हवाएं बिल्कुल सर्द हैं, हिमकणों की फुहार से भरी हैं. वेग से आती थपेड़े की तरह चुभती है और चेहरे को, माथे को सुन्न कर देती है. नाक के आगे तुषार कण जमने लगे हैं, आगे का भाग सफेद पड़ने लगता है. सांस लो तो वह भी गले से नीचे उतरने को तैयार नहीं. बीच-बीच में मुँह से हवा भर ले रहा हूं. ठंडी हवा लगातार है, कभी कम, कभी झोंके की तरह. कितना सही नाम पड़ गया इस जगह का. ख़या बयाल. ये हवा जो हर कदम ऊपर चढ़ते रह-रह थपेड़ों सी जोर मारती चुभती है.
(Chipla Kakri Kund Jyunli Temple)
ठंड बहुत है. हालांकि सिर पर गरम टोपी पहनी है जिसके ऊन के बारीक़ रेशे भी अकड़ गये महसूस हो रहे हैं, चुभ रहे हैं. मफलर गले पर लिपटा है, जब हवा का तेज झोंका आता है रह रह ठंडी लहर के साथ तो उसका जोर गले के खुले हिस्से पर फंदे सा कसता लगता हैं. बहती हुई हवा की सनसनाहट, सांस लेने पर में बस पल भर की सौम्य शीतलता देती है, उसके बाद तो ऐसा लगता है जैसे नाक और गले में अटक रही, बूजा लगा दे रही हो.
हवा आवाज कर रही है. उस रास्ते जिस पर हम चढ़े जा रहे हैं पहाड़ी से चिपक उससे सट, उसकी आड़ में तो दूर से आते हवा के झोंके कभी तो बस छू कर निकल जा रहे हैं तो अगले ही कुछ पलों में हवा के सौम्य झोंकों के स्पर्श अधिक वेग से चेहरे पर थपेड़ा सा मार रहे. खड़ी चढ़ाई के पर्वत पर पांव धर आगे बढ़ने की जगह एक हाथ को किनारे उगी घास का सहारा लेना पड़ रहा है.अगला कदम बढ़ाने की यँत्रवत कोशिश और सर पर चमकते सूरज की गर्मी के साथ शीत का कंप और उष्ण का ताप साथ साथ है. उस पर यह झसक, अचीन्हा अव्यक्त सा भय कि एक भी कदम यदि अपने लिए जमीन न टटोल सका तो…
खया बयाल के इस हिस्से में बस चढ़ाई है. ऊपर चढ़ते बाईं तरफ पहाड़ी है जिस पर घास उगी है मुलायम नहीं चुभने वाली पतले डंडो वाली जर्जर. खूबी यह कि इसकी जड़ों ने जमीन को मजबूती से पकड़ा है. अब पहाड़ी से चिपक कर चलना और आगे बढ़ने के लिए उगी घास को मजबूती से पकड़ आगे कदम बढ़ाना है. ऊपर चढ़ते-चढ़ते अचानक ही ढलान भी आ रहे हैं. तीखे से ढाल जिनसे हो गुजरने में चलना नहीं रेंगना है. नीचे की ओर कदम धरते दस्ताने पहना हाथ घास से मुट्ठी की पकड़ ढीली कर देता है. सोचता हूं दस्ताना उतार दूं इससे बड़ी असज, अलजियाट हो रही. सबकी चलने की गति मंद पड़ गई है, आपस के बीच की दूरी भी बढ़ रही है. मेरे आगे रेंजर साब तो बीस पचीस फिट दूर सोबन है. बायें हाथ का दस्ताना उतार पीठ के बैग में डाल देता हूं. चलने के लिए जैसे ही घास को पकड़ने की कोशिश की तो पकड़ सही बनी ही नहीं. बड़ी खुरदरी कंटीली थी वह घास. हाथ छिल गये. सोबन करीब आ चुका था.
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“दस्ताने पैरे रखो सर. नंगे हाथ तो ये घास बिराऊ जैसे चिंगारे मार देगी”.
हां, पर दस्ताने से पकड़ सही नहीं बन रही. असज अलग हो रही. ऐसा लग रहा धार में कि हाथ में पकड़ी घास अब फिसली और मैं लुड़का.
” बस ये धार थोड़ी ही है अब उस दूसरी पहाड़ी पर चढ़ना है वो उधर ऊपर देखिये रेंजर साब और कुण्डल दा दिख रहे हैं”.
मन हुई कि पूछ ही डालूँ अब और कितना चलना है पर चुप ही रहा. मालूम ही हुआ वह कहेगा बस आ ही गये समझो. कुण्डल दा से पूछो तो वह कहते “मुणी छ ह् सैबो हिटो लमालम”.
बड़ी देर लगी ये धार उतरने में. कैसा रौखड़ था बिल्कुल सूखा पड़ा. पेड़ भी छोटे खुरदरे. घास भी कंटीली-चुभने वाली. पांव धरने की जगह जूते में घास के उलझ जाने से अलग उलझन कर रही. चारों ओर ठंड का एहसास पर चलने उतरने में गरमी बदन को भभका भी दे रही अब जा कर इस धार के कोने से आगे एक समतल सी पट्टी दिखाई दे रही है जैसा अक्सर गाँवों में सेरा होता है. दूर तक फैली इस समतल सी पट्टी के आगे बहुत आगे से फिर दूसरी पहाड़ी ऊपर को चढ़ गई दिख रही है तो पश्चिम से पूरब की ओर फैली हैं हिम से ढकी पहाड़ियां.
आसमान की ओर तकते मैं तो वहीं पसर गया. पांव जरा जोर लगा कर ही सीधे हुए. पिण्डलियां सख्त पड़ गईं थीं. मन तो हुआ कि शरीर पर जितने कपड़े लदे हैं उन से स्वयं को मुक्त कर दूं पर ये संभव न था. भले ही यह समतल स्थान था पर हवा के झोंके अभी बहुत शीत से भरे थे और आसमान में चमकता सूरज भी अलसाया सा पड़ा था. दस्ताना उतारने की कोशिश की तो हाथ बिल्कुल लकड़ी गये सुन्न लगे. जैकेट में ठूंसा रुमाल निकाल चश्मा पोछा जिसमें तुषार के कण चिपके थे.
ठीक सामने तीन तरफ फैला बरफ का आंचल ओढ़ छिपला कोट का असीमित विस्तार था.बर्फ की झिलमिल सफेदी. कितनी सारी पहाड़ियों की परतें,जिनमें सफेद के भीतर छुपे कितने उजाले झाँक रहे थे. कितनी परतें दिख रहीं थीं. लगातार देखने पर उनमें नजर टिक नहीं रही थी. दूधिया पर्त जो हिम श्रृंखला के अगले हिस्से में थोड़े पीलेपन की रंगत दिखा रही थी जैसे मलाई का बड़ा सा थक्का और उधर और दूर जाता जा रहा हो.
गांव में आमा, ठेकी में एकसार जमा दही पण्यूँ से निकालती तो उसकी पहली परत कुछ पीली सी होती जैसे बहुत हल्का बसंती रंग उसमें घुला हो. परत दर परत सफेदी के बदले हुए हिस्से.जैसे-जैसे और नीचे का दही निकाला जाता वह और सफेद होता. ठीक इस पर्वत माला की तरह.
नीचे यही सफेदी मिट्टी के पीले पन से घुली और फिर हरियाली में कहीं गुम भी हो गई.
यही है उत्तर दिशा की ओर फैली सम्पूर्ण छिपला पर्वत श्रेणी जिसके सुदूर दक्षिण की ओर शिवालिक पहाड़ की श्रृंखला है. दक्षिण के किसी कोने में बसी है सोर घाटी. ऐसा ही बताया है रेंजर साब ने.
