फ़ोटो: सुनील पन्त
पंथ्यूड़ी में गमरा पूजा
उत्तराखंड में भगवान व प्रकृति को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है. समय-समय पर उनसे संबंधित अनेक पर्व व त्यौहार मनाए जाते हैं. देवभूमि में एक ऐसा अनोखा पर्व मनाया जाता है, जिसे सातों व आठों का पर्व भी कहते हैं. जिसमें इंसान भगवान को भी एक मानवीय रिश्ते (बड़ी दीदी और जीजाजी के रूप में) में बड़ी आस्था व विश्वास के साथ बांध देता है. यह पर्व उत्तराखंड में कई जगहों पर मनाया जाता है लेकिन सीमावर्ती इलाकों में खास कर कुमाऊं के पिथौरागढ़ जनपद में यह बड़े धूमधाम व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.
प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले इस त्यौहार की शुरुआत भाद्रपद मास (अगस्त-सितंबर) की पंचमी तिथि से होती है. इसे बिरूड़ पंचमी भी कहते हैं. इस दिन हर घर में तांबे के एक बर्तन में पांच अनाजों [मक्का, गेहूं, गहत , ग्रूस(गुरुस) व कलों] को भिगोकर मंदिर के समीप रखा जाता है. इन अनाजों को सामान्य भाषा में बिरूड़े या बिरूड़ा भी बोला जाता है. ये अनाज औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं व स्वास्थ्य के लिए भी अति लाभप्रद होते हैं. इस मौसम में इन अनाजों को खाना उत्तम माना जाता है. इसीलिए इस मौके पर इन्हीं अनाजों को प्रसाद के रूप में बांटा एवं खाया जाता है.
दो दिन बाद सप्तमी के दिन शादीशुदा महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं. और दोपहर बाद अपना पूरा श्रृंगार कर धान के हरे भरे खेतों में निकल पड़ती हैं धान के खेतों में एक विशेष प्रकार का पौधा जिसे सौं का पौधा कहते हैं भी उगता है उस पौधे को महिलाएं उखाड़ लेती हैं और साथ में कुछ धान के पौधे भी. इन्हीं पौधों से माता पार्वती की एक आकृति बनाई जाती है. फिर उस आकृति को एक डलिया में थोड़ी सी मिट्टी के बीच में स्थापित कर दिया जाता है उसके बाद उनको नए वस्त्र व आभूषण पहनाए जाते हैं. पौधों से बनी इसी आकृति को गमरा या माता गौरी का नाम दिया जाता है. फिर माता गौरी का श्रृंगार किया जाता है. उसके बाद महिलाएं गमरा सहित डलिया को सिर पर रखकर लोकगीत गाते हुए गांव में वापस आती हैं और माता गौरी को गांव के ही किसी एक व्यक्ति के घर पर पंडित जी द्वारा स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है. फिर पंचमी के दिन भिगोए गए पांचों अनाजों के बर्तन को नौले या धारे (गांव में पानी भरने की एक सामूहिक जगह) में ले जाकर उन अनाजों को पानी से धोया जाता है. फिर इन्हीं बिरूड़ों से माता गौरी की पूजा अर्चना की जाती है. इस अवसर पर शादीशुदा सुहागिन महिलाएं गले व हाथ में पीला धागा (जिसे स्थानीय भाषा में डोर कहते हैं ) बांधती हैं. यह अखंड सुख-सौभाग्य व संतान की लंबी आयु की मंगल कामना के लिए बांधा जाता है.
