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बातों व तारीफों से नहीं सुधरेगी स्वास्थ्य सेवा

हम सब सामान्य बात करते हैं. ऊंची बातें करते हैं. आरोप लगाते हैं लेकिन किसी भी मुद्दे की तह तक नहीं जाते. बड़ी विडंबना है. हमने सोच लिया विकास करने के लिए कोई तीसरा व्यक्ति है. वही सब करेगा, जबकि हमारी भी कुछ जिम्मेदारी है. ठीक से विरोध भी नहीं जताते हैं.

उत्तराखंड के नीति-नियंता भी ठीक इसी तरह काम कर रहे हैं. उनका 80 फीसद काम हवा-हवाई है. चाहे किसी भी फील्ड की बात की जाए. उदाहरण के तौर पर स्वास्थ्य को ही ले लिया जाए. आज तक जितने सीएम आये और जो भी स्वास्थ्य मंत्री रहा, उसने क्या कहा और क्या किया, हम सभी के सामने है. हमने हेल्थ हब, हर्बल स्टेट, सभी अस्पतालों में डॉक्टर पहुंचाने के दावे सुने और 18 साल बाद भी यही सुन रहे हैं. क्यों…? क्योंकि हमने भाषण सुना, तालिया बजा दी. बयान मीडिया सुर्खियां बन गईं. आम जन ने न्यूज पढ़ी, कुछ उम्मीद जगी और फिर टाय टाय फिस्स.

सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत की तारीफ करने वाले भी ध्यान दें, जब वह सीएम बने, स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के लिए उन्होंने क्या कहा था, कहा था, एक साल में एक हजार डॉक्टर नियुक्त हो जाएंगे. सरकार बने डेढ़ साल हो गया. 600 डॉक्टरों को भी ठीक से जॉइन नहीं करा सके. पहाड़ों में 200 डेंटिस्ट भेज दिए. ऐसा लगा मानो पहाड़ के सेहत केवल दांत हैं. लेकिन दांत ही निकाल लेते, एक जगह भी डेंटल चेयर नहीं लगाई. ऐसे में ये डेंटिस्ट बिना डेंटल चेयर के दांत कैसे निकलेंगे? बाकी इलाज क्या करेंगे, पढ़े-लिखे लोग समझ जाएंगे. बस, समझने वालों ने नहीं समझा. विस्तार की जरूरत नहीं है.

डॉक्टर भेजने की बात तो कर ली, भाईसाब केवल अस्पताल में डॉक्टर अकेला क्या कर लेगा? ये सोचा हमारी बहुमत वाली सरकार के मुखिया ने. कभी इस पर चर्चा हुई.

जबरदस्ती या फिर कोई डॉक्टर दुर्गम में सेवा देना चाहता है, तो कैसे देगा, जब उसके पास दक्ष तकनीशियन, स्टाफ नर्स, वार्ड बॉय न हो और संसाधन न हों. पैथोलॉजी लैब न हो. दवाईयां न हों. ऑपरेशन थिएटर न हो. ऑपरेशन थियेटर और सर्जन हो लेकिन एनेस्थेटिक न हो. तो क्या कर लेगा डॉक्टर…?

यह सब सोचने की साहब को फुर्सत कहाँ है, फुरसत है भी तो उनके सलाहकार कैसे हैं, जिन्हें यह सब के अलावा कुछ और में ही चकाचैंध नजर आती है.

क्या होता है नेशनल हेल्थ मिशन का. आपको पता तो होगा ही, इस मामले में अपना राज्य उत्तर प्रदेश से किसी मामले में कम नहीं है, लेकिन…?

उदाहरण बहुत लंबा हो रहा है, लेकिन इतनी बातें पर्याप्त नहीं हैं. बहुत कुछ और है. 108 एम्बुलेंस की क्या हालत हो गई है. डीजल डालने के लिए बजट नहीं है. इससे जुड़े कर्मचारी वेतन को तरस गए हैं. क्या है यह सब? नीति-नियंता नीति बनाते समय सोये थे क्या? ऐसी ठोस नीति क्यों नहीं बनी, जिसका लाभ लंबे समय तक मिलता.

आएदिन आप स्थानीय अखबारों में खबर पढ़ते होंगे. प्रसूता ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया है. दुर्घटना में घायल इलाज के लिए रेफर होता रहा और उसकी रास्ते मे ही सांस उखड़ गई. पेट मे दर्द उठा. कई दिन तक झोलाछाप से दवा लेते रहा. जब मर्ज बिगड़ गया, हायर सेंटर पहुंचा, लेकिन उपचार के दौरान चल बसा. पहाड़ में घास काटने गई थी. गिर गई. सिर में चोट लगी. परिजन इलाज के लिए पीएचसी लाए. प्राथमिक उपचार तक ठीक से नहीं मिला. कर्ज लेकर जैसे तैसे सीएचसी, जिला अस्पताल से लेकर हल्द्वानी या देहरादून पहुंचे लेकिन वहां भी न्यूरोसर्जन नहीं मिला. दम तोड़ दिया. क्या ऐसे ही रहेगी हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था…
हकीकत और भी बहुत कुछ…

गणेश जोशी
हल्द्वानी निवासी गणेश जोशी एक समाचार पत्र में वरिष्ठ संवाददाता हैं. गणेश सोशल मीडिया पर अपना ‘सीधा सवाल’ सीरीज में अनेक समसामयिक मुद्दों पर जिम्मेदार अफसरों, नेताओ आदि को कटघरे में खड़ा करते हैं.

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