पहाड़ और मेरा जीवन – 21
(पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर के लोड होने की प्रतीक्षा करें.)
जौं की ताल का मैं आप लोगों को आखिरी किस्सा बताने जा रहा हूं. आखिरी इसलिए भी क्योंकि इसके बाद जौ की ताल को हमेशा के लिए त्याग दिया गया. मैंने इसलिए त्यागा क्योंकि मुझे इस बात का डर था कि यशुदास, जो मेरी आंखों के सामने उसमें डूबा था, की आत्मा ताल पर ही भटक रही होगी. पहाड़ों में सूर्य ढल जाने के बाद ऐसा सन्नाटा खिंच जाता था, मेढकों और जाने कहां बैठे हुए झींगुरों की ऐसी आवाज आने लगती थी कि मैं घर से तीस-चालीस मीटर फासले पर अपने मकान मालिक के घर जाने के लिए भी डर के मारे मां को दरवाजे पर खड़ा कर तब तक आवाज लगवाता था जब तक कि मैं उनके घर के भीतर दाखिल न हो जाऊं. तो ऐसे डरपोक लड़के के लिए अपने सहपाठी को निगल जाने वाली ताल में नहाने का दूर-दूर तक कोई सवाल नहीं उठता था.
जिस दिन यह दुर्घटना घटी, उस दिन मैं दूसरे दिनों की तरह स्कूल से घर आने के बाद ताल में चला गया था, जहां हम कई तरह के खेल खेला करते थे. उन दिनों आजकल की तरह मोबाइल नहीं हुआ करते थे, जिन पर आजकल के बच्चे अपना सारा समय खर्च करते हैं और न ही तब तक कंप्यूटर गेम ही आए थे. खेलने का मतलब था घर के बाहर खुले आकाश के नीच जमीन पर दौड़ना, पानी में तैरना या कुछ भी ऐसा करना जिसमें दम या दिमाग लगाना पड़े. ठुलीगाड़ के पास जो कासनी नामक गांव है, वहां के भी कुछ लड़के खेलने आ जाते थे. कुछ और लड़के ठुलीगाड़ के सामने के पहाड़ के पीछे फौजी क्वार्टरों में रहते थे, वे भी हमें देखकर ताल की ओर चले आते थे.
यशुदास भी इसी पहाड़ी के पीछे रहता था और पैदल ही घर जाया करता था. उस दिन हमें ताल में खेलता देख वह भी आ गया. हम पांच छह लड़के थे, जिनमें से एक कासनी गांव का राजेंद्र सिंह भी था. वह हमसे उम्र में बड़ा था और दो क्लास सीनियर भी. वह गांव के दूसरे लड़कों की तरह शारीरिक रूप से बहुत मजबूत था. तैराकी में भी वह हम सबकी तुलना में कहीं बड़ा तुर्रम खान था. बहरहाल, जौ की ताल में जिस ओर से गाड़ का पानी आता है वहां एक बड़ी चट्टान है, जिससे पानी नीचे उतरकर ताल में बदल जाता है. हम इसी चट्टान पर फिसलते हुए कुछ क्षण के लिए ताल के किनारे रुकते और पानी में डाइव मारकर ताल के दूसरे छोर पर ही निकलते. जब डाइव मारते तो हम ताल के तले तक पहुंच जाते. हम इस काम में इतने पारंगत हो गए थे कि ऊपर से पचास पैसे और एक रुपये का सिक्का ताल में कहीं भी फेंककर उसे जरा-सी देर में खोज ले आते. यशुदास बहुत तल्लीन होकर हमारा यह खेल देख रहा था.
संभवत: उसे इस तरह एक ओर से डाइव मारकर दूसरी ओर पहुंचना बहुत आसान लगा क्योंकि हम मजाक-मजाक में ही ऐसा कर रहे थे. मैं अपने खेल में मशगूल था. हमें पता ही नहीं चला कि कब यशुदास ने हमारी तरह ताल में डाइव मारी. पर वह दूसरे छोर पर इतनी दूर न पहुंच सका कि जहां उसके पैर जमीन पर लग जाते और नाक पानी से बाहर बनी रहती. कुछ इंच मात्र का फासला रहा होगा. मेरी जब यशुदास पर नजर पड़ी तो वह पानी में हाथ मार रहा था. राजेंद्र ने यशुदास को डूबता देख तुरंत पानी में कूद लगाई और अगले ही क्षण वह उसे बाहर खींचने लगा. अभी तक भी माहौल खेल और मजाक का ही था. एक-दो हाथ मारने की बात थी, दोनों के पैर जमीन पर लग जाते और हम यशुदास की टांग खींचते. पर आज जौं की ताल में वह होना था, जो वहां पहले कभी न हुआ था. राजेंद्र यशुदास को बाहर खींचने के लिए जैसे ही उसके करीब गया, उसने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया.
मुझे उस दिन मालूम चला और मैं यह सबक आज तक नहीं भूला हूं कि डूबते हुए आदमी को कभी सामने से नहीं बचाना चाहिए क्योंकि वह जिसे पकड़ लेता है, प्राण चले जाते हैं पर उसे वह छोड़ता नहीं. डूबते हुए आदमी को हमेशा पीछे से धकेलना चाहिए.
