कला साहित्य

ओ ना मासी धंग – गीता गैरोला की कहानी स्मिता कर्नाटक की आवाज में

हमारी नियमित लेखिका गीता गैरोला ने आपको अनेक मनभावन कहानियां सुनाई हैं. हाल ही में हमने उनकी मशहूर किताब ‘मल्यो की डार’ के एक अध्याय को हरिद्वार में रहने वाली स्मिता कर्नाटक की आवाज़ में सुनाया था. यह ऑडियो सीरीज अब से हर सप्ताह जारी रहेगी. (O Na Masi Dhang Audio Smita Karnatak)

स्मिता ने नैनीताल के डीएसबी कैम्पस से अंग्रेजी में एम ए किया है और वे विविध वेब पत्रिकाओं और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर छपती रही हैं. उनका एक पीस हमने कुछ समय पहले छापा था – रानीखेत के करगेत से कानपुर तक खिंची एक पुरानी डोर (O Na Masi Dhang Smita Karnatak)

इस सीरीज की अन्य ऑडियो कहानियों के लिंक ये रहे:

कुणाबूड
देवता का खेल
घने कोहरे के बीच
वहीं पड़ा है समय
मल्यों की डार
मेरे मास्टर जी
प्यारे चक्खू
कोदे की फंकी
चौमास
बिजी जा
स्याही की टिक्की – गीता गैरोला की कहानी स्मिता कर्नाटक की आवाज में

आज सुनिए इस किताब से – ओ ना मासी धंग

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गीता गैरोला और स्मिता कर्नाटक

स्मिता कर्नाटक. हरिद्वार में रहने वाली स्मिता कर्नाटक की पढ़ाई-लिखाई उत्तराखंड के अनेक स्थानों पर हुई. उन्होंने 1989 में नैनीताल के डीएसबी कैम्पस से अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. किया. स्मिता पढ़ने-लिखने में विशेष दिलचस्पी रखती हैं.

गीता गैरोला. देहरादून में रहनेवाली गीता गैरोला नामचीन्ह लेखिका और सामाजिक कार्यकर्त्री हैं. उनकी पुस्तक ‘मल्यों की डार’ बहुत चर्चित रही है. महिलाओं के अधिकारों और उनसे सम्बंधित अन्य मुद्दों पर उनकी कलम बेबाकी से चलती रही है. काफल ट्री की नियमित लेखिका.

‘मल्यों की डार’ में लेखिका के बचपन और किशोर उम्र से जुड़े हुए अठारह कथात्मक संस्मरण हैं जो उस परिवेश की मिट्टी की गंध से तो सराबोर हैं ही, अपनी लोक भाषा का वह जातीय मुहावरा भी प्रस्तुत करती हैं, जिसने हिदी भाषा और संस्कृति को समृद्ध किया. इन रचनाओं में गीता के पूर्ववर्ती उत्तराखंडी स्त्री कथाकारों महादेवी वर्मा और शिवानी की छाया नहीं, उनका रचनात्मक वैभव भी साफ झलकता है. ये रोचक किस्से भी हैं और स्मृतियों के भरपूर खजाने भी. ‘प्यारा चक्खू’ तो महादेवी के चरित्रों की संवेदना को साक्षात् ला खड़ा करता है. ‘मल्यों की डार’, कोदे की फंकी’, ‘नजीब दादा’, ‘ओ ना मासी धंग’, ‘स्याही की टिक्की’ आदि अनेक रचनाओं में भोला बचपन ही नहीं, वह शिशु उत्तराखंड भी है, जिसकी कल्पना इस नवजात राज्य के संस्कारों के रूप में यहाँ के लोगों ने की थी, मगर जिसकी यहाँ के लोगों ने क्षेत्रीयता के अति-उत्साह या जुनून में असमय हत्या कर दी है. यह कम आश्चर्यजनक नहीं है कि गढ़वाल और कुमाऊँ, पहाड़ और मैदान जितना पिछले डेढ़ दशक में अपनी घिनौनी शक्ल के साथ उभरा है, शायद इससे पहले कभी नहीं. अभी पिछले वर्ष की राजनीतिक घटना ने तो मानो यहाँ के लोगों को बदबूदार चुल्लू भर पानी सौंप दिया है.

‘मल्यों की डार’ की भाषा को पढ़ते हुए मुझे अपने प्रिय कथाकार विद्यासागर नौटियाल की याद आती रही. मैंने एक बार नौटियाल जी से कहा था कि क्या कारण है कि आपके साहित्य में प्रयुक्त गढ़वाली शब्दों और वाक्यों को पढ़ते हुए मुझे वह कुमाऊनी ही लगती है जब कि कई बार गढ़वाली के अनेक शब्दों को समझने में दिक्कत होती है. विद्यासागर जी ने बताया था कि उनकी माँ कुमाऊँ-गढ़वाल के दुसाद क्षेत्र की थीं इसलिए उनकी भाषा में गढ़वाली-कुमाऊनी का कलात्मक मिश्रण है. ठीक यही बात मुझे गीते गैरोला की भाषा में भी लगी.

एक और उपलब्धि इस रचना में विचारधाराओं या वैचारिक आग्रहों के स्थान पर मानवीय स्पर्शों का चयन है, जो आज के रचनाकारों में कम दिखाई देता है … नए लेखकों में तो बहुत कम.
-बटरोही

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Sudhir Kumar

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  • चौमासा में पहाड़ी औरतों के कठिन जीवन का कारुणिक चित्रण और पलायन से दुखी पहाड़ की व्यथा बरबस ही पलकें भिगो देती हैं, जितनी सुन्दर कहानी की भाषा है ,उतनी ही सहज सुनाने की शैली भी। उत्तम कहानियां ।

  • ओ ना मासी ढंग, बहुत अच्छी सरल कहानी है । इस कहानी को पेश करने के लिए धन्यवाद ।

  • बहुत खूब, शानदार प्रस्तुति।
    सुनकर अपना वह बचपन याद आ गया जब पहले पहल मेरे दादाजी ने एक चौडी लकड़ी की तख्ती पर महीन लाल मिट्टी बिछाकर उस पर मेरी कोमल सी दाहिने हाथ की अंगूठे के साथ वाली ऊ़ंगली को पकडकर 'ॐ नमः सिद्धम' लिखा और मेरे तोतले मुंह से बुलवाया था।

    इस सूत्र –‘ॐ नमः सिद्धम’ का भावार्थ यह है कि ‘जिसने योग या तप के द्वारा अलौकिक सिद्धि प्राप्त कर ली है,या जो बात तर्क और प्रमाण के द्वारा सिद्ध हो चुकी है,उसे नमस्कार।’🙏

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