कुमाऊँ के बागेश्वर में सरयू-गोमती के संगम पर उत्तरायणी (Makar Sankranti) का विशाल मेला लगता है. इस उत्तरायणी मेले का पौराणिक, धार्मिक व व्यावसायिक महत्व होने के साथ ही ऐतिहासिक महत्व भी है.
बागेश्वर के उत्तरायणी मेला ऐतिहासिक महत्त्व का है. इस दिन सरयू तट पर जनता ने कुली बेगार के खिलाफ आन्दोलन का सूत्रपात किया था. जिसे आज भी याद किया जाता है. इस दिन यहाँ पर पवित्र स्नान करने के साथ-साथ स्थानीय हस्तशिल्प तथा अन्य उत्पादों की खरीद, फ़रोख्त तो की ही जाती है. अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़े व ऐतिहासिक आन्दोलन के कारण यह मेला अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान भी रखता है.
14 जनवरी 1921 में उत्तरायणी के दिन सरयू बगड़ में अंग्रेजों द्वारा लागू की गयी कुली बेगार प्रथा का अंत करने के लिए एक विशाल आन्दोलन शुरू हुआ था. आजादी के रणबांकुरों ने ब्रिटिश सरकार की परवाह किए बगैर बेगार प्रथा के रजिस्टर सरयू नदी में प्रवाहित किए थे. जनता के इस आंदोलन को बाद में महात्मा गांधी द्वारा रक्तहीन क्रांति का नाम दिया गया था. इसके बाद महात्मा गाँधी ने बागेश्वर में 1929 में एक विशाल जनसभा को भी संबोधित किया था.
अंग्रेजी शासनकाल में उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बेगार प्रथा का चलन था. नियम के तहत किसी आम आदमी से बगैर मेहनताना दिए कुली का काम करवाया जाता था. इस प्रथा को कुली बेगार कहा जाता था. ग्राम प्रधानों का यह दायित्व होता था कि वह अंग्रेज शासकों को निश्चित अवधि में कुली उपलब्ध करवाए. गांव के प्रधानों व पंचायत प्रतिनिधियों के पास कुली बेगार प्रथा का रजिस्टर होता था. इस रजिस्टर में सभी गांववासियों के नाम होते थे और सभी से बारी-बारी बेगार करवाई जाती थी. ब्रिटिश अधिकारियों के सामान को ढोने का जिम्मा भी कुली का ही होता था. मकर संक्रांति: रानीबाग में वीरांगना जियारानी की पूजा
‘शक्ति’ अखबार में रिपोर्टिंग
ऐसा न करने पर कठोर दंड का प्रावधान था. यही नहीं अधिकारी के लिए भोजन व आवास की मुफ्त व्यवस्था भी ग्रामीणों को ही करनी होती थी. ग्राम प्रधानों, जमींदारों और पटवारियों की मिलीभगत से यह कुप्रथा जोर पकडती गयी और इसके खिलाफ आम जन का असंतोष भी पनपने लगा. अंग्रेजों द्वारा शुरुआत में इसे आम जनता पर लागु न कर भूस्वामियों और मालगुजारों पर लागू किया गया था.
भूस्वामियों, मालगुजारों द्वारा इसे भूमिहीन किसानों, मजदूरों तथा समाज के कमजोर तबकों पर लाद दिया. इस परंपरा के तहत अक्सर अंग्रेजों के कमोड व गंदे कपड़े ढोने तक के लिए विवश किया जाता था.
इस प्रथा के विरुद्ध आंदोलन की सुगबुगाहट बीसवीं सदी में होने लगी. पहाड़ की जनता ने इस प्रथा को खत्म करने की मांग को लेकर तत्कालीन कमिश्नरों को कई पत्र लिखे जिसे अनसुना कर दिया गया. वर्ष 1910 में पहली बार एक किसान ने इस प्रथा के खिलाफ इलाहाबाद न्यायालय में याचिका भी दायर की. न्यायालय ने बेगार प्रथा को गैर कानूनी प्रथा करार दिया.
