ये कहानी है कठोपनिषद की ! इसके अनुसार ऋषि वाज्श्र्वा, जो कि परम ज्ञानी थे, ने विश्वजीत यज्ञ किया. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस यज्ञ के पूर्ण हो जाने पर, जीवन में किसी तरह का दुःख या विषाद नहीं रहता, हमेशा आनंद बना रहता है. इसी आकांक्षा से ऋषि यज्ञ कर रहे थे, जिसमें उन्हें अपना सम्पूर्ण धन दान देना था और वे अपने संकल्प के अनुसार सब कुछ दान करते जा रहे थे. सामने याचकों की पंक्तियाँ लगी हुयी थी. ऋषि के बग़ल में उनकी सारी सम्पत्ति का ढेर था और उनकी बहुत सारी गायें खड़ी हुई थीं, तो याचक एक-एक करके आते जा रहे थे और एक-एक चीज़ ले-ले कर वहाँ से निकलते जा रहे थे.
(Yamraj and Nachiketa Story)
पहले अच्छी-अच्छी वस्तुएँ जा रहीं थीं और निरंतर उनसे कम अच्छी वस्तुएं बची रह जा रही थीं. इसलिए याचकों में जल्दी-जल्दी आगे आने की उत्कंठा थी. एक समय ऐसा आया कि जब सब कुछ दान में चला गया और कुछ बूढ़ी गायें ही शेष रह गयीं. ऋषि बालक नचिकेता, जो उस समय 6 या 7 वर्ष का रहा होगा यह सब देख रहा था. उसने अपने पिता ऋषि वाज्श्र्वा से जाकर पूछा – पिताजी ये बूढ़ी गायें तो किसी काम की नहीं हैं, फिर आप इन्हें क्यों दान कर रहे हैं. ये तो याचकों के ऊपर बोझ बन जायेंगीं. इन्हें आश्रम में ही क्यों नहीं रहने देते?
ऋषि मुस्कुराकर बोले – मैंने सम्पूर्ण धन दान देने का संकल्प लिया है, तो मैं इन्हें अपने पास बचाकर नहीं रख सकता. अब ऋषि के ज्ञान के कोश में कहीं ना कहीं कोई कोना खाली रह गया था! वे भूल गए कि दान सिर्फ़ उपयोगी वस्तु का किया जाता है, जो दूसरों के काम आए. अनुपयोगी वस्तु दान करके तो आप याचक के ऊपर बोझ डालते हैं. किंतु ऋषि अपने यज्ञ को सफल होते देख इतना उन्मत्त थे कि उन्होंने इन सब बातों पर विचार ही नहीं किया. इधर नचिकेता ने ऋषियों की चर्चा के दौरान कभी सुना था कि पुत्र भी पिता का धन ही होता है. तो उसके बाल मन में ये विचार उठा कि चूँकि पिता ने सम्पूर्ण धन दान देने का संकल्प लिया है, तो वे मुझे भी अवश्य ही दान करेंगे! जबकि ऐसा कोई विचार ऋषि वाज्श्र्वा के मन में नहीं था. उनका दान वस्तुओं और गायों तक ही सीमित था, सो वे अपने काम की सम्पूर्णता में लगे हुए थे. तभी नचिकेता वापस उनके पास पहुँचा और बोला – आप मुझे किसको दान करेंगे?
(Yamraj and Nachiketa Story)
ऋषि ने सोचा बालक मन है, ऐसे ही पूछ रहा है, तो उन्होंने उसका कोई जवाब नहीं दिया. नचिकेता ने दोबारा पूछा? तब ऋषि अपनी अंतिम गाय दान करने जा रहे थे. इसीलिए उन्होंने जानबूझकर नचिकेता पर ध्यान नहीं दिया! नचिकेता ने फिर तीसरी बार पूछा – आप मुझे किसको दान करेंगे!
ऋषि अपने कार्य में विघ्न होता देख क्रोधित हो गए और गुस्से में बोले – यमराज को
नचिकेता ये सुनकर वहाँ से चल दिया और आश्रम में ही उपस्थित एक बृद्ध साधु से उसने पूछा – यमराज कहां रहते हैं?
बृद्ध साधु ने बालसुलभ प्रश्न समझ कर कह दिया, “यम लोक में, यहां से बहुत दूर!” बस फिर क्या था. नचिकेता वहाँ से निकल गए, अपने यमलोक के सफ़र पर.
