(पिछली क़िस्त का लिंक – रहस्यमयी झील रूपकुंड तक की पैदल यात्रा – 2)
सुनसान बुग्याल में मुझे दो युवा चरवाहे भेड़ चराते दिखे. मैंने हँसते हुए पूछा – बस एक ही भेड़. उनमें से एक ने जवाब दिया – बाँकी भेड़ें बुग्याल में चर रही हैं. इसे अपने साथ ही रखते हैं क्योंकि इसको त्यौहार वाले दिन देवी नन्दा को भेंट चढ़ायेंगे.
धुंध ने पूरे बुग्याल को अपनी आगोश में ले लिया और बारिश की रफ्तार भी बढ़ने लगी है. मैं बुग्याल में अकेले चल रही हूँ. बुग्याल में बहुत जगह पानी के कुंड बन गये हैं जिनमें धुंध की ही परछाई दिख रही है. हरे और ग्रे रंग का ये संयोग अच्छा लग रहा है यहाँ. अचानक जब सामने की ओर देखा तो धुंध को चीरती हुई दो परछाइयाँ मुझे अपनी ओर आती दिखी पर वो अभी इतनी छोटी लग रही हैं कि कुछ समझ ही नहीं आया कौन हैं. मैं उनके नजदीक आने का इंतजार करने लगी. जब परछाइयाँ नजदीक पहुँची तो एक महिला और पुरुष नजर आये. दोनों अपनी पारंपरिक पोशाकों में हैं और उनके कदम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
मुझे देख के दोनों रुक गये और परेशान होते हुए पूछा – अकेली हो क्या ? मैंने न में सर हिलाते हुए बताया – गाइड है. फिर पुरुष बोला – वैसे यहाँ घबराने की कोई बात नहीं है पर जंगली जानवरों का डर तो बना ही रहता है. मैंने उनसे पूछा – आप दोनों कहाँ से आ रहे हैं ? जवाब में पुरुष बोला – वेदनी बुग्याल से. वहाँ पूजा देनी थी. अब नन्दा देवी का त्यौहार नजदीक आ रहा है. आज हमारी बारी थी पूजा देने की. मैंने उनसे उनकी पोशाकों के बारे में पूछा. फिर से पुरुष ही बोला – ये हमारी पारंपरिक पोशाक है. हम त्यौहारों में यही पहनते हैं. मैंने फोटो खींचने के लिये पूछा तो वो खुश होकर बोले – हाँ खींच लो और फिर अपने लोगों के बीच जाकर उन्हें फोटो जरूर दिखाना और हमारी संस्कृति के बारे में बताना. आंखिर बाहर की दुनिया वालों को भी तो हमारे बारे में पता चलना चाहिये. इतनी बात करके वो अपने रास्ते चले गये और मैं आगे बढ़ गयी.
अब तो बारिश बहुत ज्यादा तेज हो गयी और ठंड भी बढ़ने लगी है. अब मैंने रुक के बुग्याल को देखना बंद कर दिया और बस चलती जा रही हूँ. मेरे आगे बढ़ने के साथ बुग्याल की विशालता भी बढ़ती जा रही है. मेरे चारों ओर सिर्फ हरी घास ही है. मैं रुक कर इसे अच्छे से देख लेना चाहती हूँ पर तेज बारिश ऐसा नहीं होने दे रही इसलिये मैं सर झुकाये आगे चलती चली गयी. तभी अचानक पीछे से किसन भाई की आवाज आयी – चलते रहो..चलते रहो !!! बस आने ही वाला है.
धुंध के बीच मुझे फिर कोई नजर आया ऊपर की ओर. जब नजदीक पहुँची तो देखा एक बुजुर्ग हैं जो छाता लिये एक मंदिर के पास खड़े हैं. धुंध वाला मौसम एक पहाड़ी, पहाड़ी में मंदिर और उसमें एक आदमी छाता लिये हुए. ये किसी फिल्म के दृश्य की तरह है. मैं उनके पास जाना चाहती हूँ पर वो दूरी में हैं इसलिये आगे को ही चली गयी. किसन भाई ने बताया – इस मंदिर को चैभाड़ी मंदिर कहते हैं. इस जगह से चारों ओर रास्ते जा रहे हैं. मैंने अपने मन में सोचा चारों ओर रास्ते तो पूरे बुग्याल से ही जा रहे हैं फिर इस जगह में ही क्या खास है. पर मैंने अच्छा कह कर बात खत्म की. 15-20 मिनट बारिश में चलने के बाद टैंट आ गया और मैं टेंट में चली गयी.
कुछ देर में तेज भाई मेरे लिये गर्म चाय ले आये जिसकी इस समय बहुत जरुरत है. ठंड से हाथ भी काँप रहे हैं इसलिये दोनों हाथों से गिलास पकड़ के चाय पीने लगी. अब बारिश रुक गयी और मौसम साफ होने लगा है. पहले जितनी ठंड भी अब नहीं लग रही है. धुंध छँटने के बाद सामने की चोटियाँ दिखने लगी है जिनमें सूर्यास्त की किरणें अपना जादू बिखेर रही हैं. कुछ देर के लिये आसमान नीला हो गया और रंगीन बादलों से भर गया फिर अंधेरा हो गया.