अपने कैमरे के टेली फोटो लेंस को इस पूरी फैली पहाड़ी की ओर कर घुमाता हूं. उसमें पोलेराइजिंग फ़िल्टर भी लगा है. फ़िल्टर लेंस को घुमाने के बाद भी सारी पहाड़ी की सफेदी झिलमिलाती दिख रही है. हवा चल रही है अलग-अलग हिस्सों में इसका वेग अलग-अलग होगा तभी तो दूर सब धीमे धीमे डोलता सा झिलमिलाता लग रहा है.
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इस तप्पड़ पर आ, सब बैठे-लेटे-पसरे की मुद्रा में हैं. रेंजर साब धरती पर उगे झाड़ और घास में पता नहीं क्या ढूंढ रहे हैं. उनकी जेब में कई कई फलक वाली धार और स्प्रिंग वाला चाकू मौजूद रहता है. उसी से कुछ खुरच-काटकूट करने में लगे हैं.
संकरू और कुण्डल दा ने चूल्हा सुलगा दिया है. लकड़ी के धुवें में अजब सी मादक खुशबू है.अब बस चाय का इंतज़ार है.
चाय भी मिली और पेट पूजा भी हुई. जो खाओ जितना खाओ यहां की अबोहवा में सब पच जाता है. रेंजर साब आस-पास की जमीन से क्या कुछ खोद-खाद लाये हैं. उनके परम सखा भगवत बाबू ने आज मौन रखा है तो सिर्फ इशारे हो रहे हैं सुबे से. रेंजर साब भी जब किसी काम में लगे हों तो बिल्कुल गुम्म रहते हैं. अपने बैग से एक सूती धोती निकाल हाथ से तीन बालिस्त नाप उसे चरका रहे हैं. तमाम खुदे कंद और जड़ें अब क्रम से छांट सूती कपड़े में उसकी पुटली बन रही है. फिर पैन से उनमें कुछ लिखा भी जा रहा है. सोच रहा हूं उनसे पूछूँ कि ये क्या माल बटोरा. पर अभी वह चुप्प से अपने काम में दत्त चित्त हैं. अभी कुछ बोलने या मिली जानकारी नोट करने की उज भी नहीं आ रही है.
कुण्डल दा ने चिता दिया कि खा-पी टप्प लधर जाओ यानी आराम कर लो. आगे तो भ्योल पार करना है, ज्यादा तो नहीं है पर बड़े सीप से उतरना होगा. कुण्डल दा सोबन और बाकी नौजवान दगडुओं को हड़का भी रहे है कि आगे चलते रास्ते में उतरते कोई छितरेट नहीं करना. वैसे भी देबता का इलाका हुआ, हल्ला-गुल्ला छितरेट नहीं चलता. कौन जाने मूड बिगड़ने में केदार बाबा क्या कोप दिखा दें. तो बस उनके नाम का सुमिरन कर चलना है. अपनी फाम तो रखनी ही हुई बाकी सब का भी ध्यान रखना हुआ. तो तू सोबन रहेगा सबसे आगे संकरू के साथ, फिर दोनों सर लोग, इनके पीछे मैं और अपना एन सी सी का जवान उमेद. बाकी लोग तो सब रोज की सार के हुए, कहां से कहां पुज जायेंगे. संकरू के साथ के ढकरिये, ड्याबा, भुर्री तो पीछे ही रहेंगें भेड़ बकरों के साथ आगे कुछ यार गये हैं जड़ी बूटी वाले,वो एकबटिने वाले हैं. तो ये अपने आप बढ़ते हैं आगे को.
“तू समझा रे सोबनिया, खा खा के गदुआ हो रहा. अब चलेगा धार पार करते सबसे आगे. हमारे पछिल हुआ और फुटबाल की तरह लुड़का तो हमें भी ले मारेगा. ये देखो खाना खाया नहीं कैसी नीन आती है? जहाँ देखो वहां लुढ़क जाता है. देखा न आपने? जरा कुछ खाया भकोसा, कैसा अलसा के हड़ी जाता है”.
“सर. ये खा पी के हर जगह लधार लगाने की आदत तो मेरी डॉक्टर साब रामसिंह जी की संगत में गांव-गाँव भटकते पड़ी. पांडे सर भी होते थे साथ. उस बार तो लुआघाट से पंचेश्वर की जड़ तक गये थे खूब लम्बे. हर ठौर रुकना हुआ. गांव के मवासे वहां के बुजुर्गों-सयानों से उनकी खूब लम्बी बातचीत हुई. जहां रुके, चाय पानी हुई, बातचीत खतम हुई तो डॉ रामसिंह जी खट्ट सोये. कुर्सी पर बैठे-बैठे भी उनकी आंख लग जाने वाली ठहरी. पटखाट जो मिल जाये लधरने को तो फिर बात ही क्या. उठें तो एकदम तरोताजा”.
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सोबन ने राम सिंह जी की याद दिला दी. गाँधी आश्रम की धोती, टोपी और कुर्ता जिसके साथ सदरी. गर्मियां छोड़ फिर पूरे जाड़े तक जर्ज़रे से ऊन का लम्बा मफलर. पांव में चमड़े की ही चप्पल. उनके साथ चलना ही यात्रा बन जाती. कोई तैयारी नहीं. गले में लटके झोले में डायरी और कागज पर्याप्त होने चाहिए. सदरी की जेब में लटके पैन तो झोले में पेंसिलें भी. बाल पैन से लिखना उनको पसंद न था. उनके साथ कहीं भी जाओ तो जान पहचान मित्रता इतनी, कि हर ठौर स्वागत हो खाने -पीने को खूब मिले.
उन के साथ गुम देश की कई यात्राएं की. काली कुमों के भ्रमण पर उनकी कई फाइल तैयार हो रहीं थीं. उन्होंने इसका नाम भी सोच लिया था “राग भाग”.
यात्राओं से वापस पिथौरागढ़ आते तो ऐंचोली में बस-जीप से उतर उनके घर की चढ़ाई चढ़ी जाती. सबके झोले भरे रहते. गाँव-गाँव में उनके इष्ट मित्रों से मिला सामान, फल और पुराने दस्तावेज-पाण्डुलिपि वगैरह-वगैरह. सबसे बड़ी बात यह होती कि ग्राम जब भी कॉलेज में दो तीन दिन की छुट्टी पड़ें तो उनका सन्देश आ पहुँचता, चलना है भाई. कैमरा तैयार रखना.
कई बार उनके घर रुकने का आदेश होता तब उनके साहित्य अनुरागी इतिहास के धुरंधर मित्र घर पर आये होते. बाबा नागार्जुन से पहली भेंट उन्हीं के घर पर हुई थी जो ऐंचोली से चढ़ाई चढ़ एक छोटी पहाड़ी के शीर्ष पर था. थलकेदार जाती सड़क से बायें जहां से उनके घर का जीप चढ़ने लायक रस्ता था उसके दोनों ओर तमाम किस्म के पेड़ थे. फलदार पेड़ भी बहुत हुए. उनके घर से नीचे के इलाके में गैना नर्सरी थी जिसे उद्यान विभाग संचालित करता था. गैना नर्सरी के डॉ हीरालाल से भी वहीं भेंट हुई थी.
डॉ रामसिंह जी के घर उनकी श्रीमती जी यानी हमारी काकी तो बस अन्नपूर्णा थीं. सब पहाड़ के व्यंजन उनकी रसोई से अपनी सुवास महकाते. हर अवसर हर मौके के हिसाब से हमें वह खाने को मिलते. बस हमारे चाय पीने पर रामसिंह जी को बड़ा एतराज होता. खुद वह घर में मर्चवाणी पीते जिसमें अदरक काली मिर्च पड़ी होती. हमसे कहते क्या ये वक़्त बेवक़्त चाय पीना, सिगरेट फूकना, बदन की सारी दम ये सोस लेतीं हैं. ये देखो कितने अमरुद लगे हैं. सब लाल हैं. खूब मीठे. बस तोड़ो और खाओ. ऐसे ही देखो जामिर भी लगे हैं खूब. तुम क्या बता रहे थे मृगेश कि इनका रस तो पेट के रोगों के लिए दवा का काम करता है?.
