फोटो : सुधीर कुमार
चैत्र का महीना शुरू हो गया था. सभी ब्याहताओं की तरह वह भी अपने भाई का रस्ता देखने लगी. भाई आएगा और भिटौली लाएगा. उसके आने से गांव-घर के दुःख-सुख पता चलेंगे. वह गरीब परिवार से थी. बाबू बचपन में ही छोड़कर चले गए. घर में बस छोटा भाई और इजा थे. कच्ची उमर में ही वह ब्याह दी गयी थी. मायका ससुराल से चार गांव, चालीस कोस अस्सी गाड़-गधेरे पार था. उन दिनों मायके से जुड़ाव का मौका भिटौली का महीना ही होता था. न आने-जाने के साधन थे न घर-बन के काम से फुरसत ही मिलती. अरसे से न माँ और घर की कुशल पता थी न गाँव के हाल. (Folk Tale of Uttarakhand)
गाँव में सभी बहू-बेटियों की भिटौली आने लगी थी. सभी जैसे चहकने लगी थी. बस उदास थी तो सिर्फ वही. फिर भी उसे भाई के आने की आस थी. वह आशा भरी उदासी में रहती. कई दिन बीत गए तो उसकी उदासी चिंता में बदल गयी. अनिष्ट की आशंका से ने उसे घेर लिया — उसके घर में सब ठीक तो है! इजा और भुला की तबियत तो खराब नहीं. एक दिन वह घर, गोठ और जंगल के काम निपटाकर अपने मायके की चिंता में घुली दो घड़ी लेटी लेटी तो उसकी आँख लग गयी.
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संयोग देखो, उसी दोपहर उसका भाई भी भिटौली लेकर पहुंच गया. इजा ने तड़के ही पकवान बांधकर उसे बहन के घर रवाना कर दिया था. बहन का घर दूर था और रास्ता लम्बा. अब शाम को लौटना भी हुआ, बहन के घर में रह भी तो नहीं सकता था. बहन को भाई के आने की आहट मालूम न हुई तो वह उसके सिरहाने बैठ गया. घर-बार देखा तो उसे बहुत अच्छा लगा. सुकून से सोई बहन को उसने धीमे से आवाज भी लगाई पर वह नहीं उठी. भाई छोटा ही था तो उसे समझ नहीं आया कि बहन को नींद से जगाये या नहीं. शाम होने को थी तो उसे निकलना भी था. इजा ने रात तक लौट आने को कहा था. फिर रात ज्यादा होने पर जंगली जानवरों का डर अलग था. भारी मन से उसके अपनी दीदी को टीका लगाया, भिटौली की टोकरी उसके सिरहाने रखी और लौट आया.
बहन के सपने में उसका भाई आया जो भिटौली की टोकरी लिए मुस्कुराता सामने खड़ा पुकार रहा था — दी! दीदी! इसी पल उसकी नींद खुली. भाई इस समय तक वापसी का आधा रास्ता तय कर चुका था. वह उठी तो देखा सिरहाने पर भिटौली की टोकरी धरी हुई है. उसने पूरा घर देखा फिर गाँव के रास्ते. दूर तक भी उसका भुला दिखाई नहीं दिया. वह तो पहाड़ चढ़कर दूसरी ओर ढलान में गुम हो चुका था.
वापस लौटी तो उसका दिल भारी था, जैसे कितना बोझ रख दिया गया हो. वह फूट-फूटकर रोने लगी. वह रोती हुई कहने लगी — ये कैसी जो नींद आई मुझे. मैं सोती रही और भिटौली लेकर दूर से भेंटने आया मेरा भुला वापस लौट गया. दिन भर का भूखा होगा बेचारा बिना खाए-पिए ही लौट गया. उससे दो बातें कर मायके का हाल-चाल लेना तो दूर मैं उसे दो घूँट पानी भी न पिला सकी. खाना खिलाना तो दूर.
‘भै भुखो मैं सिती’ यानि भाई भूखा था और मैं सोती रही कहते हुए वह फूट-फूटकर रोटी रही और इस सदमे में उसके प्राण निकल गए. मृत्यु के बाद उसे अगला जनम पक्षी का मिला. आज भी चैत्र बैशाख के महीने में यह पक्षी करुण स्वर में ‘भै भुखो मैं सिती’ बोलता रहता है. इस चिड़िया का उदास स्वर भाई-बहन के उस प्यार को याद दिलाकर कलेजा चीर देता है.
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