कला साहित्य

माँ का जादुई बक्सा

हलवाई पांचवीं बार अपना हिसाब करने आया था. (Mother’s Magic Box)

—’तुम्हारा कितना हुआ भाई’ पापा पांचवीं बार उससे पूछ रहे थे. सोचते थे शायद इस बार कुछ कम बता दे. अंदर आकर अपना काला बैग देखते थे. गिनते थे. कुछ कम पड़ जाते थे हर बार. माँ से कहने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. उसके गहने, सारी जमां-पूंजी तो पहले ही निकल चुकी थी.

दीदी की शादी घर की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह झिंझोड़ गई थी. जब कुछ नहीं सूझा तो सर पकड़कर बैठ गए पापा. ‘क्या करूं शुक्ला जी से कहूँ क्या… उनके कहने से ही ये हलवाई आया था. लेकिन क्या कहूँ, पहले ही इतने अहसान हैं उनके… अपने भी कुछ मान-सम्मान की बात है…’

—’कितने कम पड़ रहे हैं’ माँ ने पूछा. माँ सर पकड़ कर बैठने का मतलब जानती हैं.

—’कोई दस हज़ार’ पापा ने बुझे मन से कहा.

—’ये लीजिये’ माँ ने उसी पुराने बक्से से किसी पोटली के अंदर से मुड़े-तुड़े कुछ नोट निकाले और बिस्तर पर रख दिए.

कई सालों से इकट्ठा किया हुआ ये माँ का काला धन था. कोई नहीं जानता था कि माँ ने इस बॉक्स में पुराने स्वेटर, पापा की शादी का कोट, मोतियों वाला हरा पर्स, सिंदूर पिटारी, टूटी पायल, जाने किस संदूक की चाभियाँ… और एक पोटली में पापा का थोड़ा सा सम्मान भी संभाल कर रख रक्खा था.

मुझे याद है. पापा ने एक गहरी सांस ली थी और माँ की ओर झिलमिल आँखों से देखा था. ये उनके ‘थैंक्स अ लॉट’ कहने का तरीका था. माँ चुपचाप चाय बनाने किचेन में चली गईं थीं. ये उनके ‘मेंशन नॉट’ कहने का तरीका था.

कहानी : कोतवाल का हुक्का

अमित श्रीवास्तव

जौनपुर में जन्मे अमित श्रीवास्तव उत्तराखण्ड कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता), पहला दख़ल (संस्मरण) और गहन है यह अन्धकारा (उपन्यास).

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

इसे भी पढ़ें : कैसे पुलिसवाले हो यार

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

2 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

2 weeks ago