“हां, मेरी आमा जामिरों का रस निकाल फिर इनका चूक बनाती थी. लोहे के भदेले में. जब ख़ौलते ख़ौलते खूब गाढ़ा हो जाता तो ठंडा होने पर बोतल में भर लेते. इसकी एक बोतल तो साल भर काफी होती थी चटनी बनाने के लिए.”
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“यहां तो दाड़ीम भी खूब हैं. इसका भी बनता है चूक. पर इतनी खुरबुर कौन करे. ये तो बस गायभैंस के काम और खाना पकाने में ही रह जातीं हैं.” अपनी श्रीमती जी को बड़ी थाली में खाने का कुछ माल ताल लाते देख रामसिंह जी बोले.
“तबे त कूनमर्युन कि भरतोक ब्या कर दिना, मैं के ले दगड मिल जाल. फिर निरप्रभाक बाट ले खुल जाल.” सही मौके पर गुरु पत्नी बोलीं.
“अब भरतक ब्या त होले. नीर तो पैली पढ़ाई पुर करेलि. नौकरी करेलि तब होल ब्या.”
” इतु को पढ़ूं चेलिन कें. इनर त हिसाबे अलग भै क ss “
“अच्छा तुम जाओ हो. मैंल सब सोच राखो”. राम सिंह जी कुछ आवेश में आ जाते. वह लड़कियों की पूरी शिक्षा और उनके स्वावलंबन पर यकीन करते और प्रचलित रीति रिवाज व कर्मकांड का घनघोर विरोध करते”.
सोबन को उसकी लधार से जबरन उठा कुण्डल दा ने हुक्म फ़रमाया कि खा-खा के फूल रहा ये सोबन सबसे आगे चलेगा.उतार है अब भौत ज्यादा. पीछे रहा और लुड़का तो आगे उतर रहे न जाने कितनों को लुढ़काएगा.
अब देखो हो सैबो? खाल्ली पड़े रहते हैं मेरे पीछे. क्यों हो रेंजर सैब? इतना खाता और बलाता हूं क्या मैं? नींद भरी आँखों को ढुलकाते उसने पूछा.
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“अरे सोबनिया! जो खाने और सोने में निगरगण्ड उसने तो समझ दुनिया फतह कर ली. उज्याड़ जस खाण भुल. उसाइ मुख नी कर. जोरेकि की पाद मार और हिटते रौ. क्यों हो? भगवत गुरु कैसी कही.”
“आराम से चलो हो. ये ज्यूली का उतार और फिर आगे का रस्ता बदन की लोथ निकाल देता है. ज्यादा खिचरोली, एखार -एखारै लगूंण यो बकबकाट ठीक नी भै हो.” भगवती बाबू का मौन व्रत भंग हुआ. संकरू की देखादेखी सब उसके पीछे नीचे की ओर उतरने लगे.
नीचे ढाल में उतरते अजब सी ख़ामोशी है बस अपना बदन जब बाईं ओर की झाड़ियों, ठिँगरों और सख्त पड़ गई घास से रगड़ खाता है तो उसकी आवाज के साथ संभल-संभल कर रखे कदमों में नीचे जमीन पर जूतों की पदचाप खर्र-चर्र सुनाई देती है. इसमें भी एक लय है. कदम भी नीचे जमीन देख कर बढ़ रहे हैं.कभी ज्यादा कभी उससे कम. रस्ता पथरीला सा है किरच-किरच पत्थर टूट कर सा बना.इसमें रड़ने की पूरी गुंजाइश है और अगर जूता जरा भी फिसला तो नीचे संभलने का कोई सहारा फिलहाल तो दिख नहीं रहा, “इथ भ्योल, उथ रौखाड़”.
छिपला की विस्तृत पहाड़ियों से रह रह कर हवा के तेज झोंके आ रहे हैं और माथे और नाक पर चुभ रहे हैं. संकरू ने बताया कि लम्बे समय तक यहां खुले में इस हौ के कारण मुख तो चिमड़ी जाता है. काले भूरे दाग धब्बे भी पड़ जाते हैं पर फिर नीचे अपने मुलुक की ओर लौटते ये ठीक भी हो जाते हैं.
रेंजर साब मेरे ठीक आगे हैं व संकरू पीछे. करीब घंटा भर हो गया है इस पथरीली असमतल चट्टान से नीचे उतरते. रेंजर साब लगातार चलते चलते एक सपाट सी जगह पर पहुँच रूक गये हैं.
“अब देखिएगा आप, कैसे इस जगह की फितरत ही बदल जाती है. यहां तक आते उतरते सब जोखिमभरा असजिला रूखा चिताया होगा अब आगे देखिए, कैसे अगली पायदान पर कुदरत ने कुछ करिश्मा तो कर ही दिया है”.
अगले ही मोड़ से घूमे तो आगे फिर चट्टानों का सिलसिला जारी था तो हरियाली भी और ऊपर की श्रृंखलाओं में लकदक बर्फ भी. आसमान भी यहां से वहां तक खूब फैला खुला- खुला सा और उसमें लहराते बादल रुई के गोलों की लम्बी लकीर बनाते हुए.
“ये ऊपर देखिये”, रेंजर साहब बोले, “ये जो घांघल हैं ना ऊपर बड़े चौड़े से इन चट्टानों में, तेरह – चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर, उनके बीच खूब पानी जमा रहता है, ये कुंड हुए. ऐसा ही एक कुंड “काकरीकुंड” के नाम से जाना जाता है”.
“हां सैबो, काकरीकुंड हुआ, और भी भौत सारी खाल हुई. ये जो सामने बरफ का पहाड़ हुआ ना इसके नीचे का सब घांघल वाली जगह तो ब्याल होते ही अकड़ जाने वाली हुई.खांकर पड़ जम जाती है. ऐसी कुड़क ठंड पड़ने वाली हुई समझो.अब ऐसे में भी यहां आस -पास भालू भी बहुत हुआ.” संकरू ने बताया.
“वैसे सामने पड़ जाये तो कुछ नहीं करता. बस चाए रहता है. अब्ब छेड़ छाड़ कर दो तो ख्यात पाड़ देता है, मल्लब पीछे ही पड़ जाता है. कभी ख्यात पड़ ही जाए तो बस उतार की तरफ दौड़ लगानी चाहिए. उप्पर की ओर नहीं, वजन ज्यादा हुआ ना उसका, तो नीचे की ओर,मल्लब उतार में भाग नहीं पाता सुसरा. लुड़क-पुड़क हो जाती है उसकी. अंss, ऐ बात बताऊँ गुरूजी. ये भालू साला हुआ बड़ा हरामी. अपने लपेटे में ले-ले तो नखुनों से चीर कर रख देता है. पेट की अंतड़ियाँ-पतंडियां निकाल देता है और न गुरूजी, सैणियों को तो अंगवाल खित उनकी ले भी लेता है”
“ये सुनाई सोबनिया ने फसक.”रेंजर साब बोले,”अब ये जिस चट्टान की ओर हम बढ़ रहे हैं न बस इससे उतरते ही दिख जायेगा मंदिर. खूब चले आज. जल्दी भी चले. ये देखो आ गया वो सामने ज्यूँली का थान”.उन्होंने आगे एक चट्टान की ओर इशारा किया.