बेगार आन्दोलन की सुगबुगाहट के बारे में जानने के बाद तत्कालीन कमिश्नर डायबिल का पत्र
अंग्रेजी सरकार ने न्यायालय के आदेश को आम जनता तक पहुंचने ही नहीं दिया तथा बेगार प्रथा को जारी रखा. 1913 में कुली बेगार स्थानीय जनता के लिए अनिवार्य कर दिया गया. बाद में पहाड़ के स्वतंत्रता सेनानियों ने कुमांऊ परिषद के नाम का संगठन बनाकर लोगों को बेगार प्रथा के खिलाफ जनता को जागरूक किया. कुमाऊँ में बद्रीदत्त पांडे ने इस आन्दोलन की अगुवाई की. उन्होंने अल्मोड़ा अखबार के मध्यम से इसके खिलाफ जनजागरण भी किया. परिषद में एडवोकेट भोलादत्त पांडे, बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, हरगोविंद पंत, रिटायर्ड डिप्टी कलक्टर बद्रीदत्त जोशी, श्यामलाल साह, तारा दत्त गैरोला मुख्य भूमिका में थे. उत्तराखण्ड का लोकपर्व उत्तरायणी
कुली उतार आंदोलन की सफलता में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अपील भी बहुत कारगर हुई. कुमाऊँ परिषद ने गांव-गांव जाकर लोगों को कुली बेगार प्रथा के खिलाफ गोलबंद किया तथा उनके प्रतिनिधि मंडल ने नागपुर जाकर महात्मा गांधी को इस आन्दोलन की जानकारी भी दी. महात्मा गांधी उस वक्त व्यस्त होने के कारण उत्तराखंड नहीं आ सके लेकिन उन्होंने अपील की कि स्थानीय जनता बेगार प्रथा का विरोध करे और किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के आवास, भोजन व सामान ढोने की व्यवस्था न करें. बापू के इसी संदेश को लेकर कुमाऊँ परिषद के कार्यकर्ता गांव-गांव गए.
14 जनवरी 1921 को बागेश्वर का उत्तरायणी पर्व कुली बेगार आन्दोलन का प्रस्फुटन हुआ. अंग्रेज सरकार को इस बात की आशंका थी कि उत्तरायणी का त्यौहार मनाने बागनाथ पहुंचे ग्रामीण किसी तरह की आंदोलनात्मक गतिविधि को अंजाम दे सकते हैं. जनाक्रोश को देखते हुए कमिश्नर ने 14 जनवरी 1921 को निषेधाज्ञा लागू कर बड़ी संख्या में पुलिस तैनात कर दी. जिलाधिकारी द्वारा हरगोविंद पन्त, चिरंजीलाल और बद्रीदत्त पांडे को नोटिस भी थमा दिया गया. ब्रिटिश अधिकारीयों की आशंका सही साबित हुई. उत्तरायणी मेले में आये जनसमूह ने बागनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद प्रतिरोध का स्वर बुलंद कर दिया.
कुली बेगार के विरोध में बागेश्वर में हुई एक जनसभा
40 हजार से ज्यादा लोगों का समूह बागनाथ मंदिर से सरयू बगड़ की ओर चल पड़ा. जुलुस के सबसे आगे चल रहे बैनर में ‘कुली बेगार बंद करो’ नारा लिखा हुआ था. यह जनसमूह एक विशाल जनसभा में तब्दील हो गया. जनसमूह को संबोधित करते हुए बद्रीदत्त पांडे ने जनसमूह का आह्वान किया कि –पवित्र सरयू का जल लेकर प्रतिज्ञा लो की आज से कुली उतार, कुली बेगार और बरदायिस नहीं देंगे. सरयू का जल हाथ में लेकर बागनाथ को साक्षी मान उपस्थित जनसमूह ने यह प्रतिज्ञा ली.
‘शक्ति’ के सम्पादक बद्री दत्त पाण्डे
सभी गाँवों के प्रधान अपने साथ कुली रजिस्टर भी लेकर आये थे. मौजूद पुलिस की परवाह किए बगैर ही क्षेत्र के प्रधानों, थोकदारों ने एक स्वर में बेगार प्रथा का विरोध करते हुए ‘भारत माता की जय’ के उदघोष के बीच पुलिस के सामने ही कुली रजिस्टर सरयू नदी में प्रवाहित कर दिए. अल्मोड़ा का डिप्टी कमिश्नर डायबल वहां मौजूद था लेकिन भारी भीड़ और मामूली पुलिस बल की वजह से वह कोई कार्रवाई नहीं कर सका.
इस आंदोलन की सूचना देशभर में आग की तरफ फैल गई. आंदोलन से प्रभावित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे रक्तहीन क्रांति का नाम दिया. महात्मा गाँधी स्वयं बागेश्वर आये और यहाँ पर गांधी आश्रम की स्थापना भी की.
हरगोविन्द पन्त
यह आन्दोलन सफल रहा और लोगों ने अपने संकल्प का पालन किया. उत्तरायणी मेले से शुरू हुआ कुली-बेगार प्रथा का यह विरोध बाद के दिनों तक जारी रहा. अंततः ब्रिटिश सरकार ने सदम में विधेयक लाकर इस कुप्रथा को समाप्त किया.
बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में इतिहास की इस प्रेरक परंपरा का आज भी निर्वाह किया जाता है. इस रक्तहीन क्रांति के गवाह रहे सरयू तट पर हर वर्ष मकर संक्रांति पर सभी राजनैतिक दल मंच लगाकर लोगों को संबोधित करते हैं. सरयू तट पर राजनैतिक दल शक्ति प्रदर्शन भी करते हैं और अपने राजनीतिक कार्यक्रम से लोगों को सचेत करते हैं.
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ऐतिहासिक आलेख के लिए बधाई टीम काफल ट्री।