समाज

कल है फूलदेई

प्रकृति की गोद में पलने और बढ़ने वाले पहाड़ियों का पर्व फूलदेई है कल. पहाड़ियों का जीवन में प्रकृति का हर रंग मौजूद रहता है दुनिया इसे पहाड़ियों की लोक संस्कृति कहती है. पहाड़ियों का लोक और पहाड़ियों की रीत की वजह से उनकी संस्कृति विशिष्ट मानी जाती है. फूलदेई, पहाड़ियों की विशिष्ट संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है.    
(Phooldei 2022)

पहाड़ी कौम हर मौसम का स्वागत बकायदा त्यौहार की तरह करती है. पहाड़ी लोक संस्कृति में फूलदेई बसंत के इस्तकबाल का त्यौहार है. जिसमें पहाड़ियों का प्रकृति से लगाव उनकी लोक संस्कृति में भर-पूर दिखता है. कुमाऊँ और गढ़वाल मंडल में इसे फूलदेई कहा जाता है तो जौनसार बावर में गोगा. चैत के महीने की पहली गते यानी चैत्र माह की पहली तिथि को पहाड़ी फूलदेई का त्यौहार मनाते हैं.
(Phooldei 2022)

सौरपक्षीय पंचांग चलने के कारण उत्तराखंड में चैत महीने की शुरुआत संक्रान्ति के दिन से मानी जाती है. सुबह सवेरे महिलायें घर की लिपाई पुताई करती हैं और बच्चे नहा-धोकर फूल तोड़ लाते हैं. इसके बाद फूल और चावल के दाने से गांव के हर घर की देहली में ले जाकर उसका पूजन करते हुये गीत गाते हैं:

फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार…फूल देई-छ्म्मा देई.
फूल देई माता फ्यूला फूल
दे दे माई दाल-चौल.

इस दौरान देहली कफ्फू, भिटोर, आडू-खुमानी आदि के फूलों से पूजी जाती है. देहली पूजने के बाद बच्चों को घर की सबसे बड़ी महिला चावल, गुड़ और कुछ पैसे दिये जाते हैं. बच्चे इन चावलों को अपने घर ले जाते हैं इन चावलों से रात को घर में त्यौहार मनाया जाता है.

पहाड़ों में आज भी बच्चों की टोलियां पतली पगडंडियों पर फूलदेई के दिन एक घर से दूसरे घर जाते दिख जाती हैं. पिछले कुछ सालों में सोशियल मिडिया के चलते देश-विदेश में रहने वाले पहाड़ियों की तस्वीरें भी खूब देखने को मिलती हैं.
(Phooldei 2022)

काफल ट्री डेस्क

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