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अब इस चौरस स्थान से आगे बढ़ते आगे एक उडयार दिखाई दी जिसके करीब से धुँवा निकलते दिखाई दे रहा था. उसके करीब कुछ लोग बैठे दिखाई दिए.हमें सामने देख उन्होंने हाथ हिलाए और उठ खड़े हुए. आगे चलते संकरू ने जोरदार सीटी बजाई और ” होss रे दssदा ” की आवाज कानों में गूंजी. अब थोड़ा उतार था. तीन लोग हमारी ओर बढ़ रहे थे. संकरू और सोबन से उनकी भेट – घाट हो गई थी. जहाँ पत्थर रख चूल्हा सुलग रहा था. खाने की खुशबू महक रही थी. कुछ बड़े बर्तन भी रखे थे. सूखी लकड़ियों के तीन चार गठठर भी. कुछ दूरी पर उडयार से सटा हुआ काफी बड़ा बदरंग सा टेंट तना दिख रहा था.
एक बड़ा झपरू कुत्ता हमें देख भोंकते हुए आया. उसके पीछे तीन लोग भी आगे आये.
“हड़ीss, चुप रे गणिया….”
कुत्ता एकदम चुप हो पास आ दुम हिला हर किसी के पास जा सूंघ सांघ करने लगा.
नीचे उतरते संकरू सबसे आगे था. मैं और दीप उसके पीछे.
“आव हो आव अगास पुज जाण, पुज गोछाss”
वह संकरू से लिपट गया.गव लागण. बाकी भी सबसे.
“आव त मिलो, गुरु लोग, किताब क किड़ भै. पढ़ूंनी यो ठुल कोलिज पन. यो सबसे सयाना है गुरूजी, दल बहादुर. ये रैपला गाँव का हुआ. और ये गगन सिंह रोंकली, और ये जेठा हुआ डमर दा. आपण डमर दा नाचनी का हुआ. फौजी ठहरा. पैर पर गोली खाया, टिटियां जस खुट है गो.अब पिंसन आ गया.” संकरू ने उन तीनों से परिचय कराया.
टेंट के पास की उडयार के पास सब बैठने लगे. झोले झंटे रख दिए गये.
“सब अपने ही गों घर के हुए मित्र लोग. बरस भर में चार महिने यहीं इनकी ठौर हुई. वो पहले जो बाकरे वाले चले थे ना उनको बताई थी खबर बात कि हम भी आ रहे छिपला केदार”.
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यहां पहुँचते तो हाड़ काँपने लगे थे. जो कपड़े पहने थे उनसे असज भी आ रही थी. सर में खुजली भी हो रही थी पर सर की गोल तिब्बती टोपी खोलते ही ठंडी हवा का झोंका ऐसे थपेड़े की तरह लगा जिसने कपाल सुन्न कर दिया. मैंने तो बस फौरन टोपी पहन ली. तभी तामचीनी के बड़े मग में गरमगरम काली चाय हाथ में थमा दी गई. चाय की सुवास से ही जी हल्का हो गया. यहां तो सांस भी पूरी तरह ली नहीं जा रही. हर बार सांस खींचने में कानों में उसकी ध्वनि सुनाई दे रही. चाय के हर घूँट के साथ लगा कि अब बदन खुल रहा है. अब जो भी हो जूता तो खोल ही लेता हूं. सोबन और उमेद ने तो टोपी जैकेट सब उतार दिया है.
डमर दा ने मेरे मग में कितली से और चाय डाल उसे पूरा भर दिया. फिर गौर से मेरे कैमरे को ध्यान से तकता रहा.
“यहीं बिल्कुल पास में ज्यूँली का मंदिर है. उसे जरूर खींचियेगा. आप चाय पियो मैं दिखाता हूं ” डमर दा आगे बढ़ औरों के मग चाय से भरने लगा.
जूते मोजे खोल बड़ी राहत मिली. पांव में ठंड भी सुई जैसी चुभ रही थी. सोबन और उमेद तो अब तक टेंट और आस पास का चक्कर लगा आये थे. अभी कुछ देर पहले हमारे यहां पहुँचने के समय तक आकाश में छितरे-बिखरे बादल थे. अब तो इनके गरजने की मंदी सी आवाज सुनाई दे रही थी. हवा भी चल रही थी बड़ी तेज. अचानक ही हवा बंद हो गई. उमस होने लगी. थोड़ी ही देर में आकाश पूरा घिर गया. दूर चोटियों पर तड़ित का प्रकाश इधर उधर हो उभरता और कुछ पलों बाद गरजने की ध्वनि पहाड़ों से लौट-लौट कर आती.
डमर दा मुझे उस तिरछी सी चट्टान के कोने तक ले आये थे. वहाँ से देखा कुछ दूरी पर एक छोटी सी शिला है. वहां गुफा भी है. गुफा के कोने में कई तरह के बर्तन और छोटे पात्र भी बेतरतीब पड़े हैं. सब पात्र ताम्बई, पीतल के रंग के पुराने कालिमा पड़ गये दिख रहे हैं. गुफा के पास कई सिक्के भी बिखरे हैं.
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डमर दा बता रहे इनमें बहुत से सिक्के चांदी के भी हैं. ये सारे भान कुन ये सिक्के देबी को चढ़ाई गई भेंट है. हमारे यहां से तो लोग आते ही हैं पूजा करने भेटने, नेपाल से भी भौत लोग आते हैं. आपूँ ये पीले सिक्के देखना सारे नेपाल के हैं वहां श्री 5 के साथ हमारे देबी देबताओं के बहुत सिक्के चलते हैं. ये ज्यूँली का थान हुआ. उसी की आण-बाण हुई. इसी का सहारा हुआ यहां ये ही रक्षा करने वाली हुई.
अब रह रह कर आसमान में घिर आये बादल गरजने लगे हैं. कड़कने लगे हैं. अचानक ही अंधेरा भी छाने लगा है. हम टेंट के पास लौट आये हैं. डमर दा कह रहे हैं कि दिशा मैदान जाना हो तो फटाफट चले जाओ. लग रहा थोड़ी देर में खूब बरसेंगे ये बादल.
मेरी फोटो खींचने की बड़ी मन थी पर इतनी जल्दी अंधेरा हुआ कि अब न तो पंचचूली का कोई हिस्सा दिखाई दे रहा और न ही छिपला की कोई पहाड़ी. तेजी से उमड़-घुमड़ करते मेघ जो दूर से आते स्याह सफेद दिखते और तेजी से इस विस्तृत आकाश में फैलते काले घने हो जाते.
टेंट के पास की शिला में रेंजर साब, दीप और मैं बैठ गये हैं. भगवती बाबू कटोरी में ज्योत जगाए एक हाथ से उसे छोपते हुए ज्यूँली के थान की ओर जा रहे हैं.
“चाय और पिलाओ हो, यहां तो बदन कुड़की गया”. बड़ी देर बाद रेंजर साब के बोल फूटे. ये उनकी आदत है कि खूब बकबक के बाद शांत निर्लिप्त हो जाते हैं.
“चाय तेयार हुई साब ” कह कितली में ख़ौलते पानी में दल बहादुर ने कोई जड़ी बूटी का चूरा और फिर चाय की पत्ती डाली और तुरंत ही कितली चूल्हे से हटा ली.
