उत्तराखण्ड (Uttarakhand) में कई ऐसी जातियां हैं जो राजस्थान के मिरासियों की तरह ही पेशेवर रूप से गायन-वादन का ही काम किया करती थीं. इन सभी जातियों को इनके गोत्र, गन्धर्व, नाम से भी जाना जाता है. इस जाति को हिमालय के गन्धर्व (Himalayan Gandharv) भी कहा जाता है.उत्तराखण्ड के संस्कृतिक संरक्षण में इन जातियों का अपना विशिष्ट योगदान है. इन्हीं में से एक है बादी जाति. यह मुख्यतः उत्तराखण्ड के गढ़वाल (Gadhwal) मंडल में रहने वाली पेशेवर गायन-वादन करने वाली जाति है. इन्हें बदिद या बेड़ा के नामों से भी जाना जाता है.
ये जाति खुद को भगवान शिव का वंशज मानती है. इन्हें हिमालय के गन्धर्व भी कहा जाता है. इसलिए ये लोग अपने सिर पर शंकर की तरह की जटाएं रखते हैं और इन्हें सिर के ऊपरी हिस्से पर जूड़े में बांधते हैं. इनका मानना है कि संगीत की शिक्षा इन्हें स्वयं भगवान महादेव ने दी थी. उन्ही के आदेश पर यह वे लोक में सामवेद की इस विधा का प्रचार करते हैं. इसी वजह से इस क्षेत्र के कृषि से जुड़े अनुष्ठानों के अवसर पर बादियों और बादिनों की शिव-पार्वती के रूप में आरती-पूजा भी की जाती है.
ये लोग कृषि, पशुपालन और अन्य तरह के व्यवसाय नहीं करते. इनका व्यवसाय ही लोकगीतों, लोकनाट्यों, नृत्यों आदि के द्वारा लोगों का मनोरंजन करना और लोककल्याण के लिए ‘लांग’ तथा बेड़ावर्त जैसे साहसिक अनुष्ठानिक कृत्यों के संपादन में अपने जीवन को भी जोखिम में डाल देना. ये लोग जन्मजात और अनुवांशिक रूप से गीत और कविता की सहज प्रतिभा से लैस होते हैं. इनमें लोक के सामाजिक एवं ऐतिहासिक घटनाक्रमों को गीत-संगीत में पिरो देने की अद्भुत प्रतिभा हुआ करती है. ये प्रतिभाशाली आशुकवि समाज के अच्छे-बुरे सामाजिक घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखते हैं और ढोलक की थाप और घुंघरुओं की झंकार में इनका रोचक प्रस्तुतीकरण कर देते हैं.
बादीनें नृत्यकला में प्रवीण होती हैं. त्यौहार, उत्सवों से लेकर शादी-ब्याह के मौके पर ये अपने नृत्य से उल्लास का वातावरण बना देती हैं. ये सौन्दर्य की धनी कलाप्रेमी हुआ करती हैं. संगीत इनका व्यवसाय ही नहीं जीवन है, जीवन का सारतत्व है.
इस क्षेत्र के लांग एवं बेड़ावर्त जैसे अनुष्ठानों में देखा जा सकता है कि क्षेत्र विशेष की कृषि की रक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं के कन्धों पर हुआ करती थी. इनके अपने क्षेत्र बंटे हुआ करते थे और अपने क्षेत्र के हिसे की कृषि की रक्षा के लिए बादी अपनी जान भी दांव पर लगा देता है.
गढ़वाल के क्षेत्रों में इनकी वृत्ति बनी होती थी और ये अपनी-अपनी वृत्तियों में घूमा करते थे. इनके खुद के स्थायी निवास भी नहीं हुआ करते थे. फसल पैदा होने पर इन्हें इनका हिस्सा दे दिया जाता था. इस हिस्से को डडवार कहा जाता था. राजाओं-महाराजाओं के दौर में ये जातियां सामंतों का मनोरंजन किया करती थी.
थाली नृत्य, शिव-पार्वती नृत्य, नटनटी नृत्य, दीपक नृत्य एवं लांग इनके द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली कुछ कलाएँ थीं. इसके अलावा भी ये कई तरह की नृत्य शैलियों के जानकार थे. पुराने दौर में इस जाति एवं इसका कला का खासा सामाजिक महत्त्व हुआ करता था. सभी महत्वपूर्ण अवसरों पर इनकी कलाओं का प्रदर्शन होता था.
बदलते परिवेश में इन जातियों का यह परंपरागत व्यवसाय लुप्त होने कि ओर है. बादी भी अब अपने इसी पुश्तैनी कार्य पर निर्भर रहने के बजाय अन्य व्यवसायों को भी अपना रहे हैं. इन जातियों की नयी पीढ़ी की अपने पुश्तैनी काम में कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि इससे इन्हें सम्मानजनक व सुविधाजनक जीवन नहीं मिल पाता है. सालों से इनके द्वारा वंशागत तौर पर संजोयी गयी कई संस्कृतिक धरोहर भी समाप्ति की तरफ बढ़ रही है. लोक एवं सरकार द्वारा इनके पास मौजूद संस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का कोई भी ठोस प्रयास नहीं दिखाई देता.
(उत्तराखण्ड ज्ञानकोष, प्रो. डीडी शर्मा के आधार पर)
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