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‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…

जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार और फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी से कल शाम मुलाकात हुई. दरअसल,उनके निर्देशन में बनी फिल्म ‘पायर’ (चिता) इन दिनों बागेश्वर में मोबाइल थिएटर के माध्यम से बड़े पर्दे पर दिखाई जा रही है. 14 से 18 अक्टूबर तक चल रहे इस विशेष फिल्म प्रदर्शन में पहाड़ से पलायन, वीरान होते गांवों और पीछे छूट गए बुजुर्गों की पीड़ा को करीब से महसूस करने का अवसर मिल रहा है. 

शाम साढ़े छह बजे डिग्री कॉलेज मैदान में बने मोबाइल थिएटर पर नजर पड़ी तो कापड़ीजी का उत्तराखंड के लिए प्रेम, लगाव और जन मानस को हकीकत से रूबरू करा अपने हक की लड़ाई लड़ने का जज्बा जगाने का जुनून नजरों के सामने तैरने लगा. कापड़ीजी से मेरी यह पहली मुलाकात थी, सकून इस बात का रहा कि वो मुझे जानते हैं. मोबाइल थिएटर के अंदर कदम रखा तो किसी बड़े शहर के मल्टीप्लेक्स जैसा अहसास हुआ. कुछ ही देर में कुर्सियां भर गई. ज्यादातर चेहरे परिचित थे. ये वे लोग थे, जो समाज और अपने परिवेश को समझने के लिए कहीं से भी कुछ सीखने का अवसर मिले, तो उसे गंवाना नहीं चाहते. 

कुछ देर बाद कापड़ी जी फिल्म के उन बुजुर्ग कलाकारों के साथ थिएटर में पहुंचे, जिन्होंने अपनी उम्र के इस पड़ाव पर कैमरे के सामने आकर ऐसी कहानी को जीवंत कर दिया है, जो आज पूरे पहाड़ की कहानी बनती जा रही है. उन्होंने दर्शकों के साथ फिल्म बनाने के अनुभव साझा किए. उनके साथ आमा-बूबू के चेहरों पर एक अद्भुत सहजता और आत्मीय शांति थी. उन्हें देखकर लगा, मानो जीवन के इस पड़ाव पर उन्होंने कुछ ऐसा कर दिया हो, जो उनकी जिंदगी को एक नया अर्थ दे गया हो. ये कोई पेशेवर अभिनेता नहीं हैं. फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले इन दोनों बुजुर्ग कलाकारों ने जीवन में पहली बार कैमरे का सामना किया है. लेकिन पर्दे पर उनका अभिनय इतना सहज और सजीव है कि कई बार अभिनय और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर मिटने लगता है.

‘पायर’ (चिता) फिल्म उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के मुनस्यारी के पास के एक वीरान होते गांव की सच्ची घटना से प्रेरित है. कापड़जी ने बताया कि कुछ वर्ष पहले जब वो मुनस्यारी के पास के गांव में गए तो जर्जर और वीरान होते मकानों के दरवाजों में ताले लगे देख वो भीतर तक विचलित हो गए. कभी जीवन से गुलजार रहे घरों में अब सन्नाटा पसरा था. इसी वीराने के बीच उन्हें एक बुजुर्ग दंपती मिला, जो मानो अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था. 

और उसी मुलाकात ने इस फिल्म की कहानी को जन्म दिया. लेकिन यह कहानी किसी एक गांव, किसी एक परिवार या दो बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही. यह उन तमाम पहाड़ी गांवों का सच बन गई है, जहां रोजगार की तलाश में युवा घर छोड़कर दूर शहरों में जा बसे और पीछे रह गए माता-पिता की जिंदगी इंतजार में सिमटती चली गई. कुछ ही देर में फिल्म शुरू हो गई.

घुटनों में दर्द की वजह से मैं ज्यादा देर कुर्सी में बैठ नही सकता हूं, लेकिन फिल्म ने शुरूआत से लेकर मार्मिक अंत तक ऐसा बांधा कि घुटने भी चुपचाप फिल्म देखने में मग्न हो अपना दर्द भूल गए. फिल्म में 80वर्षीय बुजुर्ग दम्पति की कहानी है, जिनका बालक कई साल पहले घर से बिन बताये रोजगार की तलाश मे बाहर भाग गया. इधर धीरे-धीरे गांव भी खाली होता गया. घर बूढ़े होते गए और उन घरों में रह गए बूढ़े मां-बाप की आंखों में इंतजार ठहर गया.  

बेटे के लौटने की उम्मीद में दोनों एक-दूसरे को दिलासा देते रहते हैं. शायद इसी उम्मीद के सहारे उनकी सांसें भी चल रही हैं. लेकिन इंतजार जब बहुत लंबा हो जाता है, तो उम्मीद भी कई बार इंसान को भीतर से तोड़ने लगती है. फिल्म में ऐसे क्षण आते हैं, जब जीवन से थक चुके ये बुजुर्ग गहरी खाई में कूदकर अपनी जीवनलीला समाप्त करने की बात करते हैं. ये संवाद केवल दो किरदारों का दर्द नहीं हैं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था पर सवाल हैं, जिसमें अपने ही गांव में बूढ़े हो गए माता-पिता, अपनों की राह देखते-देखते अकेले पड़ जाते हैं. 

