चितवन नेशनल पार्क, नेपाल. फोटो : Everything Relephant Elephant फेसबुक पेज से साभार
नेपाल कहने को तो भारत की तरह ही एक कृषि प्रधान देश है जिसकी 75 फ़ीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है लेकिन नेपाल की जीडीपी में सबसे अहम योगदान किसी का है तो वह है टूरिज़्म. 75 फ़ीसदी पहाड़, 10 फ़ीसदी हिमालय और 15 फ़ीसदी तराई क्षेत्र से घिरे नेपाल को अमूमन शांत ही देखा गया है लेकिन राजशाही खत्म होने के पश्चात तथा लोकतंत्र व संविधान निर्माण के बाद कुछ समूहों के हितों की अनदेखी होते देख नेपाल के अंदर ही कुछ आंदोलन चलते रहे हैं. नेपाल टूरिज़्म को अगर ग़ौर से देखा जाए तो उसमें सबसे बड़ा योगदान हिमालयन एडवेंचर टूरिज़्म (ट्रैकिंग, हाइकिंग, हिमालयन माउंटेन फ़्लाइट, एक्सपीडिशन), नेचर टूरिज्म, हेरिटैज टूरिज़्म और लोकल ट्राइबल टूरिज़्म का है. दिल्ली से काठमांडू तक का हवाई सफ़र 720 किलोमीटर का है जिसे 1 घंटे 45 मिनट में तय किया जा सकता है. काठमांडू का त्रिभुवन अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा दुनिया के उन हवाई अड्डों में से एक है जिनमें जहाज़ को उतारना व उड़ान भरना बहुत कठिन माना जाता है. सिंगल रन-वे का हवाई अड्डा भारतीय उड़ानों के साथ-साथ चीन, थाईलैंड, भूटान, क़तर आदि उड़ानों को भी दिन भर खुद में समेटता है.
काठमांडू से लगभग 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है चितवन नेशनल पार्क. सड़क मार्ग से इस दूरी को 5 घंटे में तय किया जा सकता है. चितवन का शाब्दिक अर्थ है जंगल का दिल (चित्त-दिल, वन-जंगल). राप्ती नदी (उद्गम ब्लैक हिल, महाभारत रेंज) के किनारे बसा चितवन 1973 में नेशनल पार्क के रूप में स्थापित किया गया. जिसे 1984 में यूनेस्को वर्ड हैरिटेज सूची में जगह दी गई. 953 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला चितवन नेशनल पार्क उत्तर में राप्ती नदी, पश्चिम में नारायणी नदी व दक्षिण में रिऊ नदी से घिरा है. इन नदियों को पार्क की प्राकृतिक सीमा कहॉं जाता है. पार्क का 70 फ़ीसदी क्षेत्र साल वन, 20 फ़ीसदी ग्रासलैंड और 10 फ़ीसदी नदी के तटवर्ती क्षेत्र (मिश्रित वन) से घिरा है. चितवन नेशनल पार्क जाना जाता है गैंडों के लिए. दुनिया में वन-हॉर्न रायनो सिर्फ असम के कांजीरंगा व नेपाल के चितवन पार्क में पाए जाते हैं. 2015 की जनगणना के अनुसार पार्क में 605 गैंडे व 97 बाघ गिने गए. इसके अलावा पार्क में हाथी, हिरन व भालू भी देखे जा सकते हैं.
विलुप्त प्रायः हो चुके घड़ियालों को बचाने के लिए पार्क के पास ही चितवन में एक घड़ियाल कंजर्वेसन ब्रीडिंग सेंटर का निर्माण किया गया है.
जहॉं घड़ियालों के अंडों को जंगलों से इकट्ठा कर लाया जाता है और उनको ब्रीडिंग के लिए रखा जाता है. 1978 से अब तक 1500 घड़ियालों को नेपाल की विभिन्न नदियों में छोड़ा जा चुका है. घड़ियाल अब नेपाल में विलुप्त होने वाली प्रजातियों की सूची के बाहर है.
चितवन के मूल निवासियों में थारू जनजाति प्रमुख है. इसी तरह की थारू प्रजाति उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर के तराई क्षेत्र में पाई जाती है. कहा जाता है कि 12वीं शताब्दि में मुग़लों से युद्ध हारने के बाद थारू राजस्थान के थार मरुस्थल से चितवन की और प्रवास कर गए. थार मरुस्थल से उदित होने के कारण ही इन्हें थारू कहा जाता है. थारू चितवन में स्वयं को राजपूत समुदाय का बताते हैं. उत्तराखंड के थारू जहॉं खुद के नाम के आगे राणा/राना लिखते हैं वहीं नेपाल का थारू समुदाय खुद के नाम के आगे महतो/चौधरी/थारू लिखता है. थारू समुदाय जाना जाता है अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए. आज के दौर में जब उत्तराखंड का थारू समुदाय अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूलता जा रहा है वहीं नेपाल का थारू समुदाय आज भी उससे जुड़ा है. थारू सांस्कृतिक कार्यक्रम नेपाल के टूरिस्ट के लिए आकर्षण का केंद्र भी हैं. भोजन के लिए आज भी थारू समुदाय नदियों व जंगलों में पाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में निर्भर करता है. जंगलों में पाए जाने वाले बाँस, खरिये व घास से घरों का निर्माण आज भी चितवन में प्राथमिक रूप से देखा जा सकता है. सांस्कृतिक नृत्यों को प्रमुखता से संजो के रखा गया है. कुछ प्रमुख नृत्य इस प्रकार हैं:
मुग़लों के समय युद्ध से पूर्व दुश्मन को ताक़त दिखाने के लिए वॉर डाँस किया जाता था. हाथ में दो डंडे लेकर यह नृत्य किया जाता है. आज भी यह नृत्य खेतों से जानवरों को भगाने व डराने के लिए किया जाता है.
