साधो हम बासी उस देस के – 4
-ब्रजभूषण पाण्डेय
पिछली कड़ी : यह क्रांतिकारी दिन था
मेला बीत चुका था. परेवा झमटहवा पीपर की ओर, किसान गेहूँ बुआई के लिए सिवान की और और हम मस्ती भरी अनियमित जीवन शैली से रूटीन लाइफ़ की ओर लौट रहे थे. अर्थात दस बजे से साढ़े तीन बजे तक चलने वाली कक्षाओं की ओर.
वैसे पाठ्यक्रम का ड्यूरेशन जनवरी से दिसंबर का ही था लेकिन प्रैक्टिकली कक्षाएं फरवरी से पहले प्रारम्भ नहीं हो पातीं क्योंकि मेले से पहले न मास्टर पढ़ाने को तैयार होते न विद्यार्थी पढ़ने को.
‘लंबीं छुट्टीं कें कारंन आंप लोंगों कीं दिनचर्यां में व्यतिंक्रम आं गयां हैं. ‘
जटाशंकर मास्टर अनुस्वार के अनावश्यक प्रयोग से ग्रस्त अपनी नुनुआई आवाज़ में कक्षा का प्रारंभ करते.
गाँव का हाईस्कूल पूरे जवार का इकलौता हाइस्कूल था. आस पास के दर्ज़नो गाँव के लड़के लड़कियां कीचड़ में लिथड़े पैर लिए पायजामे का पहुंचा चढ़ाये घिसटते आते.
डाकढर, इंजीनियर बनने के दिवास्वप्न बुनने का यही एकमात्र स्थान था. बाकी मोटरसाइकिल-कार रिपेयर करने की नौकरी से लेकर शाम को अंडा आमलेट बनाने के स्वरोज़गार का यथार्थ तो प्रतीक्षा में था ही.
लेकिन हमेशा ऐसा रहा हो ऐसा भी नहीं था. एक समय ये पढ़ाई के लिहाज़ से बेहद उम्दा स्कूल था और इसका श्रेय बहुत हद तक यहाँ के गौरवशाली प्रिन्सिपल रामलखन तिवारी गुरूजी को जाता. अगर इस विद्यालय के इतिहास लेखन की कोई परंपरा होती तो उनका नाम युगप्रवर्तक प्रिंसिपलों में शुमार होता.
माहौल इतना अच्छा उन्होंने बना रखा था कि वहाँ का चपरासी तपस्वी महतो भी डिक्शनरी लेकर बच्चों को डिस्टर्ब किया करता. ‘बताओ तो बबुआ बार्क का दूसरा मतलब क्या होता है? खाली भौंकना जानोगे तो कुकुरे रह जाओगे. बार्क माने पेड़ की छाल, राइंड ऑव ट्री. ‘
पढ़ने वाले बुरा ना मानते बल्कि और लगे रहते.
‘ए तपसी ई गुलमोहर के बगलियां वाला कउन पेड़ हौ?’
‘ई है बबुआ शिरीष. इसका तना देख रहे हो भूरे रंग का है. बहुते काम का है. खुजली,दमा,दांत रोग सबके लिए अच्छा होता है. ‘ विकिपीडिया हरहराने लगता.
तपसी चालीस शरद से ज़्यादा तो विद्यालय की सेवा में ही देख चुके थे. रिटायर होने के बाद भी जने कौन मोह था जो उन्हें यहाँ से चिपटाए हुए था.
शायद जतन से उनके द्वारा रोपे गए अमलतास शीशम साल गुलमोहर सागौन जामुन कनेर और सहिजन के छौने बिरवे जो अब जवान हो गए थे. अब उनकी छतनार बाँहें आकाश की ओर उठ गयी थीं और मौसम की खुश्कियों में उनके पत्ते झरा करते. वही उनका रास्ता रोक खड़े हो जाते होंगे. नहीं तो कौन अपनी प्रौढ़ा बीबी और दो जवान होते बेटों को छोड़ बुढ़ौती में यहाँ इस दर देहात में खट रहा होता.
रामलखन गुरूजी ने पढ़ने लिखने के अलावा खेल कूद और नाटक खेलने की भी अच्छी परंपरा का विकास किया था. स्कूल की टीम ज़िला स्तर पर फ़ुटबॉल खेलने जाती. बैक और सेंटर फारवर्ड के यहाँ के प्लेयर दूसरी टीमों में भी डिमांड में रहते.
अलग अलग मौक़ों पर कोणार्क नेत्रदान और ध्रुवस्वामिनी का सफल मंचन किया गया था. अच्छे अभिनेता भी थे और बुलाकी फाड़ कर रोने वाले सेंटी दर्शक वर्ग भी था.
