फोटो : गोप्पू बिष्ट
तेज गर्मी हो रही है. सलमान खान अकेला धूप में पहाड़ के खंडर हो चुके एक गांव में झुलसता हुआ चल रहा है. खंडहरों के बीच एक जगह में बन्दरों का समूह है. बंदरों और सलमान खान की नजर मिलती है. सलमान की नज़र बंदरों के सरदार के हाथों में लाल धोती के टुकड़े पर है.
अचानक सूअरों का एक झुण्ड सलमान खान पर पीछे से हमला कर देता है. सलमान खान हवा में उछलता है और सूखे काफल की टहनी के सहारे के मोटे सूअर की पीठ पर जा बैठता और तेजी से बंदर के सरदार के हाथों से लाल धोती का टुकड़ा छिन कर गधेरे में कूद जाता है.
बंदर और सूअर एक दूसरे को देख रहे हैं तभी कहीं दूर पत्थरों से भरे गधेरे को फोड़ता हुआ बाहर निकलता है और अपनी हथेली में एक-एक दाना जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट का दिखाकर कहता है लोक संस्कृति के हरेला बीज सीधा उत्तराखंड की वादियों से.
हो सकता है कि बाजार और गर्म रहा तो कोई बाबा स्वदेशी के नाम पर आपको लोक संस्कृति के स्वदेशी हरेला बीज भी दिला दे.
हमारे त्यौहारों पर जितनी तेजी से बाजारवाद हावी हो रहा है उससे यह संभव है. हमने होली, दिवाली, जन्माष्टमी, रक्षाबंधन और न जाने किस-किस त्यौहार को बाजार की भेंट चढ़ता देखा है. अब बारी है लोक पर्वों की.
आज आपको हल्द्वानी की अधिकांश छोटी-बड़ी दुकानों में हरेला के बीज मिल जायेंगे. पांच से दस रुपये में बिकने वाले ये पैकेट बहुत ही आसानी से उपलब्ध हैं.
हम कैसी संस्कृति बचाने जा रहे हैं जहां हमारे पास पांच अनाज के बीज तक नहीं हैं. बाज़ार पर इतनी निर्भरता कितनी सही है. आज बाजार में मिल जायेंगे कल का क्या होगा?
यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब बाजार में उगा हुआ हरेला मिलेगा जिसे आपको घर जाकर केवल काटना है. दिवाली में लक्ष्मी पूजा के दिन जैसे गन्ने को स्कूटर और कार में रगड़ते हुये ले जाते हैं वैसे ही हरेला भी कंधे में बोक ले जायेंगे.
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