गेहूँ व धान की फ़सल की कटाई के समय हार्वेस्ट डॉंस किया जाता है. यह नृत्य एक तरह से वैभवता व संपन्नता का परिचायक है.
थारू जनजाति में होली नृत्य का विशेष महत्व है. होली गीतों के साथ हाथ में छोटे-छोटे डंडे लिए होली नृत्य किया जाता है. उत्तराखंड में थारू जनजाति हाथ में रूमाल लेकर होली नृत्य करती है.
विवाह व अन्य शुभ कार्यों के दौरान नृत्य किये जाते हैं जिनमें हाथ में झुनझुना लेकर मंगल गीत गाए जाते हैं.
थारू जनजाति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नज़र आती है. वह बाज़ार से ज़्यादा प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहते हैं व ग्रामीण परिवेश में गुजर-बसर करते हैं.
नेपाल की राजधानी काठमांडू से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है नागरकोट. नागरकोट तक जाने वाली सड़क की हालत जर्जर है. 30 किलोमीटर का सफ़र तय करने में दो घंटे से ज़्यादा का समय लग जाता है. नागरकोट पहाड़ की चोटी पर बसा छोटा सा गॉंव है जहॉं से साफ़ मौसम में हिमालय की मनमोहक श्रृंखलाएँ दिखाई पड़ती है. नागरकोट सूर्योदय व सूर्यास्त के मनमोहक दृश्यों के लिए जाना जाता है. किसी को प्रकृति और ख़ुशनुमा मौसम का आनंद लेना हो तो वह काठमांडू से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पोखरा जा सकता है. पोखरा जाना जाता है फेवा झील व ख़ुशमिज़ाज मौसम के लिए.
काठमांडू से ही मात्र 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भक्तपुर. भक्तपुर अपने पगौड़ा स्टाइल के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है. मल्ला वंश के राजा ने 16वीं-17वीं शताब्दी में भक्तपुर के मंदिरों का निर्माण करवाया. 2015 में आए भूकंप में सबसे ज़्यादा नुक़सान भक्तपुर के मंदिरों को ही उठाना पड़ा. आज भी वहॉं मंदिरों के पुनर्निर्माण का कार्य चल ही रहा है. बहुत सी पुरानी विरासतों और मंदिरों को आज भी बल्लियों के सहारे ढहने से रोका गया है. मंदिरों में प्रमुख रूप से भगवान गणेश, शिव, विष्णु व वत्सला देवी मंदिर प्रसिद्ध हैं. तांत्रिक गणेश का न्यातापोला मंदिर 5 मंज़िला है जो अपने विशेष आकार व बनावट के लिए जाना जाता है जो 2015 के भूकंप में भी बिना क्षति के यथावत खड़ा रहा.
राजधानी काठमांडू प्रसिद्ध है अपने यूनेस्को विश्व विरासत के लिए. पशुपतिनाथ मंदिर, स्वयंभूनाथ, बौद्धनाथ, दरबार स्क्वायर, पातन, चांगूनारायण और भक्तपुर विश्व विरासत का हिस्सा हैं जहॉं लाखों विदेशी व घरेलू पर्यटक हर साल घूमने आते हैं. अधिकांश मंदिरों में ब्राह्मणों के अलावा विदेशियों व अन्य जातियों का प्रवेश वर्जित है. शिवरात्रि के समय अकेले पशुपतिनाथ में लगभग 10 लाख श्रृद्धालु दर्शन करने आते हैं. इसके अलावा सागरमाथा नेशनल पार्क भी विश्व विरासत का हिस्सा है. हिमालय की चोटियों का लुत्फ़ उठाना हो तो माउण्टेन फ़्लाइट बुक की जा सकती है. 12-14 हज़ार प्रति व्यक्ति में हेलीकॉप्टर बुक कर के एवरेस्ट के ऊपर 30 से 40 मिनट चक्कर लगाया जा सकता है. हिमालय को देखने का इससे अद्भुत नजारा और कुछ नहीं हो सकता.
कुल मिलाकर नेपाल विविधताओं से भरा देश है. नेपाली लोग पर्यटकों की आव-भगत करना जानते हैं और पर्यटन के प्रति उतने ही समर्पित भी हैं. नेपालियों की वफ़ादारी की दुनिया मिसाल देती है. व्यस्त जिंदगी में जब भी मौक़ा मिले कम बजट में अलग अनुभव लेने का तो नेपाल घूम के आइये.
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नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.
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