फ़िल्मों की बहार उर्फ़ जाने कहां गए वो दिन – 3

(पिछली किस्त से आगे)

और नजीर हुसैन हमेशा न जाने कैसे कोई एक बेहद अमीर आदमी होता है. उसकी बीवी नहीं होती. संतान केनाम पर एक मात्र लड़की होती है – जवान और खूबसूरत. वह फिल्म के शुरू में बी.ए. के साथ पार्ट टाइम इश्क भी करती है. दो-एक गानों के बाद इश्क में होल-टाइमर हो जाती है, कॉलेज पार्ट टाइम जाती है. इस इश्क में कोई पच्चर फंसा होता है. समझ लीजिए कि लड़के के बाप का पता ही नहीं या हो सकता है कि लड़के की माँ के बारे में समाज जब फुर्सत में जुगाली करता है तो कुछ ऐसी-वैसी बातें करता है. यह बात सिर्फ नजीर हुसैन जानता है. कई बार लड़की भी जानती है तो वह बाप से ज़बान लड़ाती है – लेकिन डैडी मैं पूछती हूँ कि इसमें अशोक का क्या दोष है. नजीर हुसैन दीवार में टंगी दिवंगत पत्नी की तस्वीर के पास जा खड़ा होता है – पार्वती अच्छा हुआ तुम चली गईं. मैं अभागा रह गया यह दिन देखने के लिए. इस लड़की के कारण ज़माना आज मुझ पर थूक रहा है. मेरी परवरिश में ही शायद कोई कमी रह गयी होगी. टीम होतीं तो शायद ये दिन न देखना पड़ता … अब क्योंकि फिल्म की एक-दो ही रीलें बची हैं इसलिए ग्रहदशा एकाएक अनुकूल होने लगती है. लड़के का बाप प्रकट हो जाता है और वह कोई रायबहादुर/ खानबहादुर से कम नहीं निकलता. और अगर लड़के की माँ के बारे में कोई चर्चा है तो वह भी साफ हो जाता है कि दर असल वह उस रात सेठ दीनानाथ की हवेली में उन्हें राखी बाँधने गयी थी जिस से समाज को भूलवश गलतफहमी हो गयी. वरना कौन नहीं जानता कि वो बुढिया तो इतनी शरीफ है कि आज तक अपने पति का मुंह भी उसने नज़र भर कर नहीं देखा. देखा बहन मैं न कहती थी कि सुमित्रा बहन जैसी भली मांस इस जहान में ढूंढें से न मिलेगी. आग लगे इस समाज के मुंह में जो जी में आया बक दिया. ललिता पवार जैसी सास कोई लड़की नहीं चाहेगी और निरुपमा रॉय जैसी सास हर लड़की को मिले. इफ्तखार अगर पुलिस अफसर नहीं है तो वह इफ्तखार किस काम का. ऐसे ही कई और भी अनगिनत सनातन सत्य है हिन्दी सिनेमा के – हवा-पानी की तरह.

जिस इंटर कॉलेज में आठवीं से आगे की पढाई के लिए दाखिला लिया उसका रास्ता पिक्चर हॉल से होकर गुजरता था. नवीन दसवीं में जो फीस पड़ती थी उसे हम बाप की पे-स्लिप दिखाकर पूरी या आधी माफ करा लिया करते थे. फीस पूरी माफ हुई तो घर में आधी बताई, आधी माफ हुई तो घर में कहा इस बार माफ नहीं हुई पूरी पड़ेगी. फीस-डे मतलब पिक्चर-डे.

