रिज़र्व बैंक अपनी करनी पर आया तो 27 अगस्त को दीवालिया हो जाएंगीं देश की सबसे बड़ी कम्पनियां

बैंको के बड़े अधिकारी, देश के वित्तमंत्री, नीति आयोग से जुड़े लोग हमेशा यह कहते आये हैं कि बैंकिंग का बुरा वक्त अब बीत चुका है लेकिन सच तो यह हैं कि बैंक की वास्तविक स्थिति दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही है और अब यह ‘वर्स्ट’ ओर बढ़ रही है, लेकिन देश के मीडिया को इसकी कोई चिंता नही है उसे इसी बात से मतलब है कि राहुल गांधी हिन्दू मुस्लिम के बारे में क्या बयान देते हैं.

रिजर्व बैंक के 12 फरवरी के सर्कुलर में 27 अगस्त यानी कल बैंको ओर कर्ज लेने वाली कम्पनियों के लिए आखिरी दिन है, जब वह कोई रिजोल्यूशन पर पुहंच सकता है. उसके बाद बैंकों को इनके खिलाफ दिवालिया कार्रवाई शुरू करनी पड़ेगी.

पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में बैंको का कुल नुकसान 2.42 लाख करोड़ रुपये रहा. परिणामस्वरूप NPA का स्टॉक 1.2 लाख करोड़ रुपये बढ़कर 10.4 लाख करोड़ हो गया था अब यह ओर भी अधिक बढ़ने वाला है. अब और 70 कम्पनियों के कर्ज से जुड़े मामले नैशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (NCLT) के पास भेजे जाएंगे इसमे इन बैंको के मामले शामिल हैं-

एसबीआई – 40, आईडीबीआई – 40, आईसीआईसीआई – 32, पीएनबी – 35, एक्सिस बैंक – 23, बैंक ऑफ बड़ौदा – 20, यूनियन बैंक – 18 और बैंक ऑफ इंडिया – 8.

अब इन आंकड़ों पर आप ध्यान दे तो एक्सिस बैंक 23, आईडीबीआई 40 आईसीआईसीआई 32 यानी निजी क्षेत्र के बैको को भी झटका लगना तय है यानी ओर बैंक भी PCA फ्रेमवर्क के तहत आने वाले है, निजी क्षेत्र के बैंक अच्छे हैं ये भरम भी टूटने वाला है दीवालिया कार्रवाई आगे बढ़ने पर शेयर बाजार को एक जोरदार झटका लग सकता है जिससे बढ़ते बाजार का सपना चकनाचूर हो जाएगा.

इस सारी प्रक्रिया में एक खास बात और है कि मोदी सरकार अब इस समस्या को ओर आगे धकेल नही सकती और अगर वह ऐसा करती है तो भारत की बैंकिंग व्यवस्था पूरे विश्व की बैंकिंग व्यवस्था से अलग थलग पड़ जाएगी.

दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विश्व स्तर पर मान्य बेसल-3 मानकों को लागू करने की समय सीमा समाप्त होने वाली है. बैंकों को बेसल-3 को 1 जनवरी 2013 से लेकर 31 मार्च 2018 तक धीरे-धीरे लागू करना था लेकिन इसे 1 साल और बढ़ाकर 31 मार्च 2019 पहले ही किया जा चुका है. भारतीय बैंकों को बेसल-3 के नियमों को पूरा करने के लिए करीब 4.22 लाख करोड़ रुपए (65 अरब डॉलर) अतिरिक्त पूंजी की जरूरत है. सरकार इस अतिरिक्त पूंजी को देने से पहले ही इनकार कर चुकी हैं चूँकि सभी बैंकों को इन नियमों को मार्च, 2019 तक पूरा करना जरूरी है इसलिए अब और समय नही बचा है, देश गहन आर्थिक संकट में है.

दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में 27 अगस्त 2018 एक ऐतिहासिक दिन साबित होने जा रहा है. आपको याद होगा कि पीएनबी घोटाले पर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा था कि सिस्टम को साफ करने के लिए अगर पत्थर खाने और नीलकंठ बनकर जहर पीने की जरूरत पड़ी तो हम उसके लिए भी तैयार हैं तो अब वो दिन आ गया है.

रिजर्व बैंक द्वारा फरवरी 2018 में जारी एक सर्कुलर में यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया था यदि कारपोरेट को कर्ज चुकाने में यदि 1 दिन की भी चूक होती है तो उसे डिफाल्टर मान कर रकम को एनपीए घोषित किया जाए. इसे ‘वन-डे डिफॉल्ट नॉर्म’ कहा गया. इसे 1 मार्च से लागू किया गया था.

