समाज

अल्मोड़े के नंदादेवी मेले का इतिहास

प्रतिवर्ष अल्मोड़ा जनपद के मुख्यालय तथा गरूड़ (बैजनाथ) में स्थित कोट नामक स्थान में भाद्र शुक्ल पक्ष अष्टमी को मनाये जाने वाला नन्दाष्टमी का मेला एक ऐतिहासिक एवं धार्मिक मेला है. इस मेले का आरम्भ तत्कालीन कुमाऊं नरेश राजा बाजबहादुर चन्द उर्फ बाजा गुसाई (सन् 1638-1678) द्वारा गढवाल के जूनागढ़ के किले से नन्दादेवी की शक्त्ति पीठ को गढ़वाल विजय के अनन्तर विजय प्रतीक के रूप में प्राप्त कर अल्मोड़ा कचहरी जो तत्समय कुमाऊँ नरेश के मल्ला महल के नाम से विख्यात राज प्रसाद था, में निर्मित देवालय में प्रतिष्ठित कर दिये जाने से हुआ.
(Nanda Devi Mela Almora History)

सन् 1790 से सन् 1815 तक के अराजकतापूर्ण गोरखा शासन काल में, जिसे गोरख्योला के नाम से जाना जाता है, कुमाऊं की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत से सम्बद्ध अधिकांश अभिलेख नष्ट कर दिया गया था. अत: परम्परागत जनश्रुति है कि जूनागढ़ के किले से प्राप्त देवी विग्रह विजयोपरान्त वापसी यात्रा में कोट नामक स्थल में स्वत: दो भागों में विभक्त हो जाने पर राज ज्योतिषियों के परामर्श पर एक भाग को कोट में और दूसरे भाग को मल्ला महल में स्थापित कर दिया गया था.

मल्ला महल राजा का निजी आवास होने से उसके मध्य स्थित देवालय एक सार्वजनिक मन्दिर न होकर राजा का निजी देवालय, जिसे कुमाऊनी भाषा में देवताथान कहा जाता है, था. इसके रखरखाव व पूजा अर्चना का समस्त व्यय राज दरबार द्वारा वहन किया जाता था. इस परम्परा का अल्मोड़ा के अन्तिम चन्द वंशीय राजा आनन्द सिंह द्वारा मृत्युपर्यन्त निर्वाह किया गया था.

श्री नन्दादेवी की मूर्ति का वर्तमान स्थान में स्थानान्तरण मि. ट्रेल, कमिश्नर कुमाऊं के द्वारा सन् 1816 से 1830 के मध्य किया गया. उक्त आंग्ल प्रशासक महोदय ने श्री नन्दादेवी तथा काल भैरव के मन्दिरों में होने वाली पशु बलि प्रथा से भयाक्रान्त होकर मल्ला महल में स्थापित कचहरी से उक्त दोनों देव प्रतिमाओं को किले से बाहर क्रमशः लाला बाजार और खजान्ची मुहल्ले में मौजूदा स्थलों पर प्रतिस्थापित करवाया ताकि कालान्तर में धार्मिक बलिदानों की आड़ में उनका ही बलिदान कर दिये जाने की स्थिति उत्पन्न न होने पावें.
(Nanda Devi Mela Almora History)

सम्प्रति जिस मण्डप में श्री नन्दादेवी प्रतिष्ठित है वह राजा दीपचन्द्र द्वारा सन् 1760 ई. में निर्मित दीपचन्देश्वर महादेव मन्दिर के साथ संयोजत उस चौपखिये मण्डप का मध्यवर्ती भाग है जिसको तत्कालीन राजसलाहकारों ने राजा दीपचन्द को सन् 1777 में सता-सता कर मार डालने से उसकी अतृप्त आत्मा के कीलन की दृष्टि से निर्मित कराया था. आज भी श्री नन्दादेवी मण्डप के पृष्ठवर्ती भाग में श्री दोपचन्देश्वर महादेव की प्रतिमा के पार्श्व में महाराजा दीपचन्द की मूर्ति विराजमान है. शिव प्रतिमा युक्त इस मन्दिर की दीवालों पर उत्कीर्ण भित्ती चित्र एवं मुद्रायें इस मन्दिर के शैव मन्दिर होने की प्रमाणिकता को सिद्ध करते हैं.