“ला हो मग ले आ ” कहने की देर थी कि गगन दा ने तामचीनी के बड़े मग सामने रख दिए. चाय का बड़ा सा घूंट भर रेंजर साहब चहक गये, ” वाह रे तीमुरा डाला है तूने, वाह इससे तो सब अरड़ -ठण्ड निबटी जाती है”. चाय के साथ हर किसी को मिश्री की डली भी मिली, कटक लगाने को. झुमझुमी होने लगी. मतलब बहुत ही धीमे धीमे होने वाली बरखा. हुलक सी मची कि इससे तन भी भिगाया जाय तो मन अपने आप ही इसके नाद से तरंगित हो उठेगा. रेंजर साब न जाने कैसे भाँप गये कि भीगने की हौस उठी है. फौरन बोले, “बेकाबू न हो अभी फुहार है तो अगले पल रिमझिम के साथ ठंड और बढ़ा ये बारिश गुजरेगी बरफ के स्खलन तलक”
मैं और दीप पत्थर की आड़ लिए चूल्हे के करीब बैठ गये जो न जाने कौन से कंटीले पेड़ों के मोटे बग्घल और छोटी-मोटी जड़ों के ठूँठ से सुलग रहा था. दल बहादुर ने उस पर एक बड़ा बर्तन रख दिया जिस पर ढक्क्न लगा हुआ था. खाने पीने की सारी तैयारी हुई दिख रही थी.अब दल बहादुर ने सामने रखे तवे में पण्यू को चूल्हे में डाल जलते कोयले निकाले. अब एक चीकट से रुकसैक में हाथ डाल हंतरे में बंधी एक पुटली निकाली और उससे मुट्ठी भर चूरा निकाल तवे में रखे क्वेलों में डाल दिया. मादक सी धूप की खुशबू फैल गई.
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“ले हो देवी मैय्या के थान में रख आ इसे”.
“लाओ, मैं रख आता हूं. दिया भी जलाना है. संध्या पूजा भी कर लूंगा”. बड़ी कटोरी से चाय खतम करते भगवती बाबू बोले. तामचीनी के मग में चाय मत देना पहले ही बता दिया था उन्होंने.
“हां हो पंडित ज्यु लियो लि जाओ, तुमिनके पितलोक गिलास में दूँल चहा, बामन देब भया “. सणेसी से तवा पकड़ दल बहादुर ने उनको थमा दिया. भगवती बाबू खुशबू बिखेरते थान को चले.
“ये धूप के मसाले में क्या पड़ता है”? मैंने डमर दा से पूछा.
“कतुके जड़ कंजड़ छन धूप जड़ी कूनी एक कें, उमें घ्यु चुपड़ कें धरनी. गोकुल कुंछा या गुगुल भै, सैमयो लै छ, मासी ले हुँ. मोरपांख जै पातक क चूर भै. एक के नाम कूनी उ सुगंध बाला. सब यइं मिल जानी. दयाप्ता थान में क्वेलनक मली योई धूणि भै महराज.
रेंजर साब ने बताया कि अप्रैल के महिने से सितंबर तक बारह से सोलह हजार फीट की ऊंचाई में जो बुग्याल हुए उसकी साफ हवा, गुनगुनी धूप, जहां देखो वहां तक फैली हरियाली वाले ढलान, उनके बीच के समतल मैदान, घास में उगे असंख्य रंग बिरंगे फूल के बीच फैला होता है कारबार.बुग्याल के उत्तरी सिरे यानी कि स्नो लाइन से नीचे पत्थरों के बर्फ से टूटने पर बने छोटे-छोटे टुकड़ों से ढकी ढलान जिसे “छेल्वान” कहते हैं की निचली पट्टी पर उगती हैं लम्बी जड़ों वाली अलग-अलग किसम की जड़ी बूटियां.
इस धूनी, इसकी खुशबू से तो मन महक गया. संकरू ने बताया कि डमर दा को जड़ी-बूटी, कंद, घापातोक ठुल सीप हुआ. अब जड़ी बूटी के थोक वाले काम ही पकड़ भी लिया हैं. टनकपुर, रामनगर, कोटद्वार की बाजार हो या खारी बावली दिल्ली के चक्कर इनमें आने- जाने सौदा पटाने में गगन दा उस्ताद हुए. हिसाब-किताब सब बहादुरदा के जिम्मे हुआ.
“ये तो छोटी मोटी कोआपरेटिव का बढ़िया उदाहरण हुआ. अभी क्या- क्या बिक जाता है?” मैंने पूछा.
“बिकने वाली जिंस तो बहुत हुईं. अभी तो बूदी के खेतों की नर्सरी में सालम पंजा, अतीस, कुटकी और डोलू उगा रहे लोगों से माल इकट्ठा करते हैं.वहां के वन पंचायत वाले इलाके में तो इनकी इफरात ही हुई. ऐसे ही कुटी में सगंध पौधों की बहार हुई. काली जीरी हुई, कुथ हुआ, बाल छड़ी हुई जटा मासी हुई. इन सबकी बढ़िया खेती हो जाती है “. डमर दा बोला.
“कैसी कैसी चीजें हुई यहां, हमारे पुरखों की बताई “. गगन सिंह बोले,”यहां एक बरस पुराना ” म ” यानी शहद और ” सं ” हुआ जिससे ” मर्ती चयत्ती ” निकाला जाता. पुराने जानकार हुए “सं चयत्ती ” को ” कलं ” बनाने का तरीका जानने वाले. यहीं ऊपर तीज्या जगह पड़ती है, वहाँ पतियाल लोग हुए. उनके पास रेबीज की शर्तिया दवा हुई. यहां की चखती में जो खमीरा लाने के वास्ते बलमा पड़ता है उसमें कई जड़ें ऐसी हुईं जो विष वाली हुईं, बड़े अंदाज और नाप नूप के खिती जातीं हैं”.
(Chipla Kakri Kund Jyunli Temple)
“अभी तो हम चिरायता, जटा मासी, गुगुल और भी बहुत भेषज के पूरे पौंधे इकट्ठा करते हैं इसे पंचांग कहते हैं. ऐसे ही पत्थर लोंग की पत्ती व तालीस पत्र की पत्ती और छाल बटोरी जातीं हैं तो लहसुनिया, गंद्रायण, डोलू, सालम मिश्री, सालम पंजा, वन ककड़ी, कूट और कुटकी की जड़ काम आती है. अतीस का कंद खोदने वाले ठहरे. ऊपर जोहार के इलाके में जम्बू या फरान खूब बढ़िया होता है. इसकी डिमांड भी खूब हुई. ऐसे ही कपूरकचरी, हींग या चोरा, कुथ, खुरासानी अज्वाइन, अर्चा के बढ़िया दाम मिल जाते हैं. बस ठीक टाइम से हरिद्वार,टनकपुर, रामनगर, सहारनपुर देहरादून और दिल्ली की मण्डी तक माल पंहुच जाय. इन मंडियों में पलती, फाफ़र और नपलचुमा की भी डिमांड हुई.”
दलबहादुर और कुछ बताने जा रहा था कि आसमान में बादलों की तेज चमक उभरी और कुछ ही पलों बाद कानफोड़ू गर्जनाके साथ कम्प भी हुआ. टेंट के बाहर जिस चट्टान में हम बैठे थे लगा कि वह भी हिली. सामने जो उडयार है उसके भीतर फटाफट सब बना हुआ खाना, गिलास थाली बर्तन रख दिए गये. उडयार के दक्षिण की ओर तीन पत्थरों से बना चूल्हा पहले से बना दिखा. तुरंत ही बाहर के चूल्हे की लकड़ी, कोयले उसमें डाल दिए गये. बाहर से ऐसा नहीं लग रहा था कि इस खोह में इतनी जगह होगी. अब तो पाया कि सभी लोग उसके भीतर पंसी गये थे. सारे बैग और सामान टेंट के भीतर रखा जा चुका था.
बिजली कड़कने की गर्जना के साथ ही दीप ने दोनों कानों पर हाथ धर लिए थे. “बाप रे. मुझे तो लगा कि कान के पास सुतली वाला बम फोड़ दिया हो. लगा कि आसपास सब थिरक कर चुप लगा गया हो. ये फिर उडयार रह-रह के हिली, लगा कि इसके पाथर हिल रहे हैं और तेज चमक के साथ अपने आस-पास बैठे लोगों के चेहरे दिखाई दे रहे हैं.
