चंपावत उत्तराखंड का एक छोटा सा नगर जो पहले अल्मोड़ा जिले का हिस्सा था और 1972 में पिथौरागढ़ में शामिल हुआ। फिर 1997 में एक स्वतंत्र जिला बन गया। गोरल देव यहां के इष्ट देवता है इसलिए यह गोल्ज्यू की नगरी कहलाती है। चंद राजाओं द्वारा बसाई गई यह नगरी अपनी अद्भुत सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। प्रकृति ने भी इसे सौंदर्य की बेशुमार दौलत दी है। देवदार की ऊंचे ऊंचे वृक्षों से लक-दक चंपावत से लोहाघाट तक का पूरा एरिया मन मोह लेता है। इस शहर में कम समय में बहुत अधिक प्रगति की है। चंपावत और इसके पास पास पर्यटकों के रहने के लिए हर तरह के होटल और होमस्टे मिल जाते हैं। (Tea gardens are synonymous with greenery)
चंपावत में पर्यटकों के आकर्षण का एक मुख्य केंद्र है यहां के चाय बागान। लगभग 200 साल पहले अंग्रेजों ने यहां पर चाय का उत्पादन शुरू किया था। 1995 में टी बोर्ड के गठन के बाद चाय विकास योजना लागू हुई जो 18 ग्राम पंचायत के लगभग 241 हेक्टेयर एरिया में अलग-अलग स्थानों पर फैली है। मोराड़ी, खूना, मंच, नरसिंह डांडा, सिलिंगटॉक, मलाई, च्यूरा खर्क, कठनौली जैसे स्थलों में यह चाय पैगाम फैले हुए हैं जिनमें हर साल लगभग 60 हजार किलो चाय की हरी पत्तियों का उत्पादन होता है और जिसमें से लगभग 10 टन चाय तैयार होती है। लंबी पत्तियों वाली इस विशेष जैविक चाय की दूर-दूर तक मांग है। यहां पर तैयार की गई चाय को कोलकाता के बाजार में भेजा जाता है और फिर वहां से यंग माउंटेन और पैरामाउंट इन जैसी कंपनियों के माध्यम से इसे जर्मनी, इंग्लैंड, यूएसए, कीनिया और जापान जैसे देशों तक भेजा जाता है। चंपावत के आसपास के लगभग चार-पांच सौ श्रमिक मनरेगा के तहत इन चाय बागानों में रोजगार पा रहे हैं जिनमें से 90% महिलाएं हैं।
चाय बागान भ्रमण के दौरान कुछ महिलाओं से हमारी बात भी हुई। वे सभी प्रसन्न चित्त और भले स्वभाव की महिलाएं थीं जो अपने छोटे से रोजगार से संतुष्ट दिखाई दे रही थीं। प्रत्येक श्रमिक एक हेक्टेयर जमीन में काम करता है और उसे लगभग साल भर काम मिलता है। जिसमें से 220 दिन चाय बागान द्वारा और 100 दिन मनरेगा के द्वारा काम का मेहनताना मिलता है। चाय की खेती को लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि सूअर और बंदर जैसे जंगली जानवर से नुकसान नहीं पहुंचाते। इसलिए दूसरी खेती से उकता चुके किसान भी अब चाय की खेती से जुड़ रहे हैं। चाय के पौधों को लगाने के बाद तीन साल तक लगातार देखभाल करनी पड़ती है।
सिलिंगटॉक स्थित चाय बागान चंपावत शहर से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर है। लगभग 21 हेक्टेयर एरिया में यह बागान फैला है जिसमें से 4 हैक्टेयर भूमि को स्वदेश दर्शन योजना के तहत टी टूरिज्म के रूप में विकसित किया गया है।