यशुदास ने राजेंद्र को इस तरह जकड़ा कि अब यशुदास के साथ-साथ राजेंद्र भी पानी के भीतर-बाहर होने लगा. अब तक मैं चौकन्ना होकर किसी अप्रिय घटना की आशंका से ग्रसित हो चुका था. मैं दौड़कर ऊपर चला गया जहां से हम जौ की ताल में कूद लगाया करते थे. नीचे राजेंद्र और यशुदास ऊपर आकर बार-बार नीचे जा रहे थे. वे ताल के उथले छोर से उसकी गहरे छोर की ओर भी खसकने लगे थे. जाने कौन-सी ताकत उन्हें खींच रही थी.
मुझे मां की बात याद आ रही थी, जो अक्सर मुझे डराने के लिए ठुलीगाड़ को एक ऐसी डायन बोलती थी जिसे हर साल एक न एक बलि तो चाहिए ही होती है.
कहीं डायन ही तो नहीं खींच रही दोनों को. मैं ऊपर से सांस रोककर देख रहा था. कुछ देर तक एक साथ ऊपर-नीचे होने के बाद अब दोनों के हाथ शिथिल पड़ने लगे थे. दोनों खिसकते-खिसकते ताल के गहरे छोर पर पहुंच गए थे. फिर ऐसा हुआ कि दोनों पानी के भीतर चले गए. और अचानक ताल निश्शब्द होने लगी. पर तभी राजेंद्र का सिर पानी के बाहर निकला. चेहरा दिखा, एकदम लाल. वह छपाके मारते हुए किनारे आया. वहीं उसकी स्कूल की युनिफॉर्म रखी थी. उसने एक हाथ में युनिफॉर्म पकड़ी और दूसरे में जूते और वह गाड़ के किनारे ही दूसरी ओर भागकर पहाड़ चढ़ने लगा. उसे यूं भागता देख मैं भी घबरा गया. आनन-फानन मैं भी कपड़े उठा अपने घर की ओर भागा. देखते ही देखते बाकी लड़के भी भाग खड़े हुए.
हमें यूं भागता देख मुख्य सड़क पर जा रहे लोगों ने किसी से पूछ लिया होगा कि हुआ क्या. भागते-भागते ही किसी के मुंह से निकला डूब गया, डूब गया. मैं इतना डर गया था कि घर के अंदर न जाकर बाहर एक बिजली के खंबे के पीछे छिप गया और वहीं से ताल के आसपास की गतिविधि देखता रहा. मेरा दिल बहुत जोर से धड़क रहा था. एक अपराध-बोध भी था कि जैसे मैंने ही अपनी गलती से यशुदास को डुबा दिया. मेरे कान में सांय-सांय हवा बज रही थी.
मैं इतना डरा हुआ था अंदर से कि किसी भी आवाज से मुझे झस हो जा रही थी. ऊपर से आमा ने मुझे देखकर आवाज लगाई, तो मैं डरा. बूबू अपने कमरे में खांसे, तो मैं डरा. पंद्रह-बीस मिनट तक कुछ नहीं हुआ. फिर एमईएस कॉलोनी में पता नहीं कैसी बात पहुंची. थोड़ी देर बाद लोग जौं की ताल के पास जमा होने शुरू हुए. लकड़ी की सीढ़ी लाई गई, रस्सी लाई गई. मैं दूर से ही देख रहा था. करीब दो घंटे बाद यशुदास की लाश निकाली गई. असल में वह पानी के भीतर चट्टान की एक ओट में फंस गया था, जहां से खींचकर उसे बाहर निकालने में ही बहुत समय लगा. इस दौरान मेरे घरवालों को भी मालूम चल गया था कि वहां हुआ क्या है. मुझे तुंरत घर के अंदर बुलवा लिया गया.
यशुदास इकलौती संतान थी. उसके पिता सेना में सूबेदार थे. मैंने उसके माता-पिता के दुख के बारे में भी सोचा. स्कूल में अगले कई दिनों तक यशुदास की बातें हुईं. मां ने मेरे गाड़ में जाकर नहाना बहुत सख्ती के साथ प्रतिबंधित कर दिया. अब सुबह संडास के लिए भी उस ओर नहीं जाना था. नई जगह तलाशी गई, जहां मुझे दलदल में उतरना पड़ता था. दलदल से तो में फिर भी निपट लेता, लेकिन यहां से आप सड़क पर चलने वाली गाड़ियों में बैठे लोगों की नजर के दायरे में आ जाते थे.
परेशानियां थीं, पर यशुदास की ऐसी मृत्यु के बाद सभी बहुत सहम गए थे. मुझे कई सालों तक यशुदास की मृत्यु की याद रही. मृत्यु की बात होते ही मुझे तुरंत यशुदास याद आ जाता. यह अपने दो साल के छोटे भाई के बाद बाद मृत्यु से मेरा दूसरा साक्षात्कार था. अनजाने ही इस मृत्यु ने मुझे जीवन और मृत्यु के बीच के जरा से फासले का अहसास करवाया. शायद आप यकीन नहीं करेंगे मगर यशुदास की मौत से मिले सबक के चलते ही कई सालों बाद मैं हरिद्वार के तेज बहते पानी में डूबते अपने एक दोस्त की जान बचा पाया. पर वह किस्सा कभी बाद में. अभी यह कि अगर यशुदास एक फुट और किनारे की ओर खिसक गया होता, तो बच जाता.
इस सृष्टि में कितनी मौतें सिर्फ इस अगर के चलते हो जाती हैं.
वह किलमोड़े और हिसालू डोलू में भरकर ला घरवालों की पार्टी करना
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(जारी)
कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.
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