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विश्व रेडियो दिवस पर कुमाऊं के पहले सामुदायिक रेडियो की कहानी

कुमाऊं का पहला सामुदायिक रेडियो ‘कुमाऊं वाणी’ आज वर्ल्ड रेडियो डे के मौके पर 9 साल 11 माह 2 दिन का हो चुका है और अपनी पहचान के जरिये आज दूरस्थ ग्रामीण अंचल तक अपनी पैठ बना चुका है. कुमाऊं की कोयल का दर्जा भी श्रोताओं द्वारा रेडियो को दिया जा चुका है. आपको बतातें चलें की वर्तमान में कुमाऊनी बोली बोलने वालों का ग्राफ तेजी से घटा है. (First Community Radio Kumaon)

भारत मे कई क्षेत्रीय बोलियाँ लुप्त होने के कगार मे हैं, ऐसे में उन बोलियों को बचाने के लिए व उन्हें भाषा का दर्जा दिए जाने के लिए आंदोलन होते रहते हैं. इसके बावजूद मुक्तेश्वर के समीप सूपी गांव स्थित इस सामुदायिक रेडियो ने अपनी संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखने के लिए भरसक प्रयास किया है.  इस रेडियो स्टेशन ने कुमाऊनी भाषा को एक नयी दिशा दी है. रेडियो के सारे कार्यक्रम कुमाऊनी में तैयार किये जाते हैं. रेडियो जॉकी भी कुमाउनी बोली का ही प्रयोग करते हैं.

टेरी संस्था (ऊर्जा संसाधन संस्थान) द्वारा स्थापित सामुदायिक रेडियो कुमाऊं वाणी का उदघाटन 11 मार्च 2010 को तत्कालीन राज्यपाल मार्गरेट अल्वा ने किया था. आज यह रेडियो 9 साल 11 महीने 2 दिन का सफर पूरा कर चुका है. रेडियो का उद्देश्य सूचना और जानकारी की मदद से कुमाऊं के पहाड़ी समुदाय को विकास के पथ पर अग्रसर करना है.

देश के जाने माने पर्यावरणविद् डॉ आर. के. पचौरी इस रेडियो के निदेशक रह चुके हैं. स्थानीय युवा इस रेडियो के पालनहार बने हुए हैं, कहने का मतलब रेडियो की सारी जिम्मेदारी स्थानीय युवाओ के कंधे पर है. कई युवा रेडियो से जुड़े हैं. गांव-गांव जाकर लोगों से मिलकर कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं. इन कार्यक्रमों की फेरहिस्त भी काफी लंबी चौड़ी है, जिसमें बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्गों महिलाओं को मद्देनजर रखते हुए कार्यक्रम बनाये जाते हैं. कुमाऊं वाणी रेडियो की पहुँच तकरीबन 500 गांवों में है, जिसमें पिथौरागढ़, चमोली, बागेश्वर, रानीखेत, अल्मोड़ा के सीमांत गांव दर्ज़ हैं.  

रेडियो प्रबंधक मोहन कार्की बताते हैं कि ‘जल, जंगल, जमीन को लेकर जागरूकता, कुमाऊं की रवायत और यहाँ की संस्कृति को आगे बढ़ाना, सरकारी संस्थाओं तक लोगों की समस्याओं को पहुचाना, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान पर कार्यक्रम बनाना फिलहाल रेडियो का उद्देश्य है.’  ‘हमारे पास कुछ चुने हुए रिपोर्टर हैं जो आस-पास के गांवों से ही हैं और कड़ी मेहनत कर कार्यक्रम तैयार करते हैं. साथ ही कई छुपी हुई प्रतिभाओं को भी रेडियो के माध्यम से सामने लाने का कार्य भी किया जा रहा है.’ ‘रेडियो के श्रोता टेलीफोन, एसएमएस, फेसबुक, पत्र आदि के माध्यम से अपनी बात हम तक पहुंचाते हैं, जिससे कार्यक्रम तैयार करने में आसानी होती है. इससे लोकप्रिय कार्यक्रम तैयार करना भी आसान हो जाता है.’

फिलहाल आपको बता दें की इतने कम समय मे रेडियो को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2014 में – छोटे एवं सीमान्त किसानों के लिए चलने वाले कार्यक्रम ‘बाजार लाये बौछार’ को सामुदायिक सहभागिता के लिए – नेशनल अवार्ड से नवाजा गया.

वर्ष 2013 मे जन सहभागिता को आधार बनाकर कुमाऊं की बेहतरी के विकास कार्यक्रमों में मजबूती प्रदान हेतु डेवलपमेंट एम्पावरमेंट फाउंडेशन की ओर से मंथन अवार्ड भी प्राप्त हो चुका है. रेडियो के धारावाहिक कार्यक्रम ‘बाजार लाये बौछार,’ ‘सौंधी खुश्बू,’ ‘हम और हमारी पंचायत,’ ‘अजब खेल गजब गणित’ जैसे कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुए हैं.

कुमाऊं वाणी को एफएम 90.4 मेगाहर्ट्ज़ पर सुना जा सकता है. कुमाऊं वाणी का अपना एक स्लोगन है ‘आपुण रेडियो आपुण बात’ और इसी को चरितार्थ करते हुए रेडियो आज युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं का सुख-दुःख का साथी बना हुआ है.

अद्भुत है नैनीताल के दीवान सिंह बिष्ट के हाथ से बने क्रीम रोल का स्वाद

सूपी स्थित महिला बुजुर्ग देवकी बिष्ट की माने तो उनका तो दिन का कार्य बिना रेडियो के सुने सुचारू ही नहीं होता. वे रेडियो सुनने के साथ विलुप्त होती कुमाऊनी संस्कृति से सम्बंधित कार्यक्रम भी तैयार करती हैं और रेडियो में रिकॉर्डिंग भी. ऐसे ही कई अन्य लोग भी देवकी बिष्ट की तरह उम्र के इस पड़ाव मे आकर कहीं न कहीं अपनी जीवनशैली को रेडियो मे जीवंत कर रहे हैं. एक अन्य महिला हैं जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया की रेडियो के माध्यम से ही उनकी शादी हुई और आज वे सुखद वैवाहिक जीवन बीता रही हैं. खैर, यह रेडियो आज कुमाऊनी बोली को तो बचाने का कार्य कर ही रहा है साथ ही कई बेरोजगार युवाओं का साथी भी बना है.

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हल्द्वानी में रहने वाले भूपेश कन्नौजिया बेहतरीन फोटोग्राफर और तेजतर्रार पत्रकार के तौर पर जाने जाते हैं.

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Sudhir Kumar

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