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आपकी आत्मा को प्रकृति से जोड़ देता है कौसानी

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में है अल्मोड़ा जिला. इस जिले में कई सुन्दर पर्यटन स्थल हैं. इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय है कौसानी. जिन भी सैलानियों को पहाड़ में शहर की तड़क-भड़क और सुख-सुविधाओं के मजे नहीं लेने होते कौसानी उनकी मंजिल है. मतलब जिनके लिए पहाड़ घूमने का मतलब प्रकृति को नजदीक से महसूस करना हो वे कौसानी पहुँचते हैं. (Kausani Tourist Destination Kumaon)

समुद्र तल से 1760 मीटर उंचाई पर मौजूद कौसानी अल्मोड़ा और बागेश्वर जिलों की सीमा पर है. कौसानी को क़ुदरत में जमकर नेमतें बख्शी हैं. इस छोटे से पहाड़ी कस्बे के लगभग हर छोर से हिमालय का नजारा दिखाई देता है. कौसानी से हिमालय की पंचाचूली, चौखम्भा, त्रिशूल, नन्दा देवी, नन्दाघुंटी, चौखम्भा आदि चोटियों का दिलकश नज़ारा देखने को मिलता है. 

शहर के निचले हिस्से में स्थानीय बाजार है और ऊपरी हिस्सों में है पर्यटकों के रुकने की तरह-तरह की जगहें. कस्बे के ऊपरी हिस्से में ही है अनाशक्ति आश्रम, जिसे गांधी आश्रम भी कहते हैं. साल 1929 में महात्मा गांधी 22 दिन की कुमाऊं यात्रा पर आये. अपने कुमाऊं प्रवास का ज्यादातर हिस्सा उन्होंने कौसानी में ही गुजारा. गांधी ने कौसानी में ही अनाशक्ति योग ग्रंथ भी लिखा. इस दौरान वे जिस रेस्ट हाउस में रहे उसे ही अनाशक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है. अनाशक्ति आश्रम कुछ शर्तों के साथ हर ख़ास-ओ-आम के रहने के लिए खुला है. बाद में गांधी की शिष्या सरला बहन ने यहां कस्तूरबा महिला आश्रम की भी स्थापना की. कौसानी को इसलिए भी पहचाना जाता है कि यहां सुमित्रानन्दन पंत का बचपन बीता.

कौसानी से हिमालय का 300 किमी का नजारा तो दीखता ही है, यहां सूरज का जलना और बुझना भी बहुत सुंदर दिखता है. कौसानी दुनिया की उन जगहों में से एक है जहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का बहुत खुबसूरत नजारा दिखाई देता है.

वैसे तो प्रकृति के मनमोहक नज़ारे ही कौसानी पहुंचने का पर्याप्त कारण हैं लेकिन इसके आसपास और भी बहुत कुछ है. कौसानी से लगभग 20 किमी की दूरी पर है बैजनाथ का पौराणिक मंदिर. बैजनाथ गारुड़ी और गोमती नदी के संगम स्थल पर बसा है. बैजनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा यहाँ सूर्य, ब्रह्मा, कुबेर, चंडी, काली आदि के मंदिर हैं. यहाँ मौजूद अधिकांश देवी-देवताओं की मूर्तियों को पुरातत्विक संग्रहालय में रखा गया है.

कौसानी में ही कत्यूर घाटी के चाय बागान भी हैं जो कभी दार्जिलिंग के चाय बागानों की तोड़ के माने जाते थे. अंग्रेजी राज में यहां दुनिया की बेहतरीन चाय पैदा की जाती थी. इस चाय को ले जाने के लिए ही 1892 में यहां सड़क बनायी गयी. आज भी कौसानी के चाय बागानों में उम्दा चाय पैदा की जाती है.

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Sudhir Kumar

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