मैं और मेरा वही पव्वा-चप्पल चोर दोस्त अक्सर बस्ते में जूट का एक कट्टा रख ले जाते. कट्टा कैंटीन में रख देते. इंटरवल में भागकर वहाँ पहुँचते जहां आज अल्मोड़ा की लॉ फैकल्टी है. वहाँ उन दिनों लाल मिट्टी की खान थी. हम एक कट्टा मिट्टी भरते, मैं अपने दोस्त के फटे जूते और बस्ता उठाता वह मिट्टी भरा कट्टा. लिपाई पुताई के काम आने वाली यह मिट्टी चार रूपये में बिकती थी. अब एक अठन्नी की दरकार होती. पिक्चर पक्की.
दक्षिण भारतीय फिल्मों का अलग किस्सा है. इनका निर्माण लोगों की यौन कुंठाओं को दुहने के लिए किया जाता था. यह पिक्चरें अमूमन जाड़ों में लगा करती थीं. पिक्चे क्योंकि वर्जित विषय पर होती इसलिए ६ से ९ वाला शो सबकी सहूलियत का होता. पर्याप्त अँधेरे के कारण किसी परिचित द्वारा देखे जाने की आशंका कम रहती. अब यह बात अलग है कि परिचित या तो पहले हॉल में बैठा होगा या आपसे ज्यादा शातिर हुआ तो फिल्म शुरू होने के कुछ पल बाद हॉल में घुसेगा, जब बत्तियाँ गुल कर दी जाएँगी.

इन फिल्मों को जिस चीज़ के लिए देखा जाता वह मूल तत्व पिक्चर में उतना ही होता जितना होटल के पालक-पनीर में पनीर मिलता है. फिल्म में एकाध मिनट का एक सीन जोड़ दिया जाता जिसका फिल्म की बेसिरपैर की कहानी से कोई सम्बन्ध नहीं होता था. उस दृश्य में एक जोड़ा स्त्री-पुरुष प्राकृतिक अवस्था में वही शारीरिक क्रिया बड़े मनोयोग से संपादित कर रहे होते जिसे आदिकाल से एकांत में करते आए हैं और वेंटिलेटर की मदद से जीवन जब एक्सटेंशन में चल रहा होता है तब भी करने की तमन्ना रखते हैं. ऐसा दूसरा सीन हाफ टाइम के लगभग तुरंत बाद आता था. इसके बाद हॉल में नौसिखिए रह जाते या वो जिनका “जब तक सांस है तब तक आस है” पर अटल विशवास होता. अनुभ्वीजन हॉल को यूं छोड़ देते जैसे लम्पटों की सभा का त्याग सत्पुरुष के देते हैं.

आसपास के दुकानदारों को हॉल के स्टाफ से मालूम पड़ जाता कि पहला सीन कितने बजे है और दूसरा कितने बजे. वे लोग ठीक समय पर दरवाजा खोलकर भीतर घुसते, वहीं खड़े-खड़े दर्शन कर फिर दूकान में जा बैठते. सार-सार को गहि रहे, थोथा देहि उडाय.

ऐसी पिक्चरों के टिकट कुछ इज्ज़तदार लोग दूसरों से मंगवाते थे. ऐसे ही लोग शराब और कंडोम भी औरों से मंगवाते हैं. बड़े-बड़े महारथी नज़र आ जाया करते थे हॉल में, टोपी,मफलर और काले चश्मे की ओट लिए.

दर्शकों द्वारा फिल्म पर छींटाकशी का भी रिवाज़ था. मिसाल के तौर पर विलेन की स्वाभाविक इच्छा है कि वह हीरोइन के साथ थोडा सा बलात्कार कर ले.पर हीरोइन है कि बात को समझ नहीं पाती. कोई भगवाधारी समझाए इसे कि भई आस्था का प्रश्न है. तो साहब काफी देर बाद भी जब विलेन हीरोइन का पल्लू तक नहीं हटा पाता था तो दर्शकों में से कोई मदद की पेशकश करेगा- अबे मैं आऊँ क्या! या हीरोइन को एक दिन वॉश बेसिन के आगे खड़े होकर इलहाम होता है कि वह जो दो-चार बार हीरो के साथ नाची-गाई थी उसी वजह से उसे गर्भ रह गया. और उधर हीरो गायब! वह कश्मीर के मोर्चे पर गया था जहां उसने शुरू में तो दुश्मनों के साथ नींबू सानकर खाया और शत्रुओं के दांत खट्टे कर दिए. मगर अब सरकार कहती है कि वह लापता है. हाय राम, अब क्या होगा? ऐसे में हीरोइन किसी मूर्ती के आगे जाकर कहेगी – हे भगवान, मेरे चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है … मूर्ति चुप रहेगी, कोई दर्शक राय देगा – मोमबत्ती जला, मोमबत्ती और भविष्य के लिए संतति निरोध का कोई साधन भी बता देगा.

