समाज

दुधबोली बचाने के प्रयास में जुटी हेम और हिमांशु की जोड़ी

किसी भाषा को कैसे बचाया जा सकता है? यह एक ऐसा सवाल है जिसके बड़े लम्बे चौड़े उत्तर दिये सकते हैं, कविता की जा सकती है. गोष्ठी की जा सकती है. सांस्कृतिक कार्यक्रम किये जा सकते हैं, उसके व्याकरण के लिये लड़ा जा सकता, मोटे-मोटे शब्दकोश बनाये जा सकते हैं और भी दुनिया बदलने वाले सतत क्रांतिकारी कार्यक्रम किये जा सकते हैं. इस सबके बीच हकीकत यह है कि भाषा केवल बोलने से बचती है. इसके अलावा और कोई ऐसा जतन नहीं है जिससे किसी भाषा को बचाया जा सके. कुमाऊनी को बचाने के लिये इस बेहद सामान्य सी समझ को समझा है ‘हेम पन्त’ ने. ‘हमार पुरुख’ की सीरीज इसी समझ का ही एक नतीजा है :
(Kumoni Shabd Sampada)

पिछले वर्ष जब लॉकडाउन शुरु हुआ तो सभी लोग अपने-अपने घरों में फंसे थे. ऐसे में हेम पन्त और हिमांशु ने अपनी दुधबोली के लिये एक प्रयास शुरु किया. उन्होंने देश और दुनिया में बसे कुमाऊं के बासिंदों के इंटरव्यू की एक सीरीज की शुरुआत की जिसकी एक शर्त थी इंटरव्यू कुमाऊंनी में होगा. सीरीज का नाम था : “म्योर पहाड़, मेरि पछयांण”.  

कुछ लोगों को तब भी लगा होगा और कुछ लोगों को आज भी लगेगा कि इंटरव्यू कुमाऊनी में होने से क्या फर्क हो जाएगा? इसका जवाब हेम पन्त द्वारा बताये एक वाकिये में हैं :

जनवरी महीने में रुद्रपुर में हुई एक शादी के दौरान मुझे 20-21 साल का लड़का मिला. नमस्कार आदि के बाद कहने लगा – दा, मुझे बड़ी शर्म आती है जब आप लोगों के इंटरव्यू देखता हूं तो. मैंने चौंककर पूछा – क्यों भाई क्या बात हो गयी. उस लड़के ने जवाब दिया – दा, देश और दुनियाभर में इतने बड़े-बड़े पदों में बैठे लोग, इतने बड़े पुरस्कार प्राप्त लोग भी आपके यहाँ आकर कुमाऊनी में बोलते हैं. जिसको जितनी आती है उतनी बोलता है पर कोशिश नहीं छोड़ता है. एक हम हैं जो कॉलेज पहुंचते ही कुमाऊनी लहजे से छुटने की जद्दोजहद में जुट जाते हैं. समझ तो मुझे भी आती है बोलनी नहीं आती.
(Kumoni Shabd Sampada)

हेम बताते हैं कि मुझे समझ नहीं आया कि मैं उसे क्या जवाब दूं पर मैं उसके कंधे पर इतना कह सका – आ जालि भाया आ जालि, बस कबै भूले जन अपुन बोलि…

हेम और हिमांशु की यह पहल उस चक्र को तोड़ने की ही एक कोशिश है जिसमें अपनी बोली से यह कहकर पल्ला झाड़ा जाता है कि हमको समझ तो आती है बोलनी नहीं आती. कहीं न कहीं उनकी यह पहल साकार होती भी नजर आ रही है. जिसका प्रमाण हैं ‘म्योर पहाड़, मेरि पछयांण‘ की 85 इंटरव्यू की एक लम्बी सीरीज.  

वर्तमान में ‘म्योर पहाड़, मेरि पछयांण’ सीरीज के तहत दो कार्यक्रम चल रहे हैं. एक व्यक्तिगत साक्षात्कार की सीरीज और दूसरी दिवंगत हो चुके पुरखों पर परिचर्चा की सीरीज. ‘हमार पुरख’ सीरीज में अब तक शैलेश मटियानी, के.एस. वल्दिया, मोहन उप्रेती, चंद्रशेखर लोहुमी, शिवानी और नैनसिंह रावत पर चर्चा हो चुकी है.

इस सीरीज को ‘कुमाउनी शब्द संपदा’ के पेज पर देखिये : कुमाउनी शब्द संपदा
(Kumoni Shabd Sampada)

–काफल ट्री डेस्क

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