13 जनवरी 1921 मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर (Bageshwar) के सरयूबगड़ में दस हजार से अधिक आजादी के दीवानों ने गुलामी और कलंक के प्रतीक कुली बेगार के रजिस्टर को सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर बेगार नहीं देने की शपथ ली. इस हिंसा रहित जनक्रांति के नायक हरगोविंद पंत चिरंजीलाल तथा बद्री दत्त पांडे आदि कुमाऊँ परिषद के नेता थे.
कुली बेगार उतार आंदोलन यद्यपि कुमाऊँ की एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय घटना थी लेकिन इसका संबंध देश में रौलट एक्ट की खिलाफत से उपजे सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन से भी था.
कुली बेगार का यह आंदोलन एक दिन में उपजे असंतोष का परिणाम नहीं था. कुली बेगार आंदोलन की उत्पत्ति और उस वक्त की सामाजिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम से कुमाऊं की सामाजिक संरचना को समझना होगा.
1857 का पहला स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव कुमाऊँ में नहीं के बराबर था क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1815 के गोरखा शासन के उपरांत कोई नया अत्याचारी कर यहां नहीं लगाया था. इसकी वजह से यह क्षेत्र कंपनी शासन के विरुद्ध सामूहिक आकार नहीं ले पाया. यद्यपि काली कुमाऊँ चंपावत के कालू सिंह महर आदि ने ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध बगावत की थी और बगावत की यह चिंगारी अल्मोड़ा, नैनीताल तक भी पहुंच गयी थी, कुल मिलाकर कुमाऊँ तब भी शांत था.
1858 में जब शासन कंपनी से ब्रिटिश क्राउन को स्थानांतरित हुआ और रेल की खोज ने जंगलों के दोहन की नई कहानी शुरू कर दी, तो 18 64 मे वन विभाग की स्थापना की गई. वन सर्वेक्षक के रूप में बेवर की नियुक्ति की और 1868 में एसा वन कानून लागू किया गया जिसने उत्तराखंड के जंगलों में उत्तराखंड के गांव वालों के परंपरागत हक हकूक को समाप्त कर दिया. इससे भी बड़ी बात यह थी कि जो जंगल काटे जा रहे थे उनके ढुलान का कार्य गांव वालों के ऊपर बेगार के रूप में कर-स्वरुप थोप दिया गया.
गांव मालगुजार और थोकदार के जरिए कुली बेगार के लिए रजिस्टर बना दिए गए. सब ग्रामीण बारी बारी लाट साहब को बेगार में अपनी सेवाएं देते थे. इस प्रथा से उत्तराखंड वासियों के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुंची और विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो गई.
1878 में नए वन कानून से वनों में प्रवेश के अधिकार से स्थानीय नागरिकों को और अधिक कड़ाई से वंचित कर दिया. ग्रामीण समाज में इस कर व्यवस्था के विरुद्ध बड़ी गहरी छटपटाहट देखी जा रही थी. 1903 में जब लॉर्ड कर्जन बंगाल विभाजन से पूर्व भारत आए तो अल्मोड़ा में बुद्धिजीवियों के एक शिष्टमंडल ने लॉर्ड कर्जन को कुली बेगार के विरोध में एक प्रत्यावेदन दिया.
1903 में ही खत्याड़ी में सामूहिक रूप से बेगार करने से मना कर दिया गया और इसी वर्ष सोमेश्वर में भी एक ऐसी ही घटना घटित हुई. इस विरोध को जुर्माने के दंड और अन्य दमन की विधियों से कुचल दिया गया लेकिन अल्मोड़ा में सामाजिक सक्रियता के चलते ब्रिटिश हुकूमत ने इस विद्रोह की अनदेखी कर दी.
1905 के बंगाल विभाजन का असर उत्तराखंड में भी देखा गया.
1907 में अल्मोड़ा में एक विशाल सभा आयोजित की गई. बंगाल विभाजन के विरोध के साथ वनों में स्थानीय नागरिकों के अधिकार और कुली बेगार को लेकर भी बात की गई.
1907 में ही श्रीनगर गढ़वाल में गिरजा दत्त नैथानी ने कुली बेगार के विरोध में एक प्रत्यावेदन ब्रिटिश हुकूमत को प्रस्तुत किया और अपील भी जारी की. कांग्रेस की स्थापना के साथ ही कुमाऊँ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाग लेना जारी था.
सितम्बर 1916 मे कुमाऊँ परिषद की स्थापनासे यहां सामाजिक आंदोलनों में तेजी आ गई. प्रारंभ में यह एक समाज सुधारक संस्था थी लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए इसने तत्कालीन समाज का निर्माण किया.