इसी सर्कुलर में रिजर्व बैंक ने कंपनियों को बैंकों के साथ पिछले सभी पुनर्भुगतान संबंधी मसलों को सुलझाने के लिए 1 मार्च, 2018 से 180 दिन का वक्त दिया गया था जिसमें नाकाम रहने पर उनके संबंधित खातों को दिवालिया घोषित किए जाने की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए बाध्य किया जा सकेगा. 27 अगस्त को यह मियाद समाप्त होने वाली हैं.

यह कितना खतरनाक सिद्ध हो सकता है, इसे आप इस बात से समझ लीजिए कि ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन का इस सर्कुलर के बारे में कहना है कि इस प्रावधान से एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा और इससे बैंकों के वजूद पर खतरा आ जाएगा. दो दिन पहले आईसीआईसीआई बैंक के चेयरमैन जी.सी.चतुर्वेदी ने भी कहा कि आरबीआई अपने विवादास्पद एक-दिवसीय डिफॉल्ट मानक की समीक्षा करे.

इस सर्कुलर के अनुसार सितंबर में 70 कंपनियों के खिलाफ दिवालिया घोषित किये जाने की कार्यवाही शुरू की जा सकती है. इन कंपनियों पर बैंकों के 3.5 से 4 लाख करोड़ के कर्ज हैं. इन छह महीनों में इन कम्पनियों ओर बैंको ने अपने आपस के विवाद निपटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किये. सर्कुलर में 200 करोड़ से अधिक बकाये वाली कम्पनियों से 20 फीसदी लेकर रिस्ट्रक्चरिंग की बैंको को छूट दी गयी थी लेकिन इस पर भी सहमति नही बन पायी.

इस सर्कुलर से भारत की पावर सेक्टर की कम्पनियां सबसे अधिक प्रभावित होने जा रही हैं. पहली मार्च को जिन 81 कंपनियों ने डिफॉल्ट किया था इनमें 38 अकेले पावर सेक्टर की हैं. अडानी पॉवर ओर टाटा पावर जैसी बड़ी कम्पनियां दीवालिया होने जा रही हैं. बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच के अनुसार बिजली कंपनियों पर 2.6 लाख करोड़ कर्ज बकाया है जिसमें बड़े पैमाने पर रकम NPA होने की संभावना है.

इन पावर कंपनियों ने अपने NPA पर आरबीआई के इस सर्कुलर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी थी, लेकिन इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पावर सेक्टर के एनपीए पर आरबीआई के 12 फरवरी को जारी सर्कुलर पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. एक प्रश्न यह भी खड़ा होता हैं कि क्या इससे देश भर में बिजली का संकट गहरा सकता है. जवाब यह है कि बिल्कुल ऐसा हो सकता है क्योंकि इन कम्पनियों ने 27 अगस्त को लॉक आउट की धमकी भी केंद्र सरकार को दे दी है.

इस सूची में 43 कंपनियां नॉन-पावर सेक्टर की भी है बड़ी कम्पनियों में अनिल अंबानी समूह की रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस डिफेंस एंड इंजीनियरिंग (अब रिलायंस नेवल), पुंजलॉयड, बजाज हिंदुस्तान, मुंबई रेयान, जीटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर, रोल्टा इंडिया, श्रीराम ईपीसी, ऊषा मार्टिन, एस्सार शिपिंग और गीतांजलि जेम्स शामिल हैं.

यानी मोदी सरकार की चहेती अडानी समूह की बड़ी कम्पनियां ओर अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर खड़ी है और आप विडम्बना देखिए कि मोदीं सरकार इन्हें राफेल सौदे में डसाल्ट एविएशन से ठेके दिलवा रही है. मोदीं खुद अडानी के प्लेन में सफर करते कितनी ही बार नजर आए हैं.

इसलिए मोदी सरकार का पूरा जोर होगा कि किसी भी तरह से 2019 के लोकसभा चुनाव तक यह मामला टल जाए क्योंकि यदि इन 70 कम्पनियों को दिवालिया घोषित कर दिया तो एक झटके में भारत की बैंकिंग व्यवस्था और शेयर बाजार धराशायी हो सकते हैं. और भारत की जनता को वक्त से पहले ही न्यू इंडिया और अच्छे दिनों की हकीकत पता चल जाएगी.

(मीडिया विजिल से साभार)

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