पिक्चर हॉल में कई बार ऐसी दुर्घटनाएं भी हो जाया करती थीं कि अगली सीट पर बैठे जिन भाईसाहब से आपने माचिस माँगी थी, इंटरवल में जब बत्तियाँ जलीं तो वे आपके सगे बाप साबित हुए.

यह सारा किस्सा तब तक अधूरा और अलोना है जब तक कि एक सज्जन का ज़िक्र न कर लिया जाए. यादों की बरात का दूल्हा सचमुच वही हैं. वे सज्जन काफी उम्रदराज़ थे और उस उम्र में भी मेहनत मशक्कत का काम किया करते थे. दरमियाना कद, दुबली काया पर कुरता-पायजामा-वास्कट, सर पर टोपी और आँखों में मोटा सा चश्मा. उनकी आँखें बेहद कमज़ोर थीं. एक बार मैंने उन्हें दीवार से चिपका इश्तहार पढते देखा. वे इश्तहार से चेहरा यूं सटाए थे गोया इश्तहार को चाट रहे हों. उन जैसा पिक्चर प्रेमी देखने में नहीं आया. यह संस्मरण मैं उन्हीं अनाम बुजुर्गवार को समर्पित करता हूँ.

वे सज्जन एक अनुवादक के सहारे पिक्चर देखते थे. एक कमसिन बच्चा उनकी बगल की सीट पर बैठा उनके लिए पिक्चर की रनिंग कमेंट्री किया करता था – हाँ अब गाना हो रहा है, ना कोठे में नहीं, घर में नाच रही है. नाम पता नहीं कोई नई है. न ज्यादा मोटी, न दुबली जैसी हीरोइन होती है. हीरो जीतेन्दर है. गद्दार अभी नहीं आया पर मैंने पोस्टर में देख लिया था. प्रेम चोपड़ा है. हाँ वही शीशे से पत्थर तोड़ने वाला. हीरोइन नहा रही है. परदे के पीछे है. अल्ला कसम कुछ नहीं दिख रहा. गद्दार और हीरो में मारपीट हो रही है. हीरो रस्से से लटक कर बदमाशों को मार रहा है. ये पडी एक के लात – शीशा तोड़ते हुए बाहर छतक गया. हीरो क्यों हारेगा. हीरोइन को परेशान करता था न. हाँ … अच्छा गद्दार अगर फूल को जूते से मसल दे तो हीरोइन की इज्ज़त लुट जाएगी? कैसे पता? तजुर्बा क्या होता है? हीरो इज्जत क्यों नहीं लूटता? कोई भी आदमी फूल पे पाँव रख के इज्जत लूट सकता है? इज्जत क्या होती है? सलवार-कमीज़ में तो हीरोइन की इज्जत एक भी पिक्चर में नहीं लुटी … क्यों … चुप हो जाऊँगा तो कहोगे कि ठीक से बताया नहीं, मज़ा नहीं आया … हाँ चलो हाफ टाइम हो गया. चाय पी लो, मैं पकौड़ा खाऊंगा.

इति फ्लैशबैक स्टोरी.

शंभू राणा 

शंभू राणा विलक्षण प्रतिभा के व्यंगकार हैं. नितांत यायावर जीवन जीने वाले शंभू राणा की लेखनी परसाई की परंपरा को आगे बढाती है. शंभू राणा के आलीशान लेखों की किताब ‘माफ़ करना हे पिता’  प्रकाशित हो चुकी  है. शम्भू अल्मोड़ा में रहते हैं और उनकी रचनाएं समय समय पर मुख्यतः कबाड़खाना ब्लॉग और नैनीताल समाचार में छपती रहती हैं.

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