वर्तमान में हल्द्वानी नगर में बड़े अस्पतालों की संख्या गिनती से बाहर हो गई है. एक से एक काबिल डॉक्टर यहां अपने विशाल हाईटेक क्लीनिक खोल कर बैठ गए हैं. लोग कहते हैं कि जिन बीमारियों के इलाज के लिए पहले दिल्ली-लखनऊ जाना पड़ता था अब यहीं होने लगा है. लेकिन इस तरह की लाइलाज बीमारियां पहले हुआ ही नहीं करती थीं. फिर भी यह अच्छी बात है कि लोगों को अपने ही घर-आंगन में इलाज हो जाने की आशा जागी है. बीमारियां बढ़ गई हैं, इलाज का खर्च बढ़ गया है और एक तबके के पास धन भी बढ़ गया है. अस्पतालों में इलाज कराना कितना खर्चीला हो गया है इस बात पर चर्चा करने के बजाए यह बताना जरूरी है कि उस जमाने में डाक्टर के पास जाने की कोई फीस नहीं होती थी. अब जहां सरकारी अस्पताल में भी पांचच-दस रुपये की पर्ची कटती है और तमाम कई बातों की जांच के लिए फीस नियत है. तब डाक्टर का पेशा जन सेवा से जुड़ा था और मरीज का इलाज ईश्वर की इबादत समझा जाता था. अजवाइन की एक फंकी से अच्छा हो जाने वाला मरीज भी हजार रूपये इलाज में खर्च कर दे रहा है. सौ-डेढ़ सौ रुपया डाक्टर के पास जाने की फीस, ब्लड-यूरिन-स्टूल टेस्ट, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड आदि की फीस और जब इतना सब करवा लिया गया तो दवा भी इतनी लिखनी ही पड़ेगी ताकि उसके खर्चे से मरीज को लगे कि हां उसका इलाज हुआ है. हल्द्वानी में तब डॉ. रामलाल शाह और जी. डी. पांडे के निजी अस्पताल थे. उस समय सीताबर पंत वैद्य व उनका पुत्र उमेश पन्त नया बाजार, गंगासिंह वैद्य पटेल चैक, मधुसूदन लोहनी वैद्य कालाढूंगी चैराहे के पास, डॉ. यमुनादत्त सनवाल नया बाजार, मेहरा जी का अस्पताल, डॉ. किशन सिंह के अलावा दयाल फार्मेसी और भसीन मेडिकल स्टोर था. सरकारी अस्पताल के सामने एक मात्र दवाइयों की दुकान शिवदत्त पन्त जी की थी.पन्त जी ‘आॅलराइट’ नाम से चर्चित थे. वे हर बात पर ऑलराइट कहा करते थे. मूल रूप से ग्राम पाली, गंगोलीहाट के निवासी शिवदत्त पन्त जी भोटिया पड़ाव में पं. गोविन्द बल्लभ पन्त जी के मकान में रहते थे. दयाल फार्मेसी में तेजो निधि पांडे, भवानीगंज कपिल क्लीनिक में जगदीश चन्द्र कांडपाल आदि का इलाज चलता था. डॉ. कुन्दन लाल ने निजी क्षेत्र में पहली बार 1968 में एक्स-रे मशीन लगाई थी. उस समय सरकारी चिकित्सालय में भी एक्स-रे मशीन लगाई थी. उस समय सरकारी चिकित्सालय में भी एक्स-रे मशीन हुआ करती थी लेकिन वह पुराने मॉडल की थी. अमेरिकन मशीनों में कार्य करने का अनुभव डॉ. कुन्दन लाल को था उन्होंने एक वर्ष तक सरकारी अस्पताल में भी आरनेरी कार्य किया. मूलतः अल्मोड़ा निवासी डॉ. कुन्दनलाल के दादा बद्रीदास का अल्मोड़ा में व्यापार था. इनके पिता हीरालाल भी अपने कारोबार को देखते थे. 1964 में डॉ. कुन्दन लाल ने मीरा मार्ग में जिस स्थान पर आज भी उनका क्लीनिक है, अपना कार्य शुरू किया. कानपुर से एमबीबीएसÛ करने वाले बुजुर्ग कुन्दन लाल आज भी शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सकों में गिने जाते हैं. बाद में मंगल पड़ाव में डॉ. खुराना और उनकी पत्नी ने एक क्लीनिक खोला और सरकारी अस्पताल की सेवा छोड़ कर डॉ. पीसी जोशी ने कालाढूंगी रोड पर ‘क्लयाणिका’ नाम से एक अस्पताल खोला. इन में भी व्यावसायिकता से अधिक बीमारों के प्रति सेवा का भाव था.इनके अलावा कुछ इलाज के नाम पर टिंचर-झिंझर बेचने वाले भी हुआ करते थे. सन् 1968 में इसी तरह के एक टिंचरी डाक्टर के टिंचर-झिंझर से 21 तथा कुछ ही दिन बाद 8 लोगों की मौत हो गई. यहां यह बताना प्रासंगिक तो नहीं होगा, किन्तु हल्द्वानी से मादक पदार्थों की तस्करी के परिणामस्वरूप हुए एक बड़े हादसे का जिक्र किया जाना अनुचित भी नहीं होगा. घटना 10 जनवरी 1988 की है जब हल्द्वानी से 40 यात्रियों को ले जा रही बस खैरना के पास आग लगने से जल कर खाक हो गई और उस पर सवार चीखते-चिल्लाते सभी यात्री जल कर कोयला हो गए. इस तरह आग लगने का कारण बस में अवैध रूप से ले जाया जा रहा मादक पदार्थ था, जो एकदम आग पकड़ गया.