अल्मोड़ा शाखा के अन्तिम राजा कुंवर आनन्दसिंह के देहान्त हो जाने पर उनकी सम्पूर्ण सम्पत्ति का उत्तराधिकार उनके द्वारा एक विल के द्वारा सृजित ट्रस्ट को प्राप्त हुआ. इस विल में श्री नन्दादेवी के सम्बन्ध में केवल यह निर्देश दिये गये हैं कि हर वर्ष नन्दादेवी का मेला मनाया जायेगा. बकरे तथा 3 काटों का बलिदान किया जायेगा और 2000 रु. व्यय किये जायेंगे.

सन् 1956 तक ट्रस्ट के ट्रस्टियों द्वारा स्वेच्छापूर्वक मेले का प्रबन्ध व पूजा अर्चना करवाई गई. सन् 1957 से राजा काशीपुर अपने वंशानुगत कर्तव्य का पालन करने हेतु अल्मोड़ा आने लगे. तब से राजा काशीपुर तथा कुंवर आनन्द सिंह मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा इस वार्षिक पूजा को सम्मिलित रूप से सम्पन्न किया जा रहा है. श्री नन्दादेवी मन्दिर के वार्षिक रखरखाव की ओर ट्रस्ट और काशीपुर राज दरबार द्वारा किसी प्रकार की भूमिका नहीं निभाई जाती है. अत: इसे दानदाताओं, भक्तों एवं श्रद्धालुओं की भेंट इत्यादि पर ही वर्ष भर की पूजा अर्चना एवं अन्य व्ययों के लिये आश्रित रहना पड़ता है.

मुझे अपने पू. पिता श्री भगवती लाल साह के साथ-साथ काशीपुर राज दरबार के अनुरोध पर इस मेले की सम्पूर्ण व्यवस्थाओं को सुनिश्चित एवं सम्पन्न करने का सौभाग्य सन् 1957 से सन् 1979 तक प्राप्त रहा. ट्रस्ट एवं काशीपुर दरबार की मिली जुली पूजा प्रणाली के अन्तर्गत श्री नन्दादेवी के वार्षिक पूजन पर पंचमी से सप्तमी तक का व्यय ट्रस्ट द्वारा तथा अष्टमी से विसर्जन तिथि तक का समस्त व्यय काशीपुर राज दरबार द्वारा वहन किया जाता रहा है.
(Nanda Devi Mela Almora History)

इस प्रकार केवल नन्दादेवी की वार्षिक पूजा के प्रति ट्रस्ट एवं काशीपुर दरबार की प्रतिबद्धता तथा श्रध्दा का यह केन्द्र शनैः शनैः अपना अस्तित्व खोते जा रहा था. जनपद के भू. पू. जिलाधिकारी श्री एस. के. दास और श्री नन्दा गीता भवन एवं मन्दिर सुधार समिति के सदप्रयासों से गत दिनों इस मन्दिर के भवनों एवं परिसर में करवाये गये सुधार और निर्माण कार्यों से इसके स्वरूप में काफी निखार आया है.

सन् 1690 में राजा उद्योतचन्द द्वारा निर्मित पार्वतीश्वर मन्दिर तथा सन् 1760 में राजा दीपचन्द द्वारा निर्मित दीप चन्देश्वर मन्दिर में की गई खुदाई से कुमाऊँ में पल्लवित उस श्रेष्ठ कला की जानकारी मिली है जिसकी गणना अजन्ता तथा एलोरा की भित्ती कला के साथ बखूबी की जा सकती है. मन्दिर के परिसर में स्थित जीर्ण धर्मशाला जो असामाजिक एवं अपराधिक तत्वों का आश्रय स्थल बना हुआ था, को तोड़कर उसके स्थान पर नन्दा गीता भवन का निर्माण कर दिये जाने से इस स्थल पर धार्मिक सन्संगों, समारोहों एवं प्रवचनों का आयोजन करने की दिशा में सुयोग एवं सत्प्रेरणा जागृत हुई है. मन्दिर के गर्भ गृह एवं सन्मुख प्रांगण में किये गये मार्बल व टाईल वर्क से मां भगवती के दरबार को भव्यता प्राप्त हुई है.
(Nanda Devi Mela Almora History)

वृजराज साह

20 सितम्बर 1988 को कौशल किशोर सक्सेना द्वारा नंदा देवी सन्दर्भ पत्रिका अल्मोड़ा से प्रकाशित की गयी. पी.सी. जोशी और डॉ. निर्मल जोशी द्वारा सम्पादित इस पुस्तक के संरक्षक भैरव दत्त पांडे थे. वृजराज साह का यह लेख नंदा देवी पत्रिका से साभार लिया गया है.

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