कला साहित्य

अपने को और मीठा और चिपचिपा बना रहा है नैनीताल

हरीशचन्द्र पाण्डे

उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के सदीगाँव में दिसंबर 1952 में जन्मे हरीशचन्द्र पाण्डे (Harish Chandra Pande) आजीविका के लिए भारतीय लेखा विभाग के महालेखाकार कार्यालय, इलाहाबाद में कार्य करते रहे. उनके सबसे महत्वपूर्ण कविता संग्रहों में ‘कुछ भी मिथ्या नहीं है’, ‘एक बुरुंश कहीं खिलता है’ और ‘भूमिकाएं ख़त्म नहीं होतीं’ प्रमुख हैं.

उनकी रचनाओं का अंग्रेज़ी के अलावा अनेक भारतीय भाषाओं में हुआ है. अपनी संवेदनशील कविता और सादगी भरी शैली के लिए जाने जाने वाले हरीशचन्द्र पाण्डे अनेक सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं.

उनकी कविता ‘नैनीताल’ इस मायने में अनूठी है कि वह एक पर्यटक नगरी को देखने का अलग और मानवीय कोण प्रस्तुत करती हैं. ऊबे हुए पर्यटक, नेपाल से आये कुली, भागे हुए लड़के और सांवली लड़कियां भी उसी नैनीताल का हिस्सा हैं जिसकी लकदक में सब कुछ सिर्फ चमकीला दिखाई देता है.

 

नैनीताल
-हरीशचन्द्र पाण्डे

लड़के रिजल्ट देखने के बाद
नहीं लौटते अपने गांव

बूढ़े ‘साथी’ थक कर लौट जाते हैं नेपाल
और अपने जवान बेटों को भेज देते हैं

हर खूबसूरत शहर को ऐसे ही ताज़े खुरदुरे पांवों की
दरकार होती है

लड़के होटलों के कमरे दिखा रहे हैं साहबों को
उन्हें सैर पर निकलता देख बाथरूमों में घुस जाते हैं
बाल संवारते हैं, हल्के खांसते हुए कालर और बेल्ट ठीक
करते हैं
और परिचितों से बचने की भरपूर कोशिश करते हैं

साथी
शहर के स्नायुतंत्र में रुधिर कणों की तरह दौड़ रहे हैं

वे जिनके पास ऊबने के लिए समय है जीवन में
ऊबने से बचने के लिए भी समय निकाल रहे हैं
और इस वक़्त
अपने बच्चों के लिए घोड़े तय कर रहे हैं
वे जिनके पास ऊबने के लिए समय नहीं है
घोड़ों की लीद निकालने के बाद
अब उनके अयालों पर कंघा फेर रहे हैं

पहाड़ की जड़ से टैक्सियां चींटियों सदृश चढ़ रही हैं
और शहर अपने को
और मीठा और चिपचिपा बना रहा है

सांझ जलतरंग सी बज रही है
सारे वाक्पटु
अपनी कलाओं की बारीकी और प्रजातांत्रिक वक्तव्यों के साथ
झील में उतर गए हैं
झील और पोषे हुए मरुस्थल के बीच
बैंड की धुनों पर लोग थिरक रहे हैं
जो लोग एक अंतराल के बाद आये हैं
वे कैप्टन रामसिंह के बैण्ड को रह-रह कर याद कर रहे हैं

इस वक़्त जब एक सांवली लड़की
अपने सांवलेपन पर झुंझला रही है
भागे हुए लड़के
सबसे ऊपरी मंजिल की खिड़की से
झील का बांकापन निहार रहे हैं
वे सामने शेरवुड, विश्वविद्यालय और गवर्नर हाउस की ओर
नज़रें उठा रहे हैं
उनके सिर के ठीक ऊपर बिड़ला कॉलेज है

उनकी आँखों में कुछ पालदार सपने डोल रहे हैं

ऊबे हुए लोगों को देख रहे हैं पिसे हुए लोग
ऊबे हुए लोग जल्दी से जल्दी छोड़ देना चाहते हैं शहर
सारे मनोरंजमों के बाद
अब वे सिंके हुए भुट्टों पर टूट पड़े हैं

बादल गड़गड़ा रहे हैं
साठो लोग घर के लिए चिठ्ठियाँ लिखवा रहे हैं
भागे हुए लड़के
जल्दी से देख लेना चाहते हैं अपना-अपना हिसाब
और सांवली लड़कियां
अपनी त्वचा का रंग
झील की सतह से फिर मिलाने लगी हैं …

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