मैं किचन टेंट में चली गयी जहाँ खाना बनने की तैयारी हो रही है. तेज भाई स्टोव जला रहे हैं. तेज भाई भी एक करेक्टर ही हैं. दुबले-पतले से दिखने वाले तेज भाई ट्रेकिंग का गहरा अनुभव रखते हैं. उन्होंने कई ट्रेक किये हैं और जब कभी खच्चर नहीं मिल पाता है तो बहुत सारा सामान अपनी पीठ पर लाद के ही चल देते हैं. उनके चेहरे में कभी कोई शिकन नहीं रहती. उन्होंने बताया – मेरा परिवार ग्वालदम में रहता है. बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. गाँव में थोड़ा खेती है पर जमीन ज्यादा नहीं है इसलिये ट्रेकिंग वाले समय में हैल्पर का काम करके पैसा कमाना पड़ता है. पर ये काम बहुत खतरनाक है. कब क्या हो जायेगा इसका कुछ पता नहीं होता है. इसके बाद तेज भाई काम में लग गये और मैं अपने टेंट में आ गयी.
अब फिर हल्की बारिश होने लगी है. कुछ देर में तेज भाई खाना टेंट में ही दे गये. मैं भी खाना खा कर स्लिपिंग बैग में घुस गयी. ठंड भी है उस पर बारिश है कि रुक ही नहीं रही है. अब फिर तेज बारिश शुरू हो गयी और टेंट में गिरने वाले तेज रफ्तार पानी की आवाजें सोने नहीं दे रही हैं हालाँकि ये अच्छा ही है क्योंकि इन आवाजों से सन्नाटे का एहसास नहीं हो रहा है.
सुबह बारिश रुक गयी. तेज भाई टेंट में ही चाय दे गये और तैयार होने के लिये बोल गये. मैंने स्लिपिंग बैग समेट के रखा और किचन टेंट में आ गयी. जहाँ नाश्ता बन रहा है. नाश्ता बनने तक मैं अली बुग्याल में टहलने आ गयी. ये विशाल बुग्याल है. कल आते समय बारिश के कारण इसका एहसास नहीं हुआ पर अभी लग रहा है. पेड़ बहुत दूर छूट चुके हैं. मैं मंदिर जा के उस बुजुर्ग से मिलना चाहती हूँ पर मंदिर कैंप से दूर है और मुझे जल्दी ही नाश्ता करके ट्रेक शुरू करना है.
कैंप आने तक फिर बारिश शुरू हो गयी और हमें बारिश रुकने का इंतजार करना पड़ा. किस्मत से बारिश रुक गयी और धुंध भी छँट गयी. ट्रेक शुरू करते हुए सामने की चोटियाँ दिखने लगी जिसमें सबसे बड़ी चैखम्बा चोटी नजर आ रही है हालाँकि चाटियाँ अब भी बादलों के बीच घिरी हैं पर ये नजारा बहुत सुंदर है. ऊपर नीचे बादल और बीच में चोटिया. काफी लम्बी रेंज दिखायी दे रही है. अभी भी बुग्याल वाला रास्ता है बस आज एक पगडंडी बुग्याल के बीच से सीधी जा रही है. इसी सीधे रास्ते पर चलते हुए मुझे कुछ जंगली घोड़े दिख गये जो घास चर रहे हैं और मेरे रास्ते में खड़े हैं. मुझे नहीं पता इनके साथ कैसे पेश आऊँ इसलिये मैं दूर खड़ी रही और किसन भाई के आने का इंतजार किया. उन्होंने कुछ आवाजें निकाल कर उन्हें रास्ते से हटा दिया.
कुछ देर और इसी तरह बुग्याल के बीच से चलते हुए वेदनी बुग्याल पहुँच गये. इस समय हमें बुग्याल के ऊपर से निकलना है इसलिये वेदनी कुंड नीचे दिख रहा है. इतनी ऊँचाई से देखने में कुंड बहुत छोटा नजर आ रहा है और अभी धुंध से भी घिरा है. इसी धुंध के बीच मुझे हरी घास के ऊपर कुछ सफेद निशान इधर-उधर होते दिखाई दिये. किशन भाई ने कहा – वो सब भेड़ों के बड़े-बड़े झुंड जो आजकल बुग्यालों में चरते हैं. बारिश का मौसम होने के कारण वेदनी कुंड के साथ पानी के कई और छोटे-बड़े कुंड बन गये हैं.
वेदनी बुग्याल में कुछ समय बैठने के बाद आगे निकली. फिर बारिश शुरू हो गयी. हल्की बौछारों में बुग्याल अच्छा लग रहा है. बुग्याल में लिमरजियर का एक जोड़ा भी दिखा जो मजे से जमीन में चल रहा है और थोड़ा बहुत उड़ रहा है. उनकी मस्ती देख के लग रहा है जैसे उन्हें मेरे होने न होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता. बारिश के कारण में ये तस्वीरें नहीं ले पायी पर जो नजारा आँखों में कैद हुआ उसका अपना ही मजा है.
(जारी)
विनीता यशस्वी नैनीताल में रहती हैं. यात्रा और फोटोग्राफी की शौकीन विनीता यशस्वी पिछले एक दशक से नैनीताल समाचार से जुड़ी हैं.
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