समाज

आमा के हाथ वाले लिटुवा के स्वाद की अब दुआ ही की जा सकती है

आजकल आत्मनिर्भरता का शोर बहुत है लेकिन जब तक आमा थी यह शोर नहीं था. इसके बावजूद न सिर्फ आमा बल्कि पूरा परिवार ही आत्मनिर्भर था. घर में मवेशी इतने थे कि दूध, दही, घी से लेकर मक्खन और छाछ तक सब घर पर ही बन जाया करता था. आमा-बूबू द्वारा गुड़ाई किये गये छोटे से बाड़े में वो तमाम सब्जियाँ उग जाया करती थी जिनके लिए आज बाजार में निर्भर रहना पड़ता है.
(Litua Traditional Food of Uttarakhand)

गरीब या निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की आधी से ज्यादा आर्थिक समस्याएँ घर में पल रहे जानवरों से ही दूर हो जाती थी. दुधारू गाय और भैंस के दूध से बने घी और मक्खन आमदनी का बड़ा साधन हुआ करते थे. आज बाजार में पैकेट में बिकने वाली छाछ तो उस समय लगभग अपशिष्ट ही मानी जाती थी जिसे कोई फ्री में लेने तक को तैयार नहीं होता था.

घर में बनी छाछ के गुणधर्मों को आमा ने बखूबी जान लिया था जिसकी मदद से वह अनेक प्रकार का स्वादिष्ट खाना तैयार कर देती थी. झोली/झोई, मैरी (छाछ में चावल, नमक, हल्दी व मिर्च डालकर बना खाना), खित्यो साग (आलू, प्याज या लौकी की बनी सूखी सब्जी में से कुछ अलग कर उसमें छाछ डालकर तैयार सब्जी) तथा लिट्वा/लिट्टू/लीटा आदि छाछ से बने कुछ ऐसे ही पकवान थे जो आमा के हाथ का जादू थे.

इस व्यंजन को कुमाऊँनी घरों में सबने अपनी सुविधानुसार नाम दिया है. कोई लिट्टू कहता तो कोई लीटा तो कोई लिट्वा लेकिन नाम बदल जाने से इसके स्वाद में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आता था. छाछ से बनने वाले तमाम पकवानों में एक लिट्वा ही था जिसके लिए आमा की तरह स्पेशलाइज्ड होना जरूरी था. बनाते वैसे सभी थे लेकिन जैसा आमा बनाती थी वैसा बन जाने की दूसरे लोग बस दुआ ही करते थे.

आमा का लिट्वा बनाने का एक विशेष तरीका था. वैसे तो लिट्वा मंडुवे व मक्के के आटे का भी बनता था लेकिन आमा अधिकतर गेहूं के आटे का ही बनाया करती थी. लकड़ी के चूल्हे में तेज जलती ऑंच पर वह एक कढ़ाई रखती थी जिसमें लगभग दो लीटर छाछ डालकर उसे उबालती रहती. आमा छाछ के उबलने तक उसे लगातार एक साफ लकड़ी के गोल डंडे से हिलाती रहती ताकि छाछ फटकर पानी अलग न छोड़ दे. उबलती छाछ में लगभग 200-250 ग्राम आटे को धीरे-धीरे मुट्ठी भर डालती रहती और लकड़ी के डंडे से उसे छाछ में इस तरह मिलाती कि आटे की गोलियां न बनें. आटे के छाछ में पूरी तरह मिल जाने के बाद आमा उसे खूब देर तक पकाती जब तक की वह भूरा रंग लिये लेई जैसा चिपचिपा न हो जाए.
(Litua Traditional Food of Uttarakhand)

कुछ लोग मीठे के लिए छाछ में गुड़ मिला देते थे लेकिन आमा हमेशा फीका लिट्वा ही बनाती थी ताकि पकने के बाद उसके ऊपर अलग से घी और चीनी मिलाकर खाया जा सके.

लिट्वा बनने के बाद आमा उसे आग से उतार देती. इस पकवान की खास बात यह थी कि एक तो यह बहुत हेवी खाने में गिना जाता था और दूसरा इसे गरमा-गरम ही खाया जा सकता था. थाली में परोसे गए लिट्वे में खूब सारा घी डालकर उसके ऊपर चीनी की टॉपिंग कर हाथ से गरमा-गरम खाने पर मुँह में वह स्वाद घुलता था कि लिट्वा खाने की कई दिनों की इच्छापूर्ति उस एक क्षण में ही हो जाती थी.

इस तरह आमा अपने हाथों से इस जायकेदार पकवान को समय-समय पर बना ही दिया करती थी. आमा के न रहने के बाद लिट्वा कई सालों से नसीब होना बंद हो गया. लोगों ने जानवर पालने छोड़ दिये जिस वजह से अपशिष्ट समझी जाने वाली छाछ का बाजारीकरण हो गया. बाजारू छाछ की गुणवत्ता में भी वह बात नहीं रही जो घर में बनीं छाछ की होती थी.

समय बीतने के साथ ही छाछ की जगह बाजार के दही ने ले ली. आज भी अगर कुछ घरों में छाछ बनती है तो उसका बहुतायत उपयोग सिर्फ झोली बनाने या फिर नमक अथवा चीनी मिलाकर पीने तक सीमित रह गया है. कहने के लिए तो पकवानों की यह विरासत बुजुर्गों द्वारा आज की पीढ़ी तक को हस्तांतरित की गई है लेकिन बाजार पर निर्भरता के बीच आज की पीढ़ी इन पकवानों के नाम तक भूल चुकी है. समय का पहिया घूम चुका है. विपत्ति के कारण ही सही लोग पुन: पहाड़ों की तरफ वापस लौटने लगे हैं. पहाड़ों की तरफ लौटने के साथ-साथ हमें अपनी भुला दी गई संस्कृति व पकवानों की तरफ भी लौटना होगा. समय-समय पर भुलाये जा चुके इन पकवानों पर हाथ आजमाते रहना होगा ताकि आने वाली पीढ़ी न सिर्फ इन पकवानों के नाम जान सके बल्कि इन्हें बनाने की विधि भी उन तक हस्तांतरित हो सके.
(Litua Traditional Food of Uttarakhand)

इसे भी पढ़ें : आमा के हाथ का ज़ायक़ेदार खाना

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

View Comments

  • शानदार, उम्दा जानकारियां क्षेत्र के मुतल्लिक़

Recent Posts

Navigating the Smoothest Interfaces Among Top Online Casinos

Smooth navigation and intuitive layouts are key factors that shape how users engage with top…

9 hours ago

Test Post Created

Test Post Created

9 hours ago

Premium Service Tier Spinsy Casino verhoogt de kwaliteit van de klantenservice in België

Bij het onderzoeken van de Premium Service Tier die casino spinsy welkomstbonus heeft gelanceerd, wordt…

24 hours ago

Navigating Neosurf Payments Changes the Way Aussies Play Online Casinos

Neosurf’s payment system offers Australian players a straightforward and secure option when engaging with online…

1 day ago

Test Post Created

Test Post Created

1 day ago

Wingaga iOS – kompletní průvodce, bonusy, platby a bezpečné hraní

Wingaga iOS – kompletní průvodce pro české hráče Co je Wingaga iOS a proč si…

1 day ago