अब तो बस घुप्प अंधेरा था. कोने में सुलगते चूल्हे की आग तेज हवा के झोंके के साथ लपट देती और फिर मंद हो जाती. सब दुबक गये हैं. डर भी लग रही है और आश्चर्य भी हो रहा है कि अभी सब कुछ कितना शीतल सुहावना था. उत्तर से दक्षिण तक से अधिक के विस्तार में बर्फ से ढकी अनगिनत चोटियां झिलमिला रही थी. मैं तो इस प्रतीक्षा में था कि कब सूरज की आखिरी गुलाबी सी किरन इन श्वेत हिम श्रृंखलाओं में पड़े और उसे में ट्रांसपेरेंसी में खींच लूं. पर कहाँ? अब तो बादलों की न जाने कितनी परतों के भीतर पंचचूली छुप गई है. सूर्यास्त होने में अभी समय है. तेजी से आ कर बादलों के जत्थे गरज बरस गए और अभी भी उनका ऐसा जमाव है कि घुप्प अंधेरा कर दिया है.
अचानक अब तेज हवाएं चलने लगीं हैं. टेंट फरफराने लगा है. उसे बड़ी होशियारी से एक बड़े घांगल की आड़ ले कर लगाया है इसलिए टिका हुआ है. तेज हवाओं में शोर है. ऐसा लग रहा कि उनका वेग बहुत लयबद्ध है.
तेज हवाओं के साथ धीरे धीरे उजाला होने लगा है.सब सिमटे सिकुड़े बैठे अब हरकत में आ गये हैं.
दूर आकाश की ओर इशारा करते रेंजर साब की आवाज सुनाई देती है, “अब देखिये बादलों का खेल, गरज गए, बरस गए,ये काम खतम तो और ऊंचाई की ओर चल दिए”.
वाकई अपने आसपास जमा सारे बादल अब छंटने भी लगे हैं.सामने हिम श्रृंखलाएं और साफ दिखाई दे रही हैं. ऊपर की ओर बढ़ते बादलों का कालापन अब रुई के घने गोलों में बदलता दिख रहा है. बादलों का एक जत्था छिपला की पहाड़ी की ओर तेजी से बढ़ता दिख रहा है और उसकी रंगत हल्के पीले रंग में घुल रही है. उसके पार की जो पहाड़ियां हैं उनमें रह-रह कर बिजली की चमक दिखाई दे रही है. कवि इसे ही द्युति कहते होंगे.छिपला की पहाड़ियों के ठीक ऊपर रजत रश्मियों का प्रकाश बार -बार दिख रहा है. पीली सी रोशनी धीमे-धीमे बढ़ रही है.
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कैमरा स्टैंड में लगा मैं ट्रांसपेरेंसी खींचने लगा हूं. दूसरा कैमरा दीप के हाथ में आ गया है. सूर्यास्त की बेला है और सामने उजाले के धीरे-धीरे कम होते जाने के अद्भुत दृश्य जिनकी कल्पना भी न थी. अपने गुरु फोटोग्राफी के बादशाह एस पाल साब की याद आ रही है तो साथी कमल जोशी भी. एस पाल तो बस मैन्युअल फोटोग्राफी पर जोर देते. उनकी अपर्चर और स्पीड सेटिंग कमाल की होती. कमल की फ्रेमिंग. बस इन्हें याद कर खींचते जा रहा हूं. अब तो लाइट इतनी मंद हो गयी है कि बस सिलौट शेष रह गया.. वह भी खींच लिया.
इतने बेहतर फोटो मिले जिनको खींचने के उत्साह में नंगे पैर ही भागदौड़ करता रहा. अब स्टैंड से कैमरा निकालने और टेंट तक वापस आने में पता चला कि पैर तो बिल्कुल लकड़ी गये हैं. सामने देखा टेंट के पास चूल्हे में आग खूब सुलग रही है. सोबन आग खचोरने में लगा है और दीप गले में कैमरा लटकाये वहां जमा है. बड़ी कोशिश करनी पड़ी अरड़ हो गए पैरों को उस ठंडी चट्टान से गुजरते चूल्हे के पास लाते. मुझे देख सोबन उठा और मेरे हाथ से कैमरे का स्टैंड ले यहां बैठ जाओ गुरूजी बोला.
तीन बड़े पत्थरों के ऊपर बने चूल्हे पर बड़ा डेग रखा है जिसमें ढक्कन रख ऊपर से एक पत्थर रखा है. चलती तेज हवा के झोंकों के साथ मसालों की खुशबू नथूनों से टकरा रही है. इसकी सूंघ से ही भूख लग रही है. वैसे भी जब से यह यात्रा शुरू की हर समय भूख लगी रहती है.
टेंट के भीतर से डमर दा और संकरू बाहर आ रहे हैं. डमर दा के हाथ में पांच लीटर के आसपास वाला एक पीपा है जिससे निकला द्रव्य रेंजर साब के हाथ में पकड़े बड़े पितव वाले गिलास में उंडेला जा रहा है. कुण्डल दा बड़ी परात में आटा गूंथ रहे. यह उनका शौक है और हर बार वह यह जताते हैं कि सैबो आटा ओल के रख देने से रोटी में वह स्वाद कहाँ जो इसकी खिंचाई कर ऐसा बना देने में है कि परात साफ चमक जाए और सैबो,रोटी बेलने में पलथण न फुके.
लकड़ी का बड़ा सा ठूँठ निकाल डमर दा चूल्हे में डाल देता है. चूल्हे से आती ऊष्मा बदन सेकती बड़ी राहत दे रही है. रेंजर साब गिलास से एक बड़ा सा घूंट ले नीचे तक लटक रहे अपने मफलर को गले में लपेट बाकी हिस्सा पीठ की ओर डाल दे रहे हैं. अभी उनकी दृष्टि बस चूल्हे की ओर टिकी है. रह -रह कर उनके माथे पर बल पड़ते हैं, रेखाएं सिकुड़ती फैलतीं हैं. अब अचानक बगल में बैठे दीप की ओर देख वह बोल पड़े.
“देखिये प्रोफेसर साब. ये चूल्हा देख रहे हैं तीन पत्थरों पर टिका. अब देखिये ऐसा ही नीचे धारचूला भी हुआ. धारचूला का मतलब ही धार से बना चूल्हा हुआ. धार का मतलब तो आप समझने वाले ही हुए. धार हुई पहाड़ी यानी पहाड़ी से बना चूल्हा. अब धारचूला को देखिये जहाँ एक तरफ छाना या कोठेरा की पहाड़ी हुई तो ठीक सामने बंगोबगड़ की सिरकोट पहाड़ी. अब जो ये चूल्हे का तीसरा पत्थर हुआ तो वो कही गई छापरी की पहाड़ी जो दल्लेख की श्रृंखला तक जा पहुंची ठेरी. अब कितना बढ़िया नामकरण हुआ धारचूला यानी धारों का चूल्हा”.
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“वाह. गजब का इंटरप्रिटेशन कर दिया ठेरा हो रेंजर साब…. अब “
“अरे! अभी बात पूरी कहाँ हुई.” उत्साह से बोलते रेंजरसाब के माथे की रेखाएं और गहरी दिखने लगीं.
“सोचो भगवत डिअर! कैसा जो होगा वो महाबली जिसने अपना खाना बनाने के वास्ते तीन तरफ के पहाड़ चुन लिए और ठीक बीच में तट भी हुआ काली नदी का जिसकी बाउंड्री घटफू तक गई और देख़ते देखते ले डूमपानी तक वहाँ बस्ती बस गई. भरी पूरी बसासत जिसके रहवासियों के हाथ में हुनर बसा और दिमाग में कारोबारी समझ”.
