फोटो http://claudearpi.blogspot.com से साभार
तिब्बत का पहला भौगोलिक अन्वेषण करने वाले उन्नीसवीं शताब्दी के महानतम अन्वेषकों में से एक माने जाने वाले मुनस्यारी की जोहार घाटी के मिलम गाँव के निवासी पंडित नैनसिंह रावत के बारे में लेख काफल ट्री पर पहले प्रकाशित हो चुके हैं. आज पढ़िए नैनसिंह रावत के शुरुआती जीवन के संघर्ष विषय में- संपादक.
धामा बूढ़ा की तीन शादी थीं. अलग-अलग तीन घरों में रहती थीं. तमाम, मीरास व विरसियत तीनों हिस्सों में बंटा था- अव्वल शादी मंगुली बुड़ी के जसपाल, दोलपा, सुरजू के तीन भाई एक तिहाई के मालिक थे, दूसरी शादी टुलानी बुड़ी की कुकरिया, विरसिंह ये दो भाई एक तिहाई के हिस्सेदार समझे गये, तीसरी शादी मार्छी धारमी बुड़ी के फतेसिंह, देबू, झेमु, लाटा, नागू पांच लड़के एक तिहाई मिरास के हकदार थे. पांचों भाई एक साथ रहते थे मेरा बाप लाटा बूढ़ा सन 1795 ईस्वी में पैदा हुआ था. करीब 24 या 25 वरस की उमर में एक ऐसी चूक हुई कि केसरसिंह नितवाल धाड़ा नीतीवाले की बहन शादी घर में मौजूद थी. तिस पर भी भादू थेपू वगैरह चौभये विलज्वालों की बहन लखमा जो मिलम के सयाने राठ की व्याही थी उठाकर अपने घर लाया. जिसे फतेसिंह, देबू वगैरह भाई नाराज होकर लाटा बूढ़ा को विला हिस्सा अलग कर दिया. जो कुछ मिरास पांच भाईयों का हक था कुल चार हिस्सा कर बांट लिया.
मेरा बाप लाटा बूढ़ा अपनी दो शादियों समेत गोरी पार भटकूड़ा में रहता था. सन 1824 ईस्वी में अपने बाप की माल मीरास का पांचवा हिस्सा दिला पाने बाबत जनाब जार्ज विलयम त्रियल साहब बहादर की अदालत में नालिश की तो मुकदमा डिसमिस हो गया. बाद उदासी के साथ घर आया तो थोड़े दिन बाद विलज्वाली और नितवाली दोनों औरतें गोरी नदी में डूब कर मर गई. (इतिहास रावत कौम का पहला हिस्सा – पंडित नैनसिंह रावत की डायरी)
सन 1824 ईस्वी में बाप की उम्र 29 वरस की थी मिरास के हार जाने और औरतों के डूब मरने से परेशान था. गोरी पार जमीदारों में रहकर दिन काटता. किसी गांव वालों के आपस में तकरार होता तो पंचायत की रु से उनका झगड़ा निवेड़ देता. जमीदारों से कुछ खेती भी करवाता. इसी तरह गुजारा करता.
सन 1825 ईस्वी में बाप ने मेरी मां यशुली से शादी की जो परगनह असकोट के जुंमा गांव के लाटा राणा जुमाल रजपूत की बेटी थी. सन 1826 ईस्वी में मुझसे बड़ा भाई समजांग पैदा हुआ और तारीख 21 अक्टूबर सन 1830 ईस्वी के रोज मुताविक सम्वत 1887 के कार्तिक छः गते बुधवार के दिन मैं पैदा हुआ. सन 1833 ईस्वी में एक बहन जनी जो चरखमिया पंछू जंगपांगी को गई. सन 1836 ईस्वी में एक भाई पैदा हुआ जिसको मागा नाम रखा गया.
सन 1838 के मई महीने में मेरी मां परलोक को सिधारी. हम चार पांच लड़के अनाथ हो गये. हमारी परवरिश के लिये मेरे पिता को फिर एक शादी करनी पड़ी. सन 1839 ईस्वी में थोला धपवाल की बेटी पदिमा से शादी को सन 1839 ईस्वी में सौतेली मां से गजराज सिंह पैदा हुआ. सन 1841 ईस्वी में कलियाना सिंह जनमा. (पंडित नैनसिंह रावत : घुमन्तू चरवाहे से महापंडित तक)
गरज मेरा बाप 25 बरस तक गोरीपार मौजा भटकुड़ा में रहा. सन 1847 ईस्वी में गोरीपार छोड़कर मिलम में आये. सन 1848 ईस्वी में मर गया. बाप के मर जाने पर तयेरा भाई बड़ा माणी बूढ़ा ने चाहा कि लाटा बूढ़ा केर हिस्से का माल व मताह जो कुछ लाटा बूढ़ा हार गया था उसके लड़कों को दी जावे पर और तयेरे चचेरे भाइयों की नियत देने की न हुई. लाचार बड़ा माणी बूढ़ा ने सिर्फ अपनी तर्फ से कुछ रुपये और भेड़ बकरे दिये लेकिन हमारी परेशानी का हाल को देखकर हमारे ऊपर नजर परवरिश की रखता रहा कभी दो पूंजी देकर व्यापार में भी नफ़ा दिलाता.
उस वक्त बड़ा भाई समजांग का उमर 23 वरस का था और मेरी उम्र 18 वरस की थी. कमाई तो कुछ थी नहीं सिर्फ उधार लेकर पेट भर लेने का काम था. मैं बड़े भाई से भी निर्वुद्धि था. एक रोज मेरी सौतेली मां ने मुझे कुछ काम के लिये आज्ञा दी. मैंने उनका कहा तो न माना बल्कि नाराज होकर सन 1851 ईस्वी के जुलाई महिने में मिलम से निकला मुनस्यारी दानपूर वधाण और हुमली वलान और इरानी पाना होता हुआ जोशीमठ के रस्ते से बदरीनाथ जा पहुंचा.
पहाड़ के सोलहवें-सत्रहवें अंक से साभार.
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