आश्रम के सब लोग उस समय यज्ञ में संलग्न थे, तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, इधर नचिकेता चलते–चलते, चलते–चलते, जंगल, पहाड़, सब पार करते–करते चले ही जा रहे थे. न उन्हें भूख की चिंता थी, न प्यास की खबर. उन्हें किसी तरह का भय भी न था. वह तो बस दृढ़ निश्चय करके चले थे कि यमराज के पास जाना है, बस! चलते–चलते वह अपने लक्ष्य के प्रति इतने एकाग्र हो गए कि उन्हें तन– मन की सुध ही भूल गई और एक जगह वह अचेत होकर गिर पड़े. वह गिर तो गए पर उनकी चेतना अभी भी अपने लक्ष्य के सफ़र पर ही थी और वह सूक्ष्म शरीर के साथ यमलोक पहुँच गई.
(Yamraj and Nachiketa Story)
है न थोड़ी विचित्र बात यह. पर कहानी में ऐसा ही विवरण मिलता है दोस्तो. आप फिलहाल यकीन करते हुए कथा में आगे बढ़ते जाओ. नचिकेता के लिए यमलोक वैसा ही था जैसी उन्होंने आते वक़्त कल्पना की थी. नचिकेता यमलोक के द्वार पर पहुँचे, तो उन्हें यमदूतों ने अंदर प्रवेश नहीं करने दिया. नचिकेता ने जब उनसे कारण पूछा, तो यमदूतों ने कहा कि यहाँ प्राणी मृत्यु के बाद ही आ सकता है. नचिकेता बोले लेकिन मुझे तो मेरे पिता ने यमराज को दान कर दिया, तो मुझे तो यमराज के पास जाना ही होगा. यमदूत बालहठ देखकर हंसे, किंतु फिर भी उन्होंने नचिकेता को अंदर नहीं जाने दिया. नचिकेता ने हार नहीं मानी! वह द्वार पर ही आसन लगाकर डट गए और निरंतर यमराज का ध्यान करने लगे. ध्यान करते–करते तीन दिन बीत गए. भूख–प्यास की खबर तो उन्हें पहले ही नहीं थी, अब उन्होंने साँसों को भी रोक दिया. मृत्यु असमय ही जागृत हुई और यमराज का सिंहासन डोल गया. वह तुरंत नचिकेता के सम्मुख प्रकट हुए. तब जाकर नचिकेता ने स्वाँस ली. यमराज इतने छोटे बालक का इतना दृढ़ निश्चय देखकर, हतप्रभ रह गए. यमराज ने नचिकेता से आने का कारण पूछा. नचिकेता ने सारी बात बताई. सुनकर यमराज मुस्कुराए और बोले – माता-पिता अकारण कुछ काम नहीं करते, तुम्हें उन्होंने मेरे पास भेजा है, तो ज़रूर ये विधि का विधान ही होगा.
इधर वाज्श्र्वा ऋषि के यज्ञ की समाप्ति के बाद आश्रम वसियों का ध्यान जब नचिकेता पर गया, तो वे अनुपस्थित थे. तब सभी उनकी खोज में जुट गए. पिता को स्मरण हुआ कि उन्होंने क्रोधवश नचिकेता को यमराज को देने की बात कह दी थी. हो सकता है बालक नाराज़ होकर कहीं चला गया हो! और आश्रम के सभी लोगों के साथ वे नचिकेता की खोज में जुट गए और ढूँढते–ढूँढते उन्हें जंगल में एक आश्रम पर वही बृद्ध साधु मिले, जिन्होंने नचिकेता को यमराज के रहने का पता बताया था. अब वो बृद्ध साधु भी परेशान हो गए, उन्हें लगा कि अनजाने उनसे पाप हो गया है, बालक नचिकेता पर अगर किसी तरह का संकट आया, तो वही दोषी होंगे! और वो भी नचिकेता की खोज में लग गए!
