समाज

केले के वृक्षों से ऐसे बनती है मां नंदादेवी की प्रतिमा

देव भूमि अल्मोड़ा जहां अष्ट भैरव और नव दुर्गाओं का वास है, इन्हीं नव दुर्गाओं में से एक नन्दादेवी भी है. नन्दादेवी जो सम्पूर्ण पर्वतीय प्रदेश में परम पूज्य देवी है, को वर्तमान स्थल में सन् 1816 में अंग्रेज कमिश्नर श्री ट्रेल द्वारा स्थापित किया गया.
(Nanda Devi ki Pratima)

नन्दादेवी का मेला भाद्रमास की पंचमी मे प्रारम्भ होता है जिसमें नन्दा एवं सुनन्दा की केले के वृक्षों से दो प्रतिमाएं बनाई जाती हैं. इन प्रतिमाओं का निर्माण करने के लिए नगर के ऐसे व्यक्तियों, जिनके बगीचों में केले के वृक्ष स्थित हैं से सम्पर्क स्थापित करके प्रतिमा निर्माण के लिए उनसे चार केले के पेड़ों की मांग की जाती है. जिस स्थल से केले के वृक्ष प्रतिमा निर्माण के लिए लाने होते हैं, वहां पर पुजारी मेला आयोजन समिति के लोगों के साथ पंचमी के दिन न्यौता (निमत्रण) देने जाते हैं.

पुजारी अपने साथ, रोली (पिट्टयां), चावल (अक्षत), वस्त्र (लाल, सफेद) धूप बत्ती, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री ले जाता है मंत्रोच्चारण के बाद पुजारी द्वारा केले के पेड़ों पर अक्षत के दाने फैके जाते हैं. अक्षत जिन चार वृक्षों में सबसे पहले लगते हैं उनको क्रमशः एक, दो, तीन एवं चार क्रमों में चुन लिया जाता है.

प्रथम क्रम में चयनित केले के वृक्ष से नन्दा एवं द्वितीय से सुनन्दा की प्रतिमायें बनाने की परम्परा चली आई है. यदि किसी कारणवश इन दोनों में से कोई एक अथवा दोनों केले के स्तम्भ थोड़े से भी खंडित अवस्था में मिले तो इनके स्थान पर तीसरे और चौथे स्तम्भ से प्रतिमाओं का निर्माण किया जाता है. वृक्षों का चयन हो जाने के बाद इनकी पूजा, आरती करके इन पर वस्त्र बांध दिये जाते हैं.
(Nanda Devi ki Pratima)

सप्तमी तिथि को ब्राह्म मुहूर्त में इन स्तम्भों को लाने के लिए, नन्दादेवी के प्रांगण से यात्रा प्रारम्भ होती है. इस यात्रा में लाल निशाण (ध्वज) सबसे आगे रहता है यह परम्परा बहुत समय पूर्व राजपूतों द्वारा कन्या को जीतने को जाते समय की है और आज भी कुमाऊँ में शादी के समय वर के विवाह करने के लिए जाते समय यही ध्वज आगे रहता है. इसके पीछे नन्दादेवी की महिमा का वर्णन करते हुवे ‘जगरिये’ परम्परागत वाद्ययंत्र, छोलिया, जनसमूह एवं अन्त में सफेद ध्वज रहता है.

यह यात्रा चयनित वृक्षों के स्थान तक जाती है. वहां केले के वृक्षों को चयनित क्रमानुसार जड़ के कुछ ऊपर से काट लिया जाता है. इन चारों वृक्षों के शेष भागों का पूजन आरती करके नारियल तोड़ कर यात्रा वापस लौटती है. वापसी में सफेद निशाण (ध्वज) आगे एवं लाल ध्वज अन्त में रहता है. यह परम्परा विवाह करके बारात की वापसी के समय आज भी इस अंचल में प्रचलित है.

सफेद ध्वज के बाद क्रम से चारों केले के स्तम्भ रहते हैं. शेष क्रम पूर्ववत रखते हुवे यह यात्रा डयोढी पोखर पहंचती है. ड्योढ़ी पोखर (वर्तमान में राजा आनन्द सिंह राजकीय कन्या इन्टर कालेज) के मन्दिर से इन केले के स्तम्भों की पूजा, आरती की जाती है. फिर बंसल गली के रास्ते, लालाबाजार होकर नन्दादेवी के प्रांगण मे केले के स्तम्भों को खड़ा कर दिया जाता है.