ऐसा माना जाता है कि माता गौरी भगवान भोलेनाथ से रूठ कर अपने मायके चली आती हैं इसीलिए अगले दिन अष्टमी को भगवान भोलेनाथ माता पार्वती को मनाने उनके मायके चले आते हैं. इसीलिए अगले दिन महिलाएं फिर से सज-धज कर धान के हरे भरे खेतों में पहुंचती हैं और वहां से सौं और धान के कुछ पौधे उखाड़ कर उनको एक पुरुष की आकृति में ढाल दिया जाता है .उन्हें महेश्वर बोला जाता है. फिर महेश्वर को भी एक डलिया में रखकर उनको भी नए वस्त्र आभूषण पहनाए जाते हैं. और उस डलिया को भी सिर पर रखकर नाचते गाते हुए गांव की तरफ लाते हैं और फिर उनको माता पार्वती के समीप ही पंडित जी के मंत्रोच्चार के बाद स्थापित कर दिया जाता है. माता पार्वती व भगवान भोलेनाथ को गमरा दीदी व महेश्वर भिना (जीजाजी) के रूप में पूजा जाता है. साथ ही उनको फल व पकवान भी अर्पित किए जाते हैं. इस अवसर पर घर की बुजुर्ग महिलाएं घर के सभी सदस्यों के सिर पर इन बिरूड़ों को रखकर उनको ढेर सारा आशीर्वाद देती हैं तथा उनकी लंबी आयु व सफल जीवन की मनोकामना करती हुई उनको दुआएं देती हैं.
इसी तरह अगले चार-पांच दिन यूं ही गौरी और महेश्वर की पूजा-अर्चना में व नाचते गाते व हर्षोल्लास के साथ व्यतीत हो जाते हैं . उसके बाद गौरी और महेश्वर को एक स्थानीय मंदिर में बड़े धूमधाम से लोकगीत गाते व ढोल नगाड़े बजाते हुए ले जाया जाता है. जहां पर उनकी पूजा अर्चना के बाद विसर्जित कर दिया जाता है जिस को आम भाषा में सेला या सिला देना भी कहते हैं. यह एक तरीके से बेटी की विदाई का जैसा ही समारोह होता है. जिसमें माता गौरी को मायके से अपने पति के साथ ससुराल को विदा किया जाता है. इस अवसर पर गांव वालों भरे मन व नम आंखों से अपनी बेटी गमरा को जमाई राजा महेश्वर के साथ ससुराल की तरफ विदा कर देते हैं. साथ ही साथ अगले वर्ष फिर से गौरा के अपने मायके आने का इंतजार करते हैं.
फौल फटकना
इस अवसर पर एक अनोखी रस्म भी निभाई जाती है जिसमें एक बड़े से कपड़े के बीचोबीच कुछ बिरूड़े व फल रखे जाते हैं. फिर दो लोग दोनों तरफ से उस कपड़े के कोनों को पकड़कर उस में रखी चीजों को ऊपर की तरफ उछालते हैं. कुंवारी लड़कियां व शादीशुदा महिलाएं अपना आंचल फैलाकर इनको इकट्ठा कर लेती हैं. यह बहुत ही शुभ व मंगलकारी माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि अगर कोई कुंवारी लड़की इनको इकट्ठा कर लेती हैं तो उस लड़की की शादी अगले पर्व से पहले-पहले हो जाती है.
यह एक ऐसा लोक पर्व है जो उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है तथा साथ ही साथ भगवान तथा प्रकृति से इंसान के गहरे रिश्ते के बारे में बताता है. यह पर्व बहुत ही अनोखा व अद्भुत है. बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं व पुरुष इस पर्व को बहुत ही उत्साह, उमंग के साथ मनाते हैं. परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए नए कपड़े लिए जाते हैं तथा इन्हीं कपड़ों को पहनकर इस पर्व का आनंद उठाया जाता है. तरह-तरह के कुमाउनी व्यंजन विशेष रुप से पहाड़ के अनाज से बनने वाले व्यंजनों को बनाया जाता है. साथ ही साथ बिरूड़ों को भी माता गौरी का आशीर्वाद समझ कर पकाकर खाया जाता है व प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है. इस पर्व के समापन के बाद कई जगहों पर हिलजात्रा का भी आयोजन किया जाता है.
सुनील पन्त
रुद्रपुर में रहनेवाले सुनील पन्त रंगकर्म तथा साहित्य की दुनिया से लम्बे समय से जुड़े हुए हैं. हमें भविष्य में इस सक्रिय युवा से बहुत सारे लेखों की प्रतीक्षा है.
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