परिषद का दूसरा सम्मेलन 1918 में हल्द्वानी में, तीसरा सम्मेलन 1919 में कोटद्वार में और चौथा सम्मेलन काशीपुर में हुआ जिसमें 1000 तक संख्या में लोगों की भागीदारी होने लगी. परिषद की सक्रियता ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से गहरे संबंध स्थापित किये.
1918 के कांग्रेस के दिल्ली सम्मेलन में 100 से अधिक प्रतिनिधि कुमाऊँ क्षेत्र से पहुंचे जहां कुली बेगार के विषय में राष्ट्रीय नेताओं तक यह बात पहुंचा दी गई और महात्मा गांधी को कुमाऊँ आने का निमंत्रण दिया गया.
1920 के नागपुर अधिवेशन में बड़ी संख्या में कुमाऊँ से लोग पहुंचे थे. महात्मा गांधी को बेगार के बाबत बताया गया. महात्मा गांधी ने हरगोविंद पंत, बद्री दत्त पांडे आदि आंदोलनकारियों से कहा – “मेरे कुमाऊनी भाइयों से कह दो अब कुली बेगार देना नहीं होता.”
गांधी के इस वाक्य ने मंत्र का कार्य किया और पूरे कुमाऊं क्षेत्र में इस बार कुली बेगार के विरोध में एक स्वतःस्फूर्त लहर चल पड़ी.
एक घटना 1 जनवरी 1921 की है जब बागेश्वर के पास चामी गांव में 400 से अधिक लोगों ने खड़े होकर हरज्यू के मंदिर में शपथ ली कि वे कुली बेगार नहीं देंगे. फिर कुमाऊं परिषद के बागेश्वर अध्यक्ष शिवदत्त पांडे ने हरगोविंद पंत आदि को उत्तरायणी मेले में आने का निमंत्रण दिया.
10 जनवरी को हरगोविंद पंत, चिरंजीलाल, बद्री दत्त पांडे चेतराम सुनार सहित 50 से अधिक कार्यकर्ता कत्यूर होकर बागेश्वर पहुंच गए थे. जहां उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया 12 जनवरी को एक बड़ा जलूस ‘कुली उतार बंद करो’ के नारों के साथ बागेश्वर बाजार में घूमा जिसमें 10 हजार लोग थे. दूसरे दिन सरयू के बगल में 10 हजार से अधिक लोग एकत्रित हुए.
हरगोविंद पंत के आह्वान पर कुली बेगार के रजिस्टर सरयू में प्रवाहित कर दिए गए और लोगों ने सरयू के जल से संकल्प लिया कि अब भविष्य में कुली बेगार नहीं देंगे. डिप्टी कमिश्नर डायबिल मेले के दौरान डाक बंगले में ठहरा हुआ था. उसने हरगोविंद पंत, बद्री दत्त पांडे और चिरंजीलाल को बुलाकर डांट-फटकार लगाई लेकिन आंदोलनकारी नहीं डरे.
इन लोगों ने वापसी में यह संदेश जनता के बीच दिया. हरगोविंद पंत ने खुद की लाश ले जाने की बात कही तो जनता और अधिक उद्वेलित हो गई. बचे हुए रजिस्टर भी मालगुजार द्वारा सरयू नदी के जल में प्रवाहित कर दिए गए. डायबिल जनता के दबाव में था और बल प्रयोग नहीं कर सका.
एक तरफ बड़ी संख्या में बागेश्वर में स्थानीय नागरिक थे वहीं डेविल के पास मात्र 21 अफसर, 25 सिपाही और 500 गोलियां ही थी. इससे भी बड़ी बात यह थी कि थोकदार और मालगुजार भी पक्ष में न होकर जनता के साथ खड़े थे.
इस प्रकार वर्ष 1921 में उत्तरायणी के दिन कलंक की बड़ी दास्तान यानी कुली बेगार का समूचा हिसाब सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया गया. कुली बेगार आंदोलन की सफलता ने उत्तराखंड में आजादी की लड़ाई में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सरयू का यह संदेश कुमाऊँ तथा गढ़वाल के अन्य भागों में भी पहुंचा जहां आंदोलनकारियों का उत्साह द्विगुणित हो गया और आजादी की लड़ाई और तेज हो गई. आज भी उत्तरायणी मेले से नए राजनीतिक संकल्पों को लिए जाने की परंपरा जारी है हमें कुली बेगार के इतिहास पर गर्व है.
प्रमोद साह
हल्द्वानी में रहने वाले प्रमोद साह वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत हैं. एक सजग और प्रखर वक्ता और लेखक के रूप में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफलता पाई है. वे काफल ट्री के लिए नियमित लिखेंगे.
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