फोटो: भाव राग ताल नाट्य अकादमी
भादों शुक्ल पक्ष पंचमी को बिरुड़ पंचमी मनती है.घरों में लिपाई पुताई की जाती है. ताँबे के बर्तन में गोबर गणेश बनता है. उस पर गाय का दूध डाल अक्षत पिठ्या फूल चढ़ाते हैं. पञ्च अनाजों के बिरुड़ भिगाये जाते हैं. बर्तन में कलूं, उर्द, जौ, ग्रूँश, गहत व भट्ट भिगो दिये जाते हैं. अब सप्तमी के दिन इस बर्तन को सिरपतिया धारा या नौले में ले जा धोया जाता है. सप्तमी को महिलाऐं उपवास रखतीं हैं. अयुक्त भरम सप्तमी को खेत से अनाज के पौंधे व धतूरे सहित अन्य फूल लिए जाते हैं.
(Saton-Athon Festival Uttarakhand)
गौरा के वस्त्र, गहने, गुलोबंद, पुतके, छापरी, उड़ेला में रख सजा दिये जाते हैं. इसमें फल रखते हैं विशेषकर नरंगी, माल्टा, दाड़िम. फूलों से छापरी सजाते हैं.इसे ले शंख घंट बजाते गौरा स्तुति गाते सारा समूह खेतों की ओर निकल पड़ता हैं. अब कन्या आकार की आकृति बना धान, जौ, तिल अर्पित कर उसका श्रृंगार किया जाता है. वस्त्र पहनाये जाते हैं. पुष्प चढ़ाये जाते हैं. फल अर्पित किए जाते हैं. गौरा की स्तुति वंदना समवेत चलती रहती है कि देवी तुम्हारा आगमन हुआ, तुमने उजाले फेहराये. वस्त्राभूषण से सज्जित कर देवी गवरा का डोला सजा धजा कर शंख ध्वनि के साथ धर लाने की वापसी होती है.
सामूहिक रूप से एक घर में इसे प्रतिष्ठित कर पंडित जी द्वारा पाठ पूजन संपन्न किया जाता है. पंडित जी कद्दू, ककड़ी, तोरई की पत्तियों को पीस उनका रस निचोड़ते हैं. इसे दीवार में थापा जाता है. शिव -पार्वती, गणेश, कृष्ण-राधा के आकृति उकेरी जाती है.घर की भीति पर गौरी महेश्वर के विवाह और गौने का चित्रण कर पूजा की जाती है. महिलाओं द्वारा गले हाथ में डोर दिपज्योड़ बांधा जाता है. सप्तमी के दिन हाथ में और अष्ट्मी के दिन पूजा के दिन गले में डोर पहनी जाती है. घर से बाहर अठवाली संपन्न होती है. मध्य में गौरा को रख उनके चरण पूजे जाते हैं:
पैली पूजा लौली गमरा, दूसरी पूजा छोड़ -छोड़ पैतोली छोड़.
छोड़ छोड़ गठरी छोड़, किनरी छोड़, छोड़ -छोड़ लौली गमरा.
घुडी -घुडी छोड़.
छोड़-छोड़ कमर ज्योड़ी, छोड़ छोड़ कुमथाला छोड़
छोड़ -छोड़ लौली गमरा
सिरमाया छोड़…
(Saton-Athon Festival Uttarakhand)
गवरा की पूजा अभ्यर्थना कर महिलाएं गीत गातीं, दुस्का -फाग, दुलर पेल -जोड़े, खेल चलते हैं :
सिलगड़ी का पाला चाला, यो गाँव की भूमिया.
फलुँ फूला लाला त्योलिया, यो गावें कि भूमिया.
इस आयोजन के चलते गवरा को गोद में पकड़ हिलौरी खिलाते घर से बाहर ले आते हैं :
दिय दिय बाबा तामा कुटली दिय,
दिय दिय बाबा सुनहली हार दिय…
बाहर मर्द गोल बना ठुल खेल में रमे रहते हैं. गाथाओं का गान चलता है, विशेषकर सीता माता के स्वयम्बर का :
जनक राज लै प्रतिज्ञा करी हो, है प्रतिज्ञा करी हो हो,
जो यो शिब धनुष तोड़ी हाललो हो तोड़ी हाललो हो
उई संग चेली सीता ब्या होली हो ब्या होली हो
जनकराज ले प्रतिज्ञा करी हो प्रतिज्ञा करी हो.
