कुमाऊं में गांधी
उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन के सूत्रपात में प्रमुखतया महात्मा गांधी की भूमिका मानी जाती है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के कार्यक्रमों व अधिवेशनों में उत्तराखण्ड के व्यक्तियों की हिस्सेदारी होने से यहां स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन की लहर तेजी से फैली.
खुमाड़ (सल्ट) के आन्दोलन को गांधी जी ने कुमांऊ की बारदोली की संज्ञा प्रदान की. यही कारण था कि उत्तराखण्ड में स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति तक अनवरत रूप से जारी रहा. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर में गांधी ने उत्तराखण्ड के हरिद्वार, गुरूकुल कांगड़ी, हल्द्वानी, नैनीताल, ताकुला, भवाली, ताड़ीखेत, अल्मोड़ा, कौसानी, बागेश्वर, काशीपुर, देहरादून व मंसूरी जैसे स्थानों की यात्रा की. उन्होंने वर्ष 1915 से 1946 तक तकरीबन छह बार उत्तराखण्ड की यात्रा की.
वर्ष 1915 के अप्रैल माह में वे कुम्भ के मौके पर हरिद्वार आये और ऋषिकेश व स्वर्गाश्रम भी गये. उत्तराखण्ड में उनकी यह पहली यात्रा थी. इसके बाद वे वर्ष 1916 में पुनः हरिद्वार आये और स्वामी श्रद्धानन्द के विशेष आग्रह पर उन्होंने गुरूकुल कांगड़ी में व्याखान दिया. इसी दौरान गांधी जी से मिलने के लिये देहरादून डी0ए0वी0 स्कूल के छात्रों का एक समूह भी आया. जून 1929 में जब गांधी जी का स्वास्थ्य कुछ खराब चल रहा था तो वे पंडित नेहरू के आग्रह पर स्वास्थ्य लाभ करने अहमदाबाद से कुमांऊ की यात्रा पर निकल पड़े.
जहां उन्होंने स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के साथ-साथ कई सभाओं में अपने विचार व्यक्त किये. 14 जून 1929 की सुबह वे बरेली से हल्द्वानी पहुंचे. हल्द्वानी में एक सभा में भाग लेने के बाद वे नैनीताल पहुंचे. शाम को एक सार्वजनिक सभा में उनके द्वारा पहाड़ की गरीबी, खादी प्रचार व आत्मस्वावलंबन पर अपने विचार दिये गये. अगले दिन उन्होंने महिलाओं की सभा में स्वदेशी सामग्री व चर्खा अपनाने की अपील की और ताकुला गांव में गांधी मंदिर का शिलान्यास किया.
इसी दिन उन्होंने भवाली में एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया और भवाली के नगरवासियों ने उन्हें मानपत्र भेंट किया. नैनीताल प्रवास के दौरान वे गोविन्द लाल साह के आतिथ्य में रहे. 16 जून को वे खैरना होते हुए ताड़ीखेत पंहुचे जहां उन्होंने 1921 के असहयोग आन्दोलन के दौरान खोले गये प्रेम विद्यालय के वार्षिकोत्सव में भाग लिया और एक सार्वजनिक सभा में स्थानीय ग्रामीण जनों को स्वार्थ परायणता व आंचलिक संकीर्णता से उपर उठ कर राष्ट्रीय प्रेम व आत्म विश्वास की भावना ग्रहण करने का संदेश दिया.
18 जून को वे रानीखेत होते हुए वे अल्मोड़ा पंहुचे जहां उन्होंने चैघान पाटा पार्क में एक विषाल जन समूह को सम्बोधित किया. तत्कालीन म्यूनिसिपल बोर्ड के अंग्रेज चेयर मैन ओकले ने उनके सम्मान में हिन्दी में मानपत्र पढ़ा. अगले दिन उन्होंने रामजे कालेज, शुद्ध साहित्य समिति व भारतीय मसीही केन्द्र के साथ-साथ महिला सभा व मल्ली बाजार में आयोजित सभाओं को सम्बोधित किया. 20 जून को लक्ष्मेष्वर में भी गांधी जी की सभा हुई. अगले दिन 21 जून को वे यसोदा माई व अंग्रेज साधु रोनाल्ड निक्सन से भी मिले.
अल्मोड़ा में गांधी जी चार दिन रहे. अल्मोड़ा प्रवास के दौरान गांधी जी की गाड़ी से पदम सिंह नाम का एक स्थानीय ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हो गया था. जिसकी बाद में मृत्यु भी हो गयी थी. इस घटना का गांधी जी को बहुत अफसोस था. 22 जून को अल्मोड़ा से चल कर गांधी जी शाम को कौसानी पंहुचे. और अगले दिन गरूड़ तक मोटर में बैठकर वहां से बागेश्वर तक पैदल यात्रा तय की. बीच -बीच में थक जाने पर वे डांडी में भी बैठे. दोपहर में बागेश्वर पंहुच कर उन्होंने शाम को स्वराज्य मंदिर का शिलान्यास किया और एक सार्वजनिक सभा में अपने विचार दिये. शाम को वे सरयू बगड़ में अपार जन समूह के बीच प्रार्थना सभा में भी शामिल हुए.
अगले दिन बागनाथ मंदिर के दर्शन कर वे कौसानी चले गये. कौसानी में 24 जून सोमवार को उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता के उपर अनासक्ति योग पर लिखी प्रस्तावना का समापन किया. उन्होंने 1 जुलाई तक सप्ताह भर कौसानी में ही रहकर स्वास्थ्य लाभ किया. लेखन, स्वाध्याय के साथ हिमालय दर्शन का आनन्द उठाने के अलावा उन्होंने स्थानीय लोगों से बात-चीत भी की. 2 जुलाई की दोपहर में गांधी जी ने कौसानी से प्रस्थान किया और काशीपुर होकर दिल्ली चले गये.
1929 के सितम्बर में गांधी जी देहरादून व मसूरी की यात्रा पर आये. देहरादून में उन्होंने कन्या गुरूकुल का भ्रमण किया और शहंशाही आश्रम में पीपल का एक पेड़ लगाया. अपनी दूसरी कुमांऊ यात्रा के दौरान वे 18 जून 1931 को वे शिमला से नैनीताल पंहुचे. जहां वे 5 दिन के प्रवास पर रहे और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और विभिन्न स्थानों के जमीदारों से देश की समस्याओं पर बात की. इस दौरान वे गवर्नर सर् मालकम हेली से भी मिले. इस अवधि में वे कई सार्वजनिक सभाओं में भी शामिल हुए.
मई 1946 में वे पुनः मसूरी आये और वहां 8 दिन तक रहे. इस दौरान उन्होंने वहां कई प्रार्थना सभाओं व सार्वजनिक सभाओं में शामिल होकर गरीबों के लिए चन्दा एकत्रित करने का कार्य किया. उत्तराखण्ड की इन यात्राओं में गांधी जी के साथ अलग-अलग स्थानों में कई महत्वपूर्ण व्यक्ति साथ रहे जिनमें माता कस्तूरबा, मीरा बहन, खुर्सीद बहन, नेहरू, आचार्य कृपलानी, देवदास व प्रभुदास गांधी, प्यारे लाल, शान्ति लाल त्रिवेदी, महावीर त्यागी, स्वामी श्रद्धानन्द, आचार्य रामदेव, विक्टर मोहन जोशी, देवकी नन्दन पाण्डे व गोविन्द लाल साह जैसे कई प्रमुख व्यक्ति थे.
चंद्रशेखर तिवारी का यह लेख हिलवाणी से साभार लिया गया है.
चंद्रशेखर तिवारी. पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड ,देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.
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