“आपने तो पढ़ा ही होगा जाना ही होगा कि पहले तो कुछ भी न हुआ वहाँ. क्या था? बे आबाद गों हुआ जहाँ बांजा पड़ा ठहरा. पर होनी हुई जो दूर दारमा से लोग बाग आये, ब्याँस से फरके, चौदास के मवासे जमा हुए. ये सब लोग लोलंकु पार कर जब यलं कुलं के ताप, वहां आने वाली धूप से बदन सेक न पाए तो इसी घाटी ने सबको ठौर दी. पहले तो लोगों की आवत जावत रहती थी. ऊपर के इलाकों मेंन कड़ाके की ठंड पड़ी तो यहां आ गये. अपने हिस्से की धूप ताप ली. आंग सेक लिया और जब ऊपर बरफ पिघलनी शुरू हुई तो लौट लिए अपनी अपनी ठौर. फिर धीरे -धीरे ब्याँस और दारमा के मवासियों ने जाड़ों में रहने के लिए अपने डेरे डालने शुरू किये.
ब्यास वाले धारचूला बसे तो दारमा वाले मवासियों ने गलाती, कालिका, गोठी और बलुआकोट तक और आगे थँगथो यानी जौलजीबी तक बस्ती बसा ली. अब देखो कितनी तेजी से नीचे के ये सारे इलाके आबाद हो रहे हैं. तिब्बत के साथ व्यापार बंद होने के बाद तो तरक्की की रफ्तार और भी तेजी से बढ़ रही है. हर मुश्किल का सामना करने की ताकत है सीमांत वासियों में.सब छिपला केदार की कृपा हुई. ला हो संकरू, लाकडे और खित चूल्हे में”.
“हां, मैं ला रहा हूं. अब तक तो भुमला तैयार हो गया होगा”.डमर दा उठे और कोने में पड़ी लकड़ी की जड़ को चूल्हे की तरफ खिसका दिया.सोबन ने लकड़ी के कुछ बग्घल डाल चूल्हे में फूक मारनी शुरू की.
“ये भुमला क्या हुआ? खुशबू तो गजब हुई”.दीप की आवाज सुनाई दी.
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“ये खसबू तो “थ्वाया” की हुई मालिको, जीरे जैसा हुआ जो. कड़ू तेल में भात फराई करते हुई लूण, खुस्याणी पड़ने वाले हुए बस. फिर डेग छोप देने वाले हुए. ” संकरू बोला तो कुण्डल दा ने सुधार किया, “डेग का ढक्क्न बंद कर देना हुआ, आधेक घंटे. बीच में पहाड़ी घ्यू मिला फिर बंद कर दो. यही हुआ थ्वापा.
“कभे कभे सैपो” संकरू बोला, “चावल में मडु का आटा घोल कर पका लेते हैं जिसका नाम “फौनो” हुआ. यस्से ही मोटा चावल पीस काले भट की दाल में मिला खूब उबालो तो “डुपका” बन जाने वाला हुआ. आज तो भुमला बना है गरमा गरम. तुर्रु चूख भी हुआ साथ में. खूब खट्टा हुआ ये. आज तो फाफर के आटे की “पुली” भी बनने वाली है “, क्यों हो दा, ठीक बलाया ना मैं.
“हाँ हो!” कुण्डल दा बोला, “ये पुली फाफर के आटे से बनने वाले र्रवाट हुए. जनतार से फाफर का आटा बारिक पीस रख लेते हैं उसे पानी में घोल लेई जैसी बना लेते हैं फिर गरम तवे में डाल उंगली से फैला लेते हैं. बाटी से उलट – पलट सेक लेते हैं. पकते समय पतले हुए बिस्वार से र्रवाट से छोटे छोटे बुलबुले जैसे निकलते हैं.. बड़ी स्वाद होती है पुली.”
“डमर दा तो मीट, गामा, अर्जी और खिमुखोक्च का बहुत ही शौकीन हुआ”.दलबहादुर बोला.
“खिमूखोक्च को भी चूल्हे में जब खूब कोयले रह जाएं तो उनकी आंच में भूना जाता है. ठीक वैसे ही जैसे भुतारा को भूना जाता है”.
ये भुतारा क्या हुआ? दीप ने पूछा.
“बकरी की सुखाई हुई पसली हुई सैबो. ऐसे ऊँचे पड़ावों में इनको खाना जरुरी ही हुआ ताकि बदन सखत रहे”.
“मेरे खाने पीने से तो दूर ही रखना हो अपना ये मीट-भुतारा”. भगवती बाबू अपने आसन से ध्यान पूजा कर उठे और सोबन और उमेद से बोले, “और, इधर आओ रे तुम लौंडों, अब बैठे मत रहो, ये तिरपाल ठीक से अड़ाओ. एकदम तेज हौ चलेगी, बरखा पड़े तो उस बखत मुश्किल हो जाएगी.”
दोनों उठे और तिरपाल के ऊपरी हिस्से में अटकाये बड़े से पत्थर को खिसका के ठीक करने लगे तो फिर बड़ी खुशी से चिल्लाये, “अरे यहां तो ह्यूँ पड़ गया देखो हो भैर…”
बाहर सफेदी की चादर बिछी थी झमाझम ह्यूं पड़ रहा.
“तभी जो में सोचूँ इतना गुम्म कैसे हो रहा?”भगवत बाबू बोले.
तिरपाल को लम्बे डंडे के सहारे अटका दिया दल बहादुर ने. सबकी नजर दूर तक फैली पहाड़ियों की ओर टिक गईं जिन पर तेजी के साथ बर्फ के फाये तपकते जा रहे थे. अब हवा बिल्कुल बंद थी. साथ ही चारों ओर अपूर्व शांति पसर गयी थी.
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“ठीक टेम हो रहा है. खानपिन कर लेते हैं”. दलबहादुर ने कहने के साथ ही थालियां निकालनी शुरू कर दी.”भुमला तैयार है, पुली सिक रही.लो हो डमर दा, थोड़ी थोड़ी काठी बक्खर चखाओ सबको”.
“ये काठी बक्खर क्या हुआ हो?” दीप ने पूछा.
“काठी अखरोट हुआ. तोड़ने में कट्ट होता है. अभी फोड़ -फाड़ कर रखा है. इसमें कौणी भी भून कर डालते हैं. लो चाख कर देखो”.डमर दा ने दीप की हथेली छिले अखरोट से भर दी.
“हूं, स्वाद तो बहुत है, कडक भी..”
“बस एक तगड़ा घूँट चड़काओ, फिर चाबो इसे”.. रेंजर साब भगवती बाबू की ओर देख बोले. भगवती बाबू ने हमेशा की तरह नाक फुलाई और एक मुट्ठी अखरोट हाथ में भर पड़काने लगे
गरमा गरम पुली के साथ भाप छोड़ता भुमला और उसके ऊपर डमरदा डब्बे से काला काला सा घी निकाल डाल रहा था जो भूमले की गरमी से धीरे धीरे पिघल रहा था और गजब की खुशबू बिखेर रहा था.
“ये घ्यू भी उधर धारचूले का होगा हो डमर दा, ससुराल हुई तुमारी व्हाँ”. कुंडलदा बोला.
“हो!वइंss खेड़े पन हुई. कारबार खूब हुआ वइंss”.
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ये खेड़ा क्या हुआ? दीप ने पूछा.