स्टेशन रोड पर डॉ. रामलाल शाह और रेलवे बाजार में डॉ. जीडी पांडे की गिनती उन दिनों योग्य चिकित्सकों में हुआ करती थी. जीडी पांडे एक अनुशासित चिकित्सक थे. उनके बैठने का समय प्रातः सांय नियत था. मरीज को देखने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता था. दवा की कीमत भी आम आदमी के पहुंच की होती थी. डॉ. पांडे मूल रूप से पांडेगांव भीमताल के रहने वाले थे. उन्होंने 1969 से अपनी सेवायें प्रारम्भ कीं. वे आईएमए हल्द्वानी शाखा के संस्थापक प्रेसिडेंट रहे जिसकी स्थापना 1964 में हुई थी. उनके पुत्र डॉ. बीसी पांडे आज भी उनकी परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं. डाक्टर पांडे ने लोगों को हल्द्वानी रहने का साहस दिलाया. तब मलेरिया, डायरिया जैसी बीमारियों के कारण लोग भाबर में बसने से डरते थे. डॉ.. जीडी पाण्डे ने लोगों को भरोसा दिलाया कि वह रोग नहीं फैलने देंगे. उन्हें ‘भाबर की लाइफ लाइन’ कहा जाता था. आज उन्हें लोग भूल गए हैं. यहां अस्पतालों के नाम राजनेताओं के नाम पर रखे जाने लगे हैं, मूर्तियां राजनेताओं की लगाई जा रही हैं, सड़कों के नाम भी राजनेताओं के हिस्से आ रहे हैं लेकिन ‘लाइफ लाइन’ कहे जाने वाले व्यक्ति को कोई याद नहीं करता है. डॉ. पाण्डे बम्बई (मुम्बई) से एमबीबीएस की डिग्री लेकर यहां आये थे. थर्मामीटर पहले वही लेकर आये थे. प्रारम्भ में नया बाजार में इनका क्लीनिक चला करता था. डाक्टरी पेशे के नाम पर उन्होंने हमेशा ईमानदारी रखी.
डॉ. रामलाल शाह चिकित्सा के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में भी उसी उत्साह से भागीदारी करते थे. गांव से कोई व्यक्ति आता और उन्हें बताता कि मरीज यहां लाने की स्थिति में नहीं है (वैसे भी उन दिनों आवागमन के साधन नहीं के बराबर थे, गांवों तक अच्छी सड़कें भी नहीं थीं) तो डाक्टर साहब जाड़ा हो, गर्मी हो गया बरसात अपनी साइकिल निकालते और उस आदमी को कैरियर पर बैठाकर मरीज के पास पहुंच जाते. उसे आत्मीयता से देखते, घर के हालचाल पूछते और यदि आर्थिक रूप से कमजोर होता तो दवा भी मुफ्त में दे देते. मैं उन दिनों तिकोनिया स्थित मनोहर पेट्रोल पम्प से लगे वन विभाग के क्वार्टर में रहता था और बहुत बीमार था. मैंने खिड़की से देखा कि डॉ. राम लाल साह एक पोस्टकार्ड हाथ में लिए किसी को तलाश रहे हैं. मैं बाहर आया तो पता चला कि वे मुझे ही तलाश रहे थे. ‘अरे तुम तो मेरे पास इलाज के आ रहे हो ना, पहाड़ से यह पत्र आया है कि मैं तुम्हें देखूं. सुदूर पहाड़ से एक पोस्टकार्ड डाक्टर साहब के पास मेरा स्वास्थ्य देखने के लिए आता है और वे पहाड़ के एक गरीब और अपरिचित छात्र को देखने चल पड़ते हैं मैं तो उनके इस व्यवहार से ही स्वस्थ हो गया. उसके बाद जब भी मेरा स्वास्थ्य खराब होता, मुफ्त में इलाज होता रहता. ऐसे थे डाक्टर रामलाल साह डॉ. साह का जन्म 1910॰ में हुआ था. मूल रूप से नैनीताल निवासी डॉ. रामलाल साह के पिता 1810॰ में हल्द्वानी में बस गए. उस समय के बिरले एमबीबीएस डाक्टरों में रामलाल साह एक थे. 1965 में भवाली स्थित सेनीटोरियम में तैनात रहे. बेतालघाट में भी जन सहयोग से उन्होंने एक अस्पताल का निर्माण करवाया. केजीएमसी लखनऊ के सेंचुरी फाउंडेशन इयर वर्ष 2005 में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने उन्हें सम्मानित किया. वे आयुर्वेद के भी अच्छे ज्ञाता थे. ऐलोपैथी व आयुर्वेद के समन्वय से बीमारी का निदान करते थे. उन्होंने एक्यूपंक्चर पर आधारित ‘सुश्रुत एण्ड ह्वांग टी नी चिंग’ पुस्तक भी लिखी वे बताते थे कि हमारी अल्पनाओं में वे मूर्तियों में कुछ ऐसे बिन्दुओं को प्राचीन समय के मनीषियों ने अंकित करने का प्रयास किया था ताकि आम आदमी उन बिन्दुओं को आसानी से पहचान सके.लेकिन इसे कालान्तर में भुला दिया गया. 24 अक्टूबर 2008 को उनका निधन हो गया.
(जारी)
स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी- स्मृतियों के झरोखे से’ के आधार पर
पिछली कड़ी का लिंक: हल्द्वानी के इतिहास के विस्मृत पन्ने : 44
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