फोटो : श्याम सिंह रावत
संसारभर में समुद्र की सतह से सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित एकमात्र सूर्य मंदिर तथा कोणार्क (ओडिशा) के सूर्य मंदिर के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा सूर्य मंदिर उत्तराखड में कटारमल (अल्मोड़ा) स्थित सूर्य मंदिर है. यह मंदिर अल्मोड़ा शहर से रानीखेत की ओर जाने वाले मार्ग पर 14 किमी. दूर कोसी नामक स्थान के बाद 3 किमी. ऊपर पहाड़ी पैदल मार्ग पर बसे अधेली सुनार नामक गॉंव में स्थित है. इस सूर्य मंदिर तक पहुंचने के लिए दूसरी ओर से एक मोटर मार्ग भी बनाया गया है लेकिन बरसात और भूस्खलन के चलते वह टूट-फूटकर जर्जर अवस्था में रहता है.
ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि यह मंदिर कोणार्क के विश्वविख्यात सूर्य मंदिर से लगभग दो सौ वर्ष पुराना है. इसका निर्माण प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में कुमाऊँ क्षेत्र के कत्यूरी राजवंश के तत्कालीन शासकों द्वारा छठीं से नवीं शताब्दी के बीच कराया गया था. जबकि यहां स्थित 44 अन्य मंदिरों का निर्माण अलग-अलग समय पर किया गया. इस मंदिर की स्थापना के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार समय-समय पर होता रहा है. यह कुमाऊॅं के विशालतम ऊँचे मंदिरों में से एक तथा उत्तर भारत में विलक्षण स्थापत्य एवं शिल्प कला का बेजोड़ उदाहरण है. समुद्र तल से 2116 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यहां का मुख्य मंदिर पूर्वाभिमुख है. जिसका निर्माण इस प्रकार करवाया गया है कि सूर्य की पहली किरण मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर पड़ती है.
मंदिर एक ऊँचे वर्गाकार चबूतरे पर है बना हुआ है. इसकी दीवार पत्थरों से बनी है और इनके खम्भों पर खूबसूरत नक्काशी की गई है. मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार उत्कीर्ण की हुई लकड़ी का था, जो इस समय दिल्ली के ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ की दीर्घा में रखा हुआ है. आजकल देवदार की लकड़ी से बने हुए इसके सुंदर दरवाजे पर्यटकों को बहुत चित्ताकर्षक लगते हैं.
मंदिर का परिसर लगभग 1000 साल पुराना है. यहां का मुख्य मंदिर 44 छोटे-छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है. यह मंदिर प्राचीन देवता सूर्य को समर्पित होने से वर्धादित्य या बड़ादित्य कहलाता है. मंदिर परिसर में सूर्य की तीन प्रतिमाओं के अतिरिक्त शिव-पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, नृसिंह, गणेश, कार्तिकेय आदि देवी-देवताओं की अनेक नयनाभिराम प्रतिमाएं भी हैं. मंदिर के ऊँचे खंडित शिखर को देखकर इसकी विशालता व वैभव का अनुमान सहज ही हो जाता है. मुख्य मंदिर की संरचना त्रिरथ है, जो वर्गाकार गर्भगृह के साथ नागर शैली के वक्र रेखी शिखर सहित निर्मित है.
मंदिर परिसर में पहुंचते ही इसकी विशालता और वास्तु शिल्प बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेते हैं. गर्भगृह का प्रवेश द्वार बेजोड़ काष्ठ कला द्वारा उत्कीर्ण था, जो कुछ अन्य अवशेषों के साथ वर्तमान में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित है. मंदिर स्वयं में वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है. यहां की दीवारों पर बेहद जटिल नक्काशी की गई है. यह सूर्य मंदिर अपनी शानदार वास्तुकला, कलात्मक रूप से तराशे गये पत्थरों और धातुकर्म तथा खूबसूरती से बनाये गए नक्काशीदार खंभों और लकड़ी के दरवाजों के लिए प्रसिद्ध है. वर्तमान मंडप और बाड़े के भीतर कई धार्मिक स्थलों का निर्माण बहुत बाद में किया गया है. मंदिर में स्थापित पद्मासन मुद्रा में बैठे सूर्य की 12वीं शताब्दी में बनी प्रतिमा (मूर्ति) सहित नक्काशीदार दरवाजों और पैनलों को वर्तमान समय में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है.
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा इस मंदिर को संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है और वर्तमान समय में यह मंदिर परिसर इसी विभाग के अधीन है, जबकि पूजा-पाठ स्थानीय लोगों के पास परंपरागत रूप से है. रख-रखाव तथा समुचित मरम्मत आदि के अभाव में मुख्य मंदिर के शीर्ष का कुछ भाग ढह चुका है.
इतिहासकार एटकिंसन के अनुसार कुमाऊं के राजा कल्याणचंद के समय में ईस्वी सन् 1743 में रुहेला सरदार हाफिज़ रहमत खां ने अल्मोड़ा पर आक्रमण कर सात महीने तक अधिकार जमा लिया था. इसी दौर में उसके रुहेला सैनिकों ने इस मंदिर सहित अल्मोड़ा के निकटवर्ती क्षेत्र, द्वाराहाट, लखनपुर, भीमताल आदि भूभागों के मंदिरों में खूब तोड़फोड़ की, ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज जला डाले और भयानक कत्लेआम मचाया था. कटारमल का यह सूर्य मंदिर भी उसकी कोपदृष्टि का भाजन बना था. अब उन खंडित मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही अलग रखा गया है.
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यह लेख काफल ट्री की इमेल आईडी पर श्यामसिंह रावत द्वारा भेजा गया है. 73 वर्षीय श्यामसिंह रावत अपने परिचय के विषय में लिखते हैं : लिखना आता ही नहीं क्योंकि ‘मसि कागद छुयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ.’ मस्ती की पाठशाला में ऐसा पाठ पढ़ा कि खुद का परिचय जानने के चक्कर में यायावरी जो अपनाई तो इस में ही जीवन के 73 बसंत न जाने कब और कैसे निकल गये पता ही नहीं चला. आज भी ‘अपनी’ तलाश जारी है.
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सुंदर रावत जी अगले लेख का इंतजार रहेगा
क्या सचमुच किसी ने सूर्योदय की किरण को मंदिर में प्रविष्ट होते देखा है ? यदि हां तो किसने और कब ? इसी प्रकार इस मंदिर के कोणार्क मंदिर से भी पुराना होने का स्पष्ट प्रमाण क्या है ?