लेकिन इन सबसे बढ़ कर जो परंपरा उस विद्यालय नाम्ना स्थल पर चली आ रही थी वो थी ग्रामीण समाज और सरकारी संस्थान का परस्पर सहयोग. वसंत पंचमी की पूजा में स्कूल पूरे जवार को निमंत्रण भेजता. लोग आते और परसाद पा कर फाग गायन से वसंत की शुरूआत करते.
इसी तरह किसी क़िसम की लफुअई ना हो और माहटर टैम पर आएँ इसकी ज़िम्मेदारी गाँव के लोग बिन बोले ही उठाये फिरते. चार छ: लोग तो आए दिन कलफदार कुर्ता धोती पहने स्कूल पर गिरे रहते और मास्टरों के साथ बतकूचन करते रहते.
लेकिन ये गुज़िश्ता दिनों की बातें हैं. माहौल जो है बिल्कुले तो नईं बदला था लेकिन थोड़ा थोड़ा चेंज ज़रूर होने लग ग्या था.
नई सरकार ने किरिया खा रखी थी कि शिक्षा शब्द और शैक्षणिक भावना का इस्तेमाल किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं किया जाना चाहिए. दुर्भाग्य से स्कूल कॉलेज भी सार्वजनिक स्थल की परिभाषा में आ जाते. सो यहाँ भी खटिया खड़ी अंटिया गोल यानि के बंटाधार करने की पूरी तैयारी चल रही थी.
इस तैयारी के मद्देनज़र सरकार ने पहला काम जो किया वो था शिक्षक भर्ती जैसे अनावश्यक काम पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाना.
इसलिए हम पढ़ने के नाम पर एक अनूठे सर्कस के भालू बंदर बना दिए गए थे. जैसे बायोलाजी को गणित के मास्टर पढ़ाते, अंग्रेज़ी रिटायर के क़रीब पहुँचे किरानी (क्लर्क) बाबू. इतिहास भूगोल चूँकि कला विषय थे तो उनमें कोइ अंतर मानने की ज़रूरत तो थी नहीं. सो दोनों सब्जेक्ट एक ही मास्टर के हवाले थे. लेकिन बेहद सौभाग्य से वो मास्टर साहब लैब असिस्टेंट के तौर पर रिक्रूट थे.
और भैया हर हिंदुस्तानी की रगों में रक्त से ज़्यादा तो हिंदी दौड़ती है. यह मान कर हिंदी पढ़ाने का ज़िम्मा पी टी मास्टर को दे दिया गया था. और इस तरह हमारे भविष्य को बेहद उज्जवल बनाने के सारे इंतेजामात शिद्दत से जुटा लिए गए थे. आसमान ख़ाली था बस हमें शाहीन बन परवाज़ कर जाना था.
दस बजने में पांचेक मिन्ट कम थे. लाल खड़ंजे वाली पतली सड़क पर झुण्ड के झुण्ड चले आ रहे थे. रंग बिरंगे सूट सलवार में लहकती लड़कियां. बांह के पास फटने फटने को हो आई कमीज़, रद्दी जीन्स पहने और गले में अंगोछा लपेटे खुद को रंगबाज मानते लड़के.
कनेर के पेड़ के नीचे डली लकड़ी के हत्थो वाली कुर्सियों पर चाय सुड़कते मास्टर पसरे थे और बिना किसी फाटक के सांकेतिक प्रवेश द्वार पर लकड़ी का काला रूल फटकारते नए हेडमास्टर मथुरा प्रसाद गरज रहे थे.
‘देखते हैं कौन स्साला आज प्रेयर के बाद आता है. टंगहर तोड़ के हाथे में दे दूंगा. ‘
‘ए राधा बाबु. आज हेडमाट साब को काहे तीतिखी लगा है भाई?’
संस्कृत पढाने वाले त्रिभुवन मास्टर ने इतिहास के राधा मास्टर को आँख मारी.
‘इकोनॉमिक्स पढ़े हो? ई है कैस्केडिंग इफ़ेक्ट. बुझे?’
त्रिभुवन मास्टर बकलोल की तरह ताकते रहे जिससे साफ़ पता चलता था कि वो प्रयास तो मार रहे हैं लेकिन
बुझे ऊझे कुछ घंटा नहीं है. राधा बाबु कुछ देर तक उनकी इस अज्ञानात्मक अवस्था का मज़ा लेते रहे.
‘तुम रह गए मास्टर गबदागबोल. कुछ दीन दुनिया की खबर है कि नहीं? आजकल हेडमाट साब हैं बभनान के गोल में. ‘
‘तो? का हुआ?’ त्रिभुवन अब भी नही समझे.
