ढांटा ब्या उत्तराखण्ड के खशों में प्रचलित तथा सामाजिक मान्यता प्राप्त निरनुष्ठानिक विवाह का एक प्रकार था. इसमें कोई सधवा (परिव्यक्ता या अपरित्यक्ता) अपने पूर्व पति को अथवा विधवा स्त्री मृत पति के घर को छोड़कर बिना किसी प्रकार के वैवाहिक अनुष्ठान के किसी अन्य विवाहित-अविवाहित पुरुष के साथ स्थायी या अस्थायी रूप से उसकी पत्नी बनकर रहने लगती है. यह चयन एकाधिक बार भी हो सकता था. (Dhanta Marriage Traditions of Uttarakhand)
इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान तो नहीं होता था पर कभी-कभी नया पति इस अवसर पर बकरा काटकर बिरादरी की दावत किया करता था, यद्यपि ऐसा करना जरूरी नहीं माना जाता था. औपचारिकता के रूप में स्त्री अपने नये पति के नाम का ‘चरेऊ’ एवं नथ पहन लेती थी.
ढांटा ब्या के दो रूप होते थे
1- मूल्यप्रदत्ता
2- अमूल्यप्रदत्ता
इसमें पहले की सामाजिक मान्यता दूसरे की अपेक्षा अधिक होती थी. खश समाज में इस प्रकार के विवाह को न तो अवैध समझा जाता था और न उस स्त्री अथवा उसकी संतान को ही किसी प्रकार से हीन समझा जाता था. इसका स्थान, जैसा कि कुछ लोग समझते है, ‘रखैल’ का नहीं था. इस स्त्री तथा उसकी संतान को वे सभी सामाजिक वैधानिक अधिकार प्राप्त होते थे जो कि विधिवत विवाहिता पत्नी तथा उसकी सन्तान को प्राप्त होते हैं. इसमें उपर्युक्त प्रकार की वैधता प्राप्त करने के लिए नये पति को उसके पूर्व पति को अथवा उस स्त्री के अभिभावकों को उसका वधूमूल्य चुकाकर उनसे ‘ला दावा’ (स्वत्वाधिकार परित्यागपत्र) प्राप्त करना आवश्यक होता था. जौनसार-बावर में इसे ‘खीत’, हिमाचल प्रदेश में ‘छूट’ तथा उत्तराखण्ड के जनजातीय क्षेत्रों में ‘धरम’ या ‘धरम देना’ भी कहा जाता है. बिना दूल्हे वाली बारात की भी परम्परा थी हमारे पहाड़ों में
उत्तराखण्ड की सामाजिक पारिभाषिक शब्दावली में ‘ढांटी का प्रयोग उस स्त्री के लिए किया जाता है जो कि अपने पूर्व विधिवत विवाहित पति को छोड़कर या उसकी मृत्यु के बाद बिना किसी वैवाहिक अनुष्ठान के किसी अन्य व्यक्ति के घर उसकी पत्नी के रूप में रहने लगती है. ऐसी स्त्री सधवा, विधवा या परित्यक्ता कोई भी हो सकती है. पन्नालाल के अनुसार गढ़वाल में वधूमूल्य देकर किसी कन्या को बिना किसी आनुष्ठानिक विधि के पत्नी के रूप में रख लिया जाना भी ‘ढांटी’ की कोटि में परिगणित किया जाता था. और उसकी सन्तति को ‘ढांटी की औलाद’ कहा जाता था.
इस सम्बन्ध में उल्लेख्य है कि सधवा (परित्यक्ता या अपरित्यक्ता) ढांटी की स्थिति में यदि उसके नये पति द्वारा उसके पूर्व पति को उसके वधूमूल्य का भुगतान कर दिया गया हो तथा उससे लिखित रूप में ‘ला-दावा’ (स्वत्वाधिकार परित्याग पत्र) प्राप्त कर लिया हो तो उसे वही वैधानिक एवं सामाजिक मान्यता प्राप्त हो जाती थी. ऐसी स्थिति में उसकी संतान भी जन्म देने वाले पिता का नाम प्राप्त कर लेती थी तथा उसके औरस पुत्रों के समान ही उसकी संपत्ति में दायभाग की हकदार भी होती थी.
(उत्तराखण्ड ज्ञानकोष – प्रो. डी. डी. शर्मा के आधार पर)
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