उधर यमराज को नचिकेता की दृढ़ता ने बहुत प्रभावित किया. वो नचिकेता से बोले – मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ. तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान माँग लो! नचिकेता बोले- मेरे पिता ने अपना सम्पूर्ण धन साधुओं को दान किया, लेकिन मुझे आपको दान किया, जबकि यहाँ आकर मुझे पता चला है कि आपके पास सिर्फ़ मृत्यु के बाद ही आ सकते हैं. इसका अर्थ ये है कि मेरे पिता मुझसे असंतुष्ट हैं और वो मुझसे सम्पूर्णतया मुक्ति चाहते थे, तभी उन्होंने ऐसा किया. तो हे यमराज मैं चाहता हूँ कि मेरे पिता मुझ पर प्रसन्न हो जायें! उन्हें अपने यज्ञ का फल मिले, वो परमानंद प्राप्त करें! यमराज बोले तथास्तु! नचिकेता ने दूसरा सवाल किया – मैंने सुना है कि जो जन्मता है उसकी मृत्यु निश्चित है, फिर देवता कैसे अजर–अमर हैं, जबकि हर एक देवता के जन्म की कोई ना कोई कहानी है.
(Yamraj and Nachiketa Story)
यमराज ये प्रश्न सुनते ही समझ गए कि नचिकेता असाधारण बुद्धि का बालक है. वो अपने लिए कुछ माँगने के बजाय, ज्ञान के प्रति जिज्ञासु है. यमराज ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया – हर एक देवता को कोई ना कोई जगत कल्याण का कार्य सौंपा गया है, जिसे हर देवता करता है और जगत के लोग इन देवताओं के लिए प्रार्थना करते हैं. उन प्रार्थनाओं से एक ऊर्जा उत्पन्न होती है. वह ऊर्जा ही इन देवताओं को मिलती रहती है और इसीलिए वे चिरकाल से आज तक बने हुए हैं.
इधर वाज्श्र्वा ऋषि दूसरे बहुत से ऋषियों को लेकर ढूँढते–ढूँढते उस जगह पहुँच गए, जहां नचिकेता का अचेत शरीर पड़ा हुआ था. ऋषि उसे देखकर व्याकुल हो उठे और तुरंत उसके उपचार में जुट गए .
उधर नचिकेता ने यमराज से तीसरा सवाल किया – मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है? यमराज इसका उत्तर नहीं देना चाहते थे और बार–बार नचिकेता से कोई वरदान माँगने को कह रहे थे. जब नचिकेता ने फिर भी वरदान नहीं माँगा, तो वो अंतरध्यान हो गए ! लेकिन नचिकेता का निश्चय पक्का था और वो पुनः साँस रोक कर बैठ गए ! और उनकी साँसों के रुकते ही सबकी साँसें रुकने लगीं ! तब यमराज जान गए कि शिष्य योग्य है. उत्तर पाने के लायक है और उन्होंने जो नचिकेता के सवाल का जवाब दिया, उसे मैं यहां संक्षेप में आपको बता रहा हूं.
यमराज ने कहा – मृत्यु के बाद जीव के देखे, सुने और किए गए कर्मों के आधार पर, ये निर्धारित किया जाता है कि जीव को आवागमन के चक्र से मोक्ष मिलेगा या पुनः संसार में जन्म मिलेगा और यदि पुनः जन्म मिलेगा तो किस योनि में मिलेगा. इतना जानकर नचिकेता ने यमराज से लौट जाने की आज्ञा ली. यमराज ने नचिकेता की निस्वार्थ वृत्ति को देखकर उन्हें वरदान दिया – जीवन के उत्तरोत्तर आत्मविकास की ऊर्जा को अब से नचिकेता अग्नि के नाम से ही जाना जाएगा . इधर नचिकेता का सूक्ष्म शरीर जैसे ही स्थूल शरीर में वापस लौटा, वो तुरंत सचेत होकर उठ गए. ये देख उनके पिता वाज्श्र्वा और बाकी ऋषिगण अत्यंत प्रसन्न हुए. फिर नचिकेता से पूछा गया कि वो कहां के लिए आश्रम से निकल आए थे. तब नचिकेता ने ऋषियों को यमराज से मिलने की सारी कथा सुनाई ! तो पहले तो ऋषियों को ये बालक का एक स्वप्न मात्र लगा, लेकिन जब उन्होंने विस्तार पूर्वक सब कुछ बताया, तो सारे लोग आश्चर्यचकित रह गए और ऋषि वाज्श्र्वा आनंद से भर उठे ! उन्होंने बालक नचिकेता को गोद में उठाकर कहा – तुम जैसा मेधावी पुत्र पाकर, मेरा विश्वजीत यज्ञ सफल हो गया . आज मुझे परमानंद की प्राप्ति हो रही है.
(Yamraj and Nachiketa Story)
सुन्दर चन्द ठाकुर
कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.
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