महाभारत की कथा भी गायी जाती है :
भागे धन भगवान ओ शक्ती तुमारी खिन जै जैकार
तुमरी शक्ती खिन जै जैकार है
जै जैकार हो जै जैकार.
अर्जुन योद्धा बोलन लागी, कृष्ण भगवान हो तुमरी जै जैकार
हो तुमरी शक्ती खिन जै जैकार, हो जै जैकार, जै जैकार.
दुर्वाष्टमी को आग में पकाई कोई खाने पीने की वस्तु का निषेध किया जाता है, बस फलाहार किया जाता है. औरतों के द्वारा दिनमान भर बर्त रखा जाता है. सुहागिनें जिनका बड़ा पुत्र और कन्याएँ, जिनका भाई होता है वो आग में पका भोजन नहीं खाते. इस दिन दूर्वा या दूब को भी नहीं काटा जाता. उसकी पूजा की जाती है.
(Saton-Athon Festival Uttarakhand)
अष्टमी के दिन गंवरा के विवाह और गौने के गीत समवेत गाये जाते हैं और नृत्य किया जाता है. अष्ट्मी को शंख नाद व घंटी मजीरे की ध्वनि के साथ महेश्वर अर्थात गौरा को डोला लाया जाता है. इस डोले के साथ मर्द भी साथ होते हैं. गौरा के लोक में उपजने का गीत गाया जाता है:
कां रे उपजो मंगेतर भीना कां भौ छ उज्यालो.
डाना है उपज्या मंगेतर भीना खेत में छो उज्यालो.
सौ बोट, धान बोट, तिल बोट है उपज्या, मंगेतर भीना.
अटकत हयां उपज्या भीना, पटकत में छ उज्यालो.
बालू बोट हया तिल बोट हया उपज्या मंगेतर भीना.
पटकर में छ उज्यालो.
खेत है उपज्या मंगेतर भीना, भीतर भै, छ उज्यालो.
अष्ट्मी के दिन महिलाएं एक सौ आठ बार पञ्च फलों से दीवार पर अंकित देवी देवताओं की, गौरा महेश्वर की पूजा कर गले में दीपजौड़ या दुबधागा बांधती हैं. महिलाओं द्वारा सामूहिक गान चलते रहता है :
पैली पूजा महेश्वर, छोड़ छोड़ पैतोली छोड़.
दूसरी पूजा महेश्वर, छोड़ छोड़ गढ़यूडी छोड़.
छोड़ छोड़ फिनरी छोड़, महेश्वर भीना घुणि छोड़.
छोड़ छोड़ कमर ज्योड़ी छोड़, महेश्वर भीना कुन्याला छोड़.
छोड़ छोड़ महेश्वर भीना सिरमायी पाग छोड़.
अब घर की महिलाएं बिण भाट की गाथा का बखान कर बिरुड़ पात्र अपने सर पर रखतीं हैं. गौरा महेश्वर बाहर खुले आंगन में ले आए जाते हैं. दोनों को हिलोरी खिलाई जाती है:
हिलोरी बाला हिलोरी, बाला महेश्वर हिलोरी.
सासू यो मेरो बालो देखी दिया
मैं तो जानइ छ बालो देखी दिया
तुम म्यार बाला कें धोई दिया, चुपड़ी दिया,
म्यार बाला कें खवाइ दिया
हिलोरी बाला हिलोरी, बाला महेश्वर.
