोटियों में कैलाश पर्वत किस ओर होगा.

इस उंचाई में सभी खुश थे और मैं हल्के गुस्से से भरा था. हवाएं तीखी थी तो किनारे ढलान पर एक ओट में बैठकर मैंने लाइटर निकाला और सिगरेट जलाने की कोशिश की. इतनी उंचाई पर लाइटर ने हाथ जोड़ काम करने से इनकार कर दिया तो अपने पिटारे से माचिस निकाल मैंने एक के बाद एक दो सिगरेटें फूंक दी. तब शायद ऐसा कर मैं अपने अहं को ही संतुष्ट करने में लगा था कि मेरे पास भी स्टेमिना की कमी नहीं है. लेकिन उंचाई में हर कोई चिड़चिड़ हो जाता है.

उत्तरकाशी में, मैं जब कोर्स करने गया तो वहां नोटिस बोर्ड में कुछ चित्रों को देख मैं हैरान हो गया था. उन चित्रों में दो पर्वतारोही आपस में ‘आईस एक्स’ से एक दूसरे पर आक्रमण करते हुए थे. बाद में बताया गया कि उंचाई में कुछ लोग चिड़चिड़े हो एक-दूसरे पर हमला कर देते हैं और कईयों को तो साक्षात भगवान के दर्शन तक भी कल्पना में होने लग जाते हैं. अब जब इस बारे में सोचता हूं तो अपने पर हंसी ही आती है. Sin La Pass Trek 17

सिनला दर्रे के शीर्ष पर साथी लोग मुझे फोटो खिंचवाने के लिए कहते रह गए, मैं उठा नहीं. दरअसल इस दर्रे के आगे अब चिन्हित रास्ता नहीं था. पुराने सिनला यात्रिओं के अनुभवों से मैंने जानकारी जुटा रखी थी. इसलिए मैं खामोशी से इंतज़ार कर रहा था कि देखें अब ये क्या करते हैं.

पंकज काफी देर तक रास्ता ढूंढता रहा. रास्ता होता तो मिलता न. बाद में जब पूरन और महेशदा ने मेरे व्यवहार को लेकर नाराजगी जताई तो मैंने उन्हें अपने पीछे मेरी ही तरह चलते हुए आने का ईशारा किया तो वे खुश हो गए. गहरे और तीखे पहाडी ढ़लान में अंग्रेजी के जैड आकार में, सावधानी से पांव रखते हुए मैं नीचे को बढ़ता चला गया और सभी मेरे पीछे आते रहे. मैंने उन्हें चुपचाप पांव आगे बढ़ाते हुए उप्पर के तीखे चट्टानों की ओर भी ध्यान देते रहने को कहा. ढलान तीखी थी और ऊपर से चट्टानों के टूटने का भी खतरा बना हुवा था.

मील भर बाद हम बेदांग घाटी में मोरेन के अथाह सागर के बीच थे. चलने में परेशानी हो रही थी तो मैंने सभी को, पांव को नीचे को धकेलने के बाद दूसरे पांव से भी वैसे ही करने को कहा. तरीका आसान था तो हमने घंटेभर में मोरेन को पार कर लिया.

मोरेन खत्म होने के बाद अब बुग्याल शुरू हो गया था तो हम कुछ देर आराम के लिए बैठ गए. सामने किलोमीटर भर लंबा ग्लेशियर इस तरह पसरा हुआ था जैसे कोई बड़ा जिन्न अपनी चारपाई में आराम फरमा रहा हो. परांठे निकले और आपस में बंटने लगे. मैंने मना कर दिया. खाने का मेरा मन भी नहीं था और अभी गुस्सा भी काफूर नहीं हुआ था. करीब आधे घंटे सुस्ताने के बाद आगे बेदांग की ओर बहते नाले का किनारा पकड़कर हम आगे चल पड़े. आज के मेरे व्यवहार की वजह से पंकज ने चुप्पी ओढ़ ली थी.

लगभग तीनेक किलोमीटर चलने के बाद एक-दूसरे का हाथ पकड़कर हमने नाला पार किया और 3982 मीटर की उंचाई पर बने आईटीबीपी कैंप में अपनी दस्तक दी. ज्योलिंगकांग वाली पोस्ट ने यहां सूचना नहीं भेजी थी तो यहां तैनात आईटीबीपी के जवान हमारे अचानक आने से हैरत में थे. Sin La Pass Trek 17

जारी…

– बागेश्वर से केशव भट्ट

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बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

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