आंकड़े बताते हैं कि बीते साल 2023 में लगभग 65 हजार किलो हरी चाय पत्ती का उत्पादन हुआ जिसमें से 15.5 हजार किलो चाय का उत्पादन हुआ। सिलिंगटाॅक में रात्रि विश्राम के लिए ईको हट की व्यवस्था है और साथ ही यहां पर स्थित कैफे में भोजन, चाय और हल्के-फुल्के नाश्ते की व्यवस्था है। नज़रों के सामने दूर-दूर तक फैला होता है घास की हरी चादर का बिछौना और और स्वच्छ नीले आसमान की ओढ़नी जिसमें कभी कभार प्रकृति बादलों के रूप में सफेद रंग की कारीगरी भी कर देती है। देवदार के पेड़ों से छन कर आतीं धूप की किरणें लुका छुपी के इस खेल में हमें भी शामिल कर रही थीं। मौसम साफ रहने पर हिमालय की चोटियों के दर्शन सहज हो जाते हैं और सूर्यास्त का दृश्य भी बड़ा ही मनोहारी होता है। हरियाली के बीच योग और ध्यान का भी अच्छा माहौल बन जाता है।
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कुछ साल पहले बागान वाला यह एरिया बिल्कुल खुला था यानि ओपन टू ऑल था लेकिन पिछले तीन-चार वर्षों से यहां पर चारदीवारी करके गेट लगा दिया गया है। बागान में प्रवेश के लिए ₹20 शुल्क रखा गया है। हम सुबह थोड़ा जल्दी पहुंच गए थे और टिकट खिड़की खुलने का इंतजार कर रहे थे। इन बागानों में काम करने वाली महिलाएं भी पहुंच गई थीं। उनसे हमारी कुछ बातचीत हुई और फिर वे हाथों में को कुदाल-खुरपी लिए हुए तार-बाड़ की बाउंड्री लाॅंघकर बागान के अंदर काम करने चली गईं। हमारा ऐसा करना उचित नहीं था इसलिए गेट खुलने का इंतजार किया। बागान के ही कुछ लोगों से इस बारे में जानकारी मांगी और उन्हें अपनी व्यस्तता की बात बताई तो उन्होंने तुरंत टिकट विंडो इंचार्ज को फोन लगाया।
जवाब में वह बोला, “बस, दो मिनट में पहुंचता हूं।”
ठंड के मौसम में यूं भी हमारी घड़ी की सुइयां थोड़ा पीछे खिसक जाती हैं।
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तभी उन लोगों ने दूर स्थित उसका गांव दिखाया। जिसे देखकर हमें समझ में आया कि दो मिनट में तो वह उड़कर भी नहीं पहुंच सकता। उसे बाइक से आने में भी कम से कम आधे घंटे का समय लगेगा।
खैर, कुछ जानकारी लेने और प्रकृति को निहारने में लगभग 20-25 मिनट बीत गए और टिकट वाला भी बुलेट की रफ्तार से हवा के माफिक आ पहुंचा। आते ही उसने झट से बागान की तरफ जाने वाला गेट खोल दिया और हमें लौटते समय टिकट के पैसे देने की बात कह कर अंदर भेज दिया। चूंकि हमारे पास खुले पैसे मौजूद थे तो टिकट लेकर ही अंदर गए और चाय बागान का भ्रमण करते हुए उन महिलाओं से फिर बातचीत हुई। बचपन में पढ़ा असम की चाय वाला पाठ याद आ गया और किताब में देखे कई चित्र आंखों के आगे तैर आए जिसमें महिलाएं अपने नर्म नाजुक हाथों से चाय के पत्तियों को चुनकर अपनी पीठ में टंगी कंडी में डालती हुई दिखाई गईं थीं। चाय की नरम नरम पत्तियों को निहार कर और बाल सुलभ जिज्ञासा के तहत उन्हें छूकर वापस आ गई।
मूलरूप से अल्मोड़ा की रहने वाली अमृता पांडे वर्तमान में हल्द्वानी में रहती हैं. 20 वर्षों तक राजकीय कन्या इंटर कॉलेज, राजकीय पॉलिटेक्निक और आर्मी पब्लिक स्कूल अल्मोड़ा में अध्यापन कर चुकी अमृता पांडे को 2022 में उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान शैलेश मटियानी पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
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