फोटो : विभा बिष्ट

महादेवी की प्रतिमाएं केले के स्तम्भों से क्यों बनाई जाती हैं इसके पीछे दो मान्यताएं हैं. एक तो किंवदन्ति है कि नन्दा भैंसे से बचने के लिए केले के वृक्षों के झुण्ड के भीतर छिप गई थी परन्तु बकरी ने पत्ते खा दिये तथा भैंसे ने नन्दा को मार डाला. बकरी तथा भैंसे की बलि भी इसीलिए दी जाती है.
(Nanda Devi ki Pratima)

केला इस प्रदेश में सर्वत्र उगता है अत: आसानी से प्राप्त हो सकता है देवताओं की पूजा में केले के फल प्रसाद के रूप में अर्पित किये जाते हैं और केले के पत्तों से मंडप का निर्माण किया जाता है. केले के वृक्ष की पूजा और उसकी परिक्रमा का भी विशेष महत्व माना गया है इस प्रकार केला एक पवित्र वृक्ष है.

एक जानकार के अनुसार नन्दादेवी की पूजा पद्धति वही है जो तारा देवी की है, तारा कालिका का ही एक रूप है. तारा को ककारात्मक कहा गया है अर्थात कदली (केला) स्तम्भ से प्रतिमा का निर्माण होता है, केवड़ा जल से प्रतिमा को स्नान कराया जाता है, कपूर से आरती की जाती है और कन्या कुमारियों का पूजन किया जाता है.

मूर्ति कूर्म अर्थात् कछुवे के आसन पर बैठाई जाती है. पूजा पद्धति में अन्य बातें तो आज भी पूर्ण की जा रही है केवल कूर्मासन के विषय में स्थिति स्पष्ट नहीं है. इसके विषय में इन पंक्तियों के लेखक के मतानुसार इस क्षेत्र का वास्तविक नाम कूर्मान्चल है जहां भगवान ने कूर्म (कछुवे) के रूप में अवतार लिया था अत: समस्त कुमाऊँ मंडल ही कूर्म रूप है अतः कूर्मासन पर देवी स्वतः ही विराजमान है.

सप्तमी के दिन ही पूजा के बाद अपराह्न में प्रतिमा निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जाता है और उसी दिन रात्रि दस ग्यारह बजे तक निर्माण पूर्ण हो जाता है. केले के स्तम्भों के अतिरिक्त निम्न सामग्री प्रतिमा निर्माण हेतु प्रयोग में लाई जाती है :

बेंत की लकड़ी : इसका प्रयोग ढांचा बनाने के लिए किया जाता है.

बांस की लकड़ी : इसको काटकर इसके टुकड़ों को एक ओर से नोकदार बना कर कीलों जैसा आकार दे दिया जाता है. ये केले की छाल को केले के स्तम्भ के जोड़ने के काम आती हैं.

सूती वस्त्र : लगभग 5 मीटर सूती कपड़ा (पीले गुलाबी) रंग का इसमें पहले पीले कपड़े का प्रचलन था क्योंकि पीत वस्त्र देवताओं के वस्त्रों में प्रमुख है किन्तु अब कुछ वर्षों से गुलाबी रंग का कपड़ा प्रयुक्त किया जाने लगा है. इससे प्रतिमा के ढांचे का बाहरी आवरण बनाया जाता है.
(Nanda Devi ki Pratima)

पाग : सफेद कपड़े की लगभग 6 अंगुल चौड़ी, आधा मीटर लम्बी पट्टी पाग कहलाती है.  यह प्रतिमा के सिर पर गोल बांधी जाती है.

लाल रंग : शौर्य, शुभ का प्रतीक लाल रंग के लिए पिट्ठयां (रोली) जो हल्दी इंगूर आदि को ‘पीसकर बनाई जाती है का प्रयोग होता है.

सफ़ेद रंग :  शांति के प्रतीक इस रंग के लिए विस्वार (चावल को भिगाकर पीसकर जो पिस्टी बनती है) का प्रयोग किया जाता है.  बिस्वार से ही पर्वतीय अंचल के त्यौहारों, मांगलिक कार्यों में ऐपण (अल्पना) भी बनाये जाते हैं.
(Nanda Devi ki Pratima)

पीला रग : इसके लिए कुमकुम का प्रयोग होता है.

काला रंग : इसके लिए काले रंग का प्रयोग होता है. इन रंगों के स्थान पर अब बाजार के रंगों का भी प्रयोग किया जाने लगा है

चांदी की आँखें : प्रतिमा के लिए चार चांदी की बनाई आंखो का प्रयोग किया जाता है. इन्हें प्रति वर्ष विसर्जन के समय प्रतिमाओं से निकाल लिया जाता है तथा अगले वर्ष यही आंखे फिर से काम में लाई जाती हैं.

