अब भी अधूरा है बलात्कार संबंधी नया क़ानून

संसद के मानसून सत्र में सरकार द्वारा पूर्व में बलात्कार संबंधी कानूनी अध्यादेश को पारित किया जा चुका है. पूरे देश में वर्तमान सरकार द्वारा बलात्कार संबंधी नये कानून को सराहा जा रहा है. नये कानून के लागू होने के पश्चात 12 वर्ष से कम आयु की बच्ची का बलात्कार किये जाने पर अपराधी को फांसी की सजा या न्यूनतम बीस साल का सश्रम कारावास तक की सजा होगी. वहीं 12 से 16 वर्ष तक की आयु की लड़की का बलात्कार होने की स्थिति में न्यूनतम सजा 20 वर्ष का सश्रम कारावास कर दी गयी है. अभियुक्त को अग्रिम जमानत न मिलने का भी प्रावधान किया गया है. फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामले की सुनवाई होगी सो ऐसे मामलों में अब लगभग 6 माह में निर्णय सुनाया जायेगा.

इस अध्यादेश की आवश्यकता बच्चों पर बढे यौन अपराधों के कारण पड़ी. अकेले वर्ष 2016 में एक लाख से अधिक मामले पोक्सो-2013 (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी कानून) के तहत दर्ज हुए हैं. जिनमें केवल 229 मामलों में ही निर्णय सुनाया गया. इसमें लगभग 70 हजार मामले पिछले वर्ष से चले आ रहे थे.

इससे पूर्व बलात्कार संबंधी कानूनों में बड़ा बदलाव किया गया था जिसे आज के कानून के समान ही कठोर घोषित किया गया था. हालात यह हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 90 बलात्कार होते हैं. नये कानूनी बदलाव के पीछे अवधारणा यह है कि डर के कारण अ‍पराधी अपराध करने से डरेगा. कानून की यह अवधारणा बताती है कि सरकार बलात्कार जैसे मामलों को केवल यौन हवस और तृप्ति के मामले से ही जोड़कर देखती है.

जबकि वास्तविकता यह है कि यौन हिंसा के मूल में शक्ति या सत्ता द्वारा दूसरे को पीड़ित व अपमानित करना भी है. एक स्त्री या बच्ची के साथ यौन हिंसा अन्य स्त्रियों या बच्चियों के लिये चेतावनी होती है. शर्म, समाज और इज्जत से लदी महिला के लिये यौन अपराध के कानून सुरक्षा से अधिक आंतकित करने वाले हैं क्योंकि शिकायत दर्ज करने, जाँच करने व न्याय सुनाने तक प्रत्येक जगह पुरुषों का ही वर्चस्व है. विधान सभा संसद, कैबिनेट जैसे पदों पर बलात्कार के आरोपीयों का होना बलात्कारीयों के हौसले बुलन्द करते हैं.

जिस डर को केंद्र में रखकर पूरा कानून बुना गया है उस डर की हकीकत यह है कि यौन संबंधी अधिकांश अपराध तब किये जाते हैं जब अपराधी पूरी तरह आश्वस्त होता है कि उसे कोई नहीं पकड़ सकता. यह बात सामान्यतः अपराधों में लागू होती है कि अपराधी पकड़े न जाने का डर समाप्त करने की बाद ही अपराध करता है परंतु बच्चों से संबंधित यौन अपराधों में यह सौ प्रतिशत सही रहती है. अपराधी आश्वस्त रहता है कि मासूमियत के चलते बच्चों को आसानी से शिकार बनाया जा सकता है. भारत में हुए बलात्कार के कुल मामलों में 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में अपराधी कोई परिचित होता है. यह तथ्य इस अवधारणा को और मजबूत करता है कि अपराधी अपराध करते समय न पकड़े जाने या बच निकलने के प्रति आश्वस्त रहता है.

वर्तमान कानून अपने आप में कई मायनों में अधूरा है. 12 वर्ष से कम आयु के यौन अपराध में कठोर सजा केवल लड़की के संबंध में है जबकि हकीकत यह है कि बच्चों से संबंधित कुल अपराधों में 53 प्रतिशत लड़कों के विरुद्ध हुए हैं. पितृसत्तात्मक समाज के चलते वर्तमान में सरकार को बलात्कार को जैंडर न्यूट्रल घोषित करने में दिक्कत है पर कम से कम बच्चों के संबंध में इसे जैंडर न्यूट्रल घोषित किया जाना ही चाहिए जब आँकड़े भी इसके पक्ष में हों.

12 से 16 वर्ष की लड़कियों के बलात्कार के मामले में अलग कानून सरकार की मानसिकता दिखाता है. यह वही मानसिकता है जो लड़कियों के कपड़े और शारीरिक आकार को बलात्कार हेतु आमंत्रण मानता है. यह वहीं मानसिकता है जो अकेली लड़की को खुली तिजोरी मानता है. सोलहवें सावन का मानसिक संस्कार सरकार के सिर चढ़कर भी बोल रहा है.

यह नया कानून बलात्कार के सम्मुख सरकार का आत्ममर्पण है. 2013 में बनाये गये कानून को सरकार अब तक ढंग से लागू नहीं कर पायी है. 2013 के कानून के अनुसार बिना सहमति के किसी के नग्न चित्र या वीडियो डालना अपराध श्रेणी में आता है पर अब तक सरकार इस पर पूरी तरह विफल रही है. हर दिन कम से कम 100 नये एम.एम.एस इन्टरनेट में अपलोड किये जाते हैं. देसी सेक्स डाट और इंडीयन सेक्स स्टोरी जैसी साइट धड़ल्ले से चल रही पर सरकार मौन है.

इस पूरे प्रकरण में समाज जो कि मुख्य भूमिका में है वह कहीं नजर ही नहीं आता है. समाज की मानसिकता बदलने के लिये सरकार को कदम उठाने चाहिये जो नदारद हैं. सरकार बलात्कार ना हो इसके लिए प्रयास ही नहीं कर रही है. इसका एक सामान्य सा उदाहरण केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली सरकार को सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने हेतु धन का आवंटन ना करना है.

स्त्री व बच्चों के प्रति अपराध केवल इसलिए नहीं बढ़ रहे ही कानून कम कठोर है बल्कि इसलिए बढ़ रहे हैं कि उसे लागू करने वाली व्यवस्था कमजोर है. पूरे कानून में सरकार ने व्यवस्था में सुधार हेतु एक भी कदम नहीं उठाया है. सरकार ने यह तो तय कर दिया की बलात्कार के बाद क्या होगा पर यह तय नहीं कर पाये कि बलात्कार की घटना कैसे कम होगी.

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Girish Lohani

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