‘अरे मेला का इनका राजनीति नहीं जानते हो क्या? नीलामी कराये इक्यावन हजार में ताकि नथुनी सिंह बाहर हो जाएं और अड़तीस हजार धनेस के हाथ लौटा दिए बब्बन चौबे को. ‘
‘लेकिन कैस्केडिंग माने क्या होता है? और ये खुद तो पौने ग्यारह से पहले मूनईया के पान दुकान से हिलते नहीं. आज काहे रंडीरोवन मचा रहे हैं?’
‘अरे तुम कैस्केडिंग को मारो गोली यार. तुम्हारे पल्ले नही पड़ने वाला. ये समझो इनके एथी में गया है बांस. वो भी बिना छीला हुआ. ‘
‘पूरी बात बताओ यार. अधिया पर ढेला ना ढोते रहो.’ त्रिभुवन मास्टर व्यग्र होने लगे.
‘अरे अहीर टोली के लोग तो पहिले से गरम हैं ही. कल ई ग्यारह बजे छठे पान की पचासवीं पीक थूक कर ज्ञान पेल रहे थे की अगर अंडा माँसाहारी है तो दूध शाकाहारी कैसे. तभी इस्वर सिंह सरपंच ने बोला – माट साब ई ग्यान के ज़रूरत मुनाई से ज्यादा विद्यार्थिन को है. टैट हो जाइए नाही तो अगली कमेटी की बैठक में माहटरई घुसा देंगे नाड़े में. ‘
गाँव में वैसे तो छोटी बड़ी पच्चीस जातियां थीं लेकिन सबसे ज्यादा आबादी ब्राह्मनो और यादवों की थी. वैसे डोमिनेट तो पहले से ब्राह्मण ही करते आये थे लेकिन साठ सत्तर के दशक के लैंड सेटलमेंट से जिन नव- प्रभुत्वशाली जातियों का उदय हुआ था यादव उनमें शीर्ष पर थे. सो गाँव में शक्ति संतुलन की होड़ भी इन्ही दोनों में चला करती. बाकी कोइरी कहार लोहार धानुक गड़ेरी पासवान हरिजन अपनी अपनी सुविधा और ज़रूरत से या तो बभनान या अहिरान गोल में शामिल होते रहते थे.
स्कुल गाँव की इंसेपेरेबल ईकाई ही था. सो वह गांव की राजनीति में टूल की तरह प्रयोग किया जाता और गाँव की टुच्चई भरी कूटनीति स्कुल के मामलों में पर्याप्त दखल देती. नए प्रिन्सिपल साहब रामलखन तिवारी जैसे दबंग नहीं थे. उनका व्यक्तित्व लिजलिजा और जल्दी दबाव प्रभाव में आ जाने वाला था.
इसी दांव पेंच की बाबत राधा बाबु त्रिभुवन मास्टर को धाराप्रवाह कमेंट्री दे रहे थे. लेकिन जब कुछ देर बाद उन्होंने त्रिभुवन की तरफ से कोई उत्साही रेस्पॉन्स आता नहीं देखा तो उनका ध्यान संस्कृत मास्टर की तरफ गया.
त्रिभुवन अपनी लाल कलम की नोक से अखबार के पिछले पेज पर छपी अर्धनग्न बॉलीवुड अभिनेत्री की मांग को रंग रहे थे. वे रसिया शिरोमणि प्रसिद्ध थे. वैसे भी साहित्य के जानकार को रसिक होना ही चाहिए. सो नारी देह की कल्पना मात्र से त्रिभुवन मास्टर की देह के अलग अलग ठीहों में ऋतुसंहार और कुमारसंभव की पंक्तियां साकार होने लगतीं.
‘तें ना सुधरबे.’ राधा बाबू मुस्कुराये और इशारा किया कि हैडमास्टर साहब लेटकमर्स को अपने तेल पिलाये रूल से रुलिफाइड कर इधर ही आ रहे हैं.
त्रिभुवन ने वो रंगीन हरकत हाथ में पकडे रजिस्टर के बीच दाब लिया और दोनों सतर्क हो कर रोयां गिराये कुर्सी में ही अधबैठे से हो गए.
(जारी)
बनारस से लगे बिहार के कैमूर जिले के एक छोटे से गाँव बसही में जन्मे ब्रजभूषण पाण्डेय ने दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्चशिक्षा हासिल करने के उपरान्त वर्ष 2016 में भारतीय सिविल सेवा जॉइन की. सम्प्रति नागपुर में रहते हैं और आयकर विभाग में सेवारत हैं. हिन्दी भाषा के शास्त्रीय और देसज, दोनों मुहावरों को बरतने में समान दक्षता रखने वाले ब्रजभूषण की किस्सागोई और लोकगीतों में गहरी दिलचस्पी है.
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