पाती : यह एक वनस्पति है जो स्वाद में तीती (कड़वी) होती है ये देव पूजन के काम में लाई जाती है. इसकी टहनियों को जोड़कर हाथ बनाये जाते है तथा इसी को चारे के समान काटकर प्रतिमाओं को बैठाने के लिए आसन भी तैयार किया जाता है. यही प्रसाद के काम में आती है.  इनके अतिरिक्त सुई, तागा, खुस, पहनाने के कपड़े, इत्यादि सामग्री प्रयोग में लायी जाती है।

केले के स्तम्भों से निर्मित प्रतिमाओं की कलाकारी में इस क्षेत्र की विशिष्टता है. इसमें कदली (केले) के स्तम्भों के टुकड़ों द्वारा ही प्रतिमाओं को विशेष स्वरूप दिया जाता है. यह स्वरूप लगभग नन्दादेवी पर्वत के स्वरूप के समान ही है. जो केले के स्तम्भों के आधार के ऊपर कपड़ा कस दिये जाने पर पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है. फिर कपड़े पर रंगों से देवी की आभा को पूर्ण विकसित कर दिया जाता है.
(Nanda Devi ki Pratima)

प्रतिमाओं के मुख मंडल में विशेष आकर्षण लाने के लिए कलाकारों द्वारा उपयुक्त वर्णित सामग्री का इस प्रकार प्रयोग किया जाता है कि निर्मित प्रतिमाओं को देख कर दर्शक स्वयं ही श्रद्धा से इन प्रतिमाओं के सम्मुख नतमस्तक हो जाते हैं.

प्रतिमा निर्माण में एक विशेष बात खोड़िया (स्वास्तिक का चिह्न), सूर्य तथा चन्द्रमा के प्रतीक चिह्न निर्मित किया जाना भी है. ये ब्रह्मांड और प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं तथा इस क्षेत्र में मांगलिक कार्यों में भी ये प्रतीक निर्मित किये जाते रहे हैं.

अष्टमी के दिन प्रातःकाल से ही बड़ी संख्या में इस अंचल के लोग मांगलिक वस्त्रों को पहन कर प्रतिमाओं की पूजा, अर्चना के लिए आते है यह क्रम अपराह्न तक चलता है. इसी दिन राति में मुख्य पूजा होती है.
(Nanda Devi ki Pratima)

इन मूर्तियों की पूजा में दो विशिष्ट प्रकार की चौकियां (ऐपण) बनती हैं. एक चौकी में सप्तमी की रात्रि प्रतिमाओं के पूर्ण बन जाने के उपरान्त इसके ऊपर पाती (घास) बिछाकर प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है और दूसरी चौकी अष्टमी की रात्रि की मुख्य पूजा के लिये बनाई जाती है. तंत्र विद्या में इन चौकियों का विशेष महत्व माना जाता है प्रतिमा निर्माण का एक आधार भी तंत्र शास्त्र ही है.

प्रतिमा निर्माण में परम्परागत कुमाऊँनी संस्कृति की झलक मिलती है. प्रतिमाओं को परम्परागत परिधान घाघरा, आंगड़ा, (ब्लाउज) एवं धोती का पिछोड़ा पहनाया जाता है. इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में प्रचलित फेटा (पाग) भी प्रतिमाओं में उसी प्रकार पहनाई जाती है जैसे इस अंचल की ग्रामीण महिलाएं पहना करती हैं. प्रतिमाओं में जो पिट्ठयां लगाया जाता है वह नाक के ऊपर से लगाया जाता है जैसा इस क्षेत्र की ग्रामीण महिलाएं आज भी लगाया करती हैं. इस प्रकार नन्दा देवी की प्रतिमा निर्माण कला इस क्षेत्र की परम्परागत लोक कला, तांत्रिक उपासना पद्धति एवं संस्कृति को अक्षुण्य बनाये रखने का महत्वपूर्ण कार्य करती चली आ रही है.
(Nanda Devi ki Pratima)

प्रमोद बिष्ट

20 सितम्बर 1988 को कौशल किशोर सक्सेना द्वारा नंदा देवी सन्दर्भ पत्रिका अल्मोड़ा से प्रकाशित की गयी. पी.सी. जोशी और डॉ. निर्मल जोशी द्वारा सम्पादित इस पुस्तक के संरक्षक भैरव दत्त पांडे थे. प्रमोद बिष्ट का यह लेख नंदा देवी पत्रिका से साभार लिया गया है.

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