कला साहित्य

खट्टी चटनी जैसी माँ

खट्टी चटनी जैसी माँ

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ

याद आती है चौका-बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे

आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ

चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली

मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बिवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में

दिन भर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा, माथा,
आँखें जाने कहाँ गई

फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार

मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

लेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव

सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत

पूजा घर में मूर्ती मीर के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर

अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप

सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास

चाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान

1938 दिल्ली में पिता मुर्तुज़ा हसन और माँ जमील फ़ातिमा के घर माँ की इच्छा के विपरीत तीसरी संतान नें जन्म लिया जिसका नाम मुक़्तदा हसन रखा गया. बचपन ग्वालियर में गुजारा यहीं पढ़ाई पूरी कि. छोटी उम्र से ही लिखने वाले मुक़्तदा का लेखकीय नाम निदा फ़ाज़ली है. निदा का अर्थ है स्वर या आवाज़. फ़ाज़िला क़श्मीर में निदा का पुश्तैनी गांव है, जहाँ से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे. क़ौमी दंगों से तंग आ कर उनके माता-पिता पाकिस्तान चले गए, लेकिन निदा भारत में रहे. कमाई की तलाश में कई शहरों में 1964 में निदा काम की तलाश में बम्बई चले गए और धर्मयुग, ब्लिट्ज़ जैसी पत्रिकाओं, समाचार पत्रों के लिए लिखने लगे. जल्द ही वे लोकप्रिय हो गए. उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह 1969 में छपा. आँखों भर आकाश, मौसम आते जाते हैं , खोया हुआ सा कुछ, लफ़्ज़ों के फूल, मोर नाच, आँख और ख़्वाब के दरमियाँ, सफ़र में धूप तो होगी उनकी प्रमुख कृतिया हैं. 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किये गए.

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इसे भी पढ़ें : चार कहानियाँ मंटो की

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Sudhir Kumar

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  • निदा फ़ाज़ली माने पहली बरसात की महक ।

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