कई दिनों का उत्सव चलता है. हफ्ता, पक्ष, मासिक पूरा होने के बाद गंवरा महेश्वर का डोला विदाई के लिए जलस्त्रोत या देवता के मंदिर या पनघट की ओर प्रस्थान करता है. विदाई के गीत सारे वातावरण को वधू की विदाई सा ही कारुणिक बना देते हैं. मन की पीड़ा को लोक के स्वर मिलते हैं:
बसी रैया ईजा बाबा, अब हम घर नसी जानू
बसी रैया ईजा बाबा
बसी रैया दीदी भीना
बसी रैया काका काकी भाई भौजाई नसी जानू
यो मेरा ईजा बाबा रथ ले के नी दियो
यो मेरा दादा भोजा रथ ले के नी दियो
यो मेरा मामा रथ ले के नी दियो
ओ मेरा दीदी भीना रथ तुम नसी ग्योछा सुख्याली हो रया
ओ…
(Saton-Athon Festival Uttarakhand)
अब जब डोला ले कर देवता के थान पहुँचते हैं तो वहां धूनी जली है. प्रसादी बनी है. सारी तैयारी कर पंडित जी अपने आसन पर विराजमान हैं.
महिलाएं बाएँ से दाएं सात बार सिर में रखी गौरा महेश्वर की डोली की परिक्रमा करके उनको भूमि में उतार उनकी पूजा करतीं हैं.उनके आभूषण उतारे जाते हैं. उन पर चढ़े फल फूल एकबट्या के मंदिर में रख देते हैं. पूजा के बाद ये चांदनी फल खुले आकाश की ओर कर फटकाये जाते हैं:
झुमक्याली छल-छल फटकूला फल फूल
जो मेरा फलफूल पाई जालो
में तेरो काज पूरी करी द्यूँलो.
ओ मेरा माई बाप, भाई बन्दों तुम भरी दिया भकार
यो भादों की डाली ले
में भरी जूंलो सौकार.
फल फूल जो फटकाये गए वह चांदनी फल अब गोठ कुड़ी के भकार में रखे जायेंगे. मान्यता यह कि धन धान्य कभी कम ना पड़े. भरा रहे. “सैल-सिंगार, भरी भनार”.
हर बरस बड़ी आतुरता से, तैयारी से गौरा महेश्वर को भादों मास में उमड़ती घुमड़ती घनघोर घटा और कभी अचानक ही पड़ गए तेज घाम की प्रकृति लीला के साथ मनाया जाता है. सातों आठों के नाम से जाने इस पर्व में आरम्भ गौरा गौरी के आगमन का उल्लास छलकता है. सातूं आठूं में पहने जाने वाले नये वस्र आभूषण लिए जाते हैं. पौराणिक कथाओं गाथाओं और प्रचलित लोक गीतों को पूरी तैयारी, भाव, ताल के साथ ढोलक मजीरे की लय थाप से सामूहिक स्वर दिये जाते हैं.नाच की तैयारी होती है. पांव एक सम पर थिरकते हैं, बाहें जुड़ीं रहती नृत्य की अलग अलग भाव भूमि के बिम्ब देतीं हैं. गोल घेरा बना कर नाच होता है. ये खेल उस घर के प्रांगण में होते हैं जहां गौरा और महेश्वर को प्रतिष्ठित किया जाता है.
(Saton-Athon Festival Uttarakhand)
यह कौतुक दुर्वाष्टमी से पहले और उसके बाद मास भर तक चलता है. रात्रि तक सामूहिक गान वा नाच चलता है. बहू ब्वारियाँ इसे मनाने मायके आती हैं. तो गौरा गौरी की विदाई अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ होती है. विदाई के आखिरी खेले के साथ गाँव में पधारे सभी मेहमान, चैलबट्टी, नई ब्वारियाँ अपनी ससुराल जाने की तैयारी करतीं हैं. सातूं आठूं में अलग अलग व्यंजन बनाये खिलाये जाते हैं.
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online
Support Kafal Tree
.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
What Is the DK88 Casino Promo Code?How To Claim The DK88 Casino Promo CodeUnderstanding The…
Why Choose DK88? Licensing, Security and Local AppealStep‑by‑Step DK88 Casino Registration ProcessPreparing Your DocumentsCreating Your…
DK88 Casino Registration: Practical Guide for Malaysian Players Welcome to the ultimate walkthrough of DK88…
Getting Started: Registration & First StepsVerification and KYCNavigating the DK88 Casino App InterfaceKey Features at…
Why DK88 Malaysia Casino Stands OutRegistration & Getting StartedBonuses & PromotionsGame Selection – Slots, Live…
आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…