सबसे ज्यादा भीतर तक झकझोरने वाली बात यह है कि अकेलेपन से जूझता यह दंपती अपनी मृत्यु और अंतिम संस्कार यानी चिता तक का इंतजाम खुद करने की कोशिश करता है. फिल्म देखते हुए मन मे एक सवाल उठा, जिस मां ने बेटे को जन्म दिया, जिस पिता ने उसकी परवरिश के लिए अपनी पूरी जिंदगी खपा दी, एक दिन वही मां-बाप अपने अंतिम समय की तैयारी खुद करने को विवश हो जाएं..। इससे बड़ा अकेलापन और क्या होगा? इससे बड़ा सामाजिक सवाल और क्या हो सकता है?

फिल्म का अंत बेहद मार्मिक है. वह दर्शकों को भावुक भर नहीं करता, बल्कि भीतर तक हिला देता है. पर्दे पर कहानी खत्म होती है, लेकिन मन में कई सवाल जन्म लेने लगते हैं. आखिर पहाड़ के इन खाली होते घरों का भविष्य क्या है? रोजगार की तलाश में घरों से निकले युवाओं की मजबूरियां अपनी जगह हैं, लेकिन पीछे छूट गए माता-पिता की जिंदगी और उनके बुढ़ापे की जिम्मेदारी किसकी है?

फिल्म खत्म हुई. लाइट जली. थिएटर में बैठे लोगों के चेहरों पर एक गहरी खामोशी थी. यह सामान्य फिल्म के बाद वाली खामोशी नहीं थी, जब लोग उठकर अपने घरों को लौटने लगते हैं. यह उस पीड़ा की खामोशी थी, जिसे हर किसी ने अपने-अपने भीतर महसूस किया था. इस खामोशी को मेरे मित्र पंकज पांडे ने तोड़ा. उनकी आंखें नम थीं. वह रोते हुए विनोद कापड़ी जी और आमा-बूबू से लिपट गए. वह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था. शब्द शायद उस समय कम पड़ गए थे, इसलिए भावनाएं आंसुओं के रास्ते बाहर आ गई. 

इसके बाद आमा-बूबू के साथ तस्वीरें खिंचवाने का सिलसिला शुरू हो गया. लोग उनके साथ तस्वीरें लेने के लिए उत्सुक थे. लेकिन इन बुजुर्ग कलाकारों की सहजता देखने लायक थी. किसी बड़े सितारे जैसे नखरे नहीं, कोई बनावटी अंदाज नहीं. वे सबके साथ आत्मीयता से मिल रहे थे, मुस्कुरा रहे थे और तस्वीरें खिंचवा रहे थे. उनकी सादगी में भी पहाड़ की मिट्टी की खुशबू थी.

इस फिल्म को देश-विदेश के फिल्म समारोहों में सराहना और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं. मैंने सुना कि, यूरोप के प्रतिष्ठित 28वें टैलिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में मिली पहचान ने भी इसे विशेष चर्चा में रखा है. लेकिन मेरे लिए इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कारों की सूची नहीं, बल्कि वह सवाल है, जो इसे देखने के बाद मन में देर तक बना रहता है.

‘पायर’ कोई मसाला या व्यावसायिक मनोरंजन वाली फिल्म नहीं है. यह शांत और धीमी गति से आगे बढ़ती एक कलात्मक फिल्म है, जो शोर नहीं मचाती, लेकिन अपने मौन से बहुत कुछ कह जाती है. यह आंखों को नम करने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर करती है. ऐसी फिल्में खत्म होने के बाद भी दर्शक के भीतर चलती रहती हैं. 

विनोद कापड़ी जी से विदा लेकर घर लौट आया, लेकिन फिल्म से पीछा छुड़ाना आसान नहीं था. रात को बिस्तर पर लेटा, तो अपना बिस्तर भी ‘पायर’ के उन दृश्यों की तरह महसूस होने लगा. आंखें बंद करता, तो आमा-बूबू के चेहरे सामने तैरने लगते. उनका अकेलापन, बेटे की प्रतीक्षा और अपनी ही चिता की चिंता बार-बार मन को बेचैन कर रही थी. सोचता रहा, आखिर विकास की हमारी परिभाषा में उन बुजुर्गों के लिए कितनी जगह है, जिनकी जिंदगी अपने ही घर में इंतजार करते-करते बीत रही है? पहाड़ से पलायन की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन उन घरों के भीतर झांकने की फुर्सत कितनों को है, जहां बूढ़ी आंखें आज भी दरवाजे पर किसी अपने की आहट सुनने को तरसती हैं?

‘पायर’ ने उस शाम मुझे सिर्फ एक फिल्म नहीं दिखाई. उसने पहाड़ के एक ऐसे सच से सामना कराया, जिसे देखकर लौट आना आसान नहीं है. विनोद कापड़ी जी को ग्रेट सैल्यूट. पहाड़ के इस दर्द को पर्दे पर उतारने के लिए ही नहीं, बल्कि उस सवाल को हमारे सामने खड़ा करने के लिए भी, जिससे हम अक्सर आंखें चुरा लेते हैं. फिल्म खत्म हो गई है, लेकिन पहाड़ के इन जैसे कई आमा-बूबूओं का अपनों का इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ.

नोट : ‘पायर’ फ़िल्म 30 अक्टूबर को सिनेमा हॉल में रिलीज़ होने वाली है.

बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

इसे भी पढ़ें : ‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है

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