“रेहने वाली जाग हुई हो सैबो. जैसे वहां कुटी वाले आए, डेरे बनाए तो उश्का नाम पड़ी गया कुटी खेड़ा. ऐशे ही नाबी खेड़ा, नप्लच्यो खेड़ा, गर्बयांग खेड़ा, रॉन्गकोंग खेड़ा में उसी जाग के मवासे टिकने वाले हुए. धारचूला तो देखा ही ठेरा अपने तो वाँ घटधार के पास गुज्याल और बुदियाल खेड़ा औरों की बनस्पत भौते नान हुए. यहां वाले जाड़ों में धूलिगढ़ा चले जाने वाले हुए. इशे तंतनती भी कहा जाता है. यहां के मवासे राईसों मिस्लथ भी जाने वाले हुए. नाबी खेड़ा भी नान ही हुआ, छोटा इलाका जहां के लोगबाग काली नदी पार मोती में बस गये. उधर बंगो बगड़ और मोती में छाँगरू और तिँकर वालों ने डेरा डाला”.डमर दा बोलते बोलते रुका तो दल बहादुर खाते खाते रुका और हमारी ओर देख बोला,” हमारे तो सैबोsss, बबा, ठुल बुबू ने इधर धारचूला और उधर काली पार दारचूला की ही बांडरी नापी बस्स. नेपाल पार फरके. ज्यादातर कुनबा बिरादरी बेतड़ी-महाकाली अंचल में बसी ठहरी. दयाप्ता ठाकुरजी भी वोई हुए. तालेश्वर- गणमेश्वर भी अपना हुआ, नागार्जुना भी. दयोताल के धामी वार भी हुए पार भी. सयाने काम धंधे के वास्ते इधर धारचूला फरकते तो यहां बांस-नींगाल, मिट्टी-पाथर, घास-फूस की बनी झोपड़ियों के खेड़े हुए. तब कहां ये सीमेंट रेते का डॉल हुआ, पत्थर मिला इफरात से, मिट्टी से चिन दिया. गोबर की लिपाई फर्श हुआ. धारचूल में आज जहां मल्ली बजार है उसमें दारमा, व्यास चौदास वालों की दर दुकान हुई. बस एक बखत के बाद तो पहाड़-माल से, अल्मोड़ा-गढ़वाल से लोग-बागों की आवत जावत होती गई. काम धंधे बढ़े. राज मिस्त्री मेकेनिक बारबर बुचड़ मुसलिए सब आये. खेड़ों के बीच जो खाली जगह होती उनमें जानवर भेड़ बकरी हुनकरे पाले जाने लगे.ऐसे ही खेड़े फैलते गये”.
अब डमर दा ने बात टीप ली, “पैले के बखत बड़ा मेलजोल हुआ खेड़े में. छोटे-छोटे घर हुए. हर घर के बाहर पटाव हुआ. कोने में सूखी जलाऊ लकड़ी के गट्ठे हुए, ढेर हुआ. बुबू बताने वाले हुए कि पहले तकली, किपांग और पिट्ठी चान से ऊन का काम होता हर घर में खड्डरांच, ठौर रांच का सामान, तहर काठी, ठुल डौल, द्वनि, तप्सिंग, चरखा दिखता तो थूल्पु क्वटरनी काँयु, पांज, खुग्योर, छिज्यु, किपांग भी होते, ऊन के काम के औजार हुए ये, हथियार ही समझ लो. तिब्बत व्योपार के बखत तो दन, आसन, पँखी,छयूँट, कंबल, चुटका, थुलमा, पट्टू, पशम, मफलर, स्वेटर की चौल हुई.यहां से रवाना हुए व्योपारी जब मालु या टनकपुर और नेपाल की मंडी से अनाज और गुड़ की भेली खच्चरों में लाद वापस फरकते तो सारा आँगन घिर जाता. घर में चीज बस्त भरी रहे और त्यार पड़ें तो हर चूल्हे पूरी पके, पकवान बने.
मकर संक्रान्द का मेला लगता जिसे “मंडल” कहा जाता. इससे पहले ही धर कुड़ि की सफाई होती, लाल माट और गुबर से लिपाई होती. गेहूं के खेतों से पौधे उखाड़ उसकी जड़ को गोबर में लपेट अक्षत चन्दन लगा घर की खोली में लगाया जाता. बच्चे तपोनी गंधक के सोते में जा न्हा धो शिब ज्यु के लिए बेल पत्ती लाते. ऐसे ही बड़ी धूम से शिर पंच या श्री पंचमी का त्यार मनाते.
वो जाड़ों में तो दारचूला धारचूला सुबे-सुबे अरड़ पट्ट हो जाता. इतनी याद हुई कि आंग में तात लाने सब नानतिन खूब भागा दौड़ी करते. जब घर से आवाज लगती कि लला कलं मज्या पी लो तभी गोठ के भीतर घुसते.
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सूरज की किरणे जब दल्लेख के पहाड़ से अंवलादयर पुज जाती तो ठंड से कूड़ कुड़ा रहे हम सभी नानतिन अपने अपने गोठों से बाहर निकल पड़ते और खूब जोर से धाल लगाते, टिटाट मचाते,
“आँवला दंयर नी कज्य, जिस्से रहक्म तिंगसौ”.
सब बच्चे इतनी बार दोहराते चिल्लाते जैसे कि सूरज आज पहली बार उग रहा हो”.
अपनी बात खतम करते डिमर दा के चेहरे पर अपूर्व संतोष दिखा. बालपन की यादों ने उन्हें गीला कर दिया था.
धीरे-धीरे कुछ उजाला बढ़ता सा लगा तो कुण्डल दा ने सामने ढका किर्मिच का पर्दा उठाया.सब कुछ बर्फ से ढका था और अच्छी खासी धूप खिल आयी थी.तीन चार घंटे एक ही जगह में ठुँसे लधरे अब सभी हरकत में आए.सूर्यास्त में थोड़ी देर थी. बाहर निकले तो जूते बरफ में घप्प से घुसने लगे.
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सामने सारी चोटियां साफ दमक रहीं हैं और ऊपर आसमान बादलों से भरा. इससे बढ़ फोटो खींचने के नजारे और क्या होंगे.हिम से ढकी चोटियों में न जाने आसमान के किस कोने से छेद हो सूरज की आखिरी किरण पड़ रहीं कि धीरे धीरे गहराती हुई लाली पसर गई. डमरदा और दल बहादुर मेरे साथ साथ ही मुझे फोटो खींचता देख रहे थे, बरफ से ढकी असमतल हो गई उस जगह में सहारा भी दे रहे थे.उनकी तरफ कैमरा घूमता तो शरमा भी जाते पर पोज जबरदस्त होती.
“ऐसे इलाकों में खूब जड़ी बूटी होती है गुरूजी. निकालने को बड़ा सीप चाहिए.”दल बहादुर ने बताया.
“कितने समय डटे रहते हो आप इन बुग्यालों में ऊँचे कठिन इलाकों में दूर दूर तक जड़ी बूटी खोजने के लिए?”
“साल में चार पांच महिने तो यहीं कट जाते हैं. नीचे गाँवों में ऐसे बहुत सयाने हैं जिनको इस बात का सीप होता है कि किस दर्रे में, किन किन डाने कानों में कौन से जड़ी मिलेगी”. डमर दा बोला.
“खाली खोद देना ही नहीं हुआ, बड़ा अंदाज चाहिए कि कौन सी कंद कब कितनी निकालनी ठीक रहे ताकि अगले फेरे तक फिर मिल सके.” दल बहादुर ने बताया.
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“साल भर में कितनी जड़ी बूटी खुद बिक जाती है?”
“हम लोग खोदते नहीं. यहां के मवासे भली के जानते हैं कि कब किस टेम इन्हें निकलना है. जो माल इकट्ठा रहता है उसे बटोर जानवरों में लाद हम ले आते हैं धारचूला,जौलजीबी तलक, जो भी बाट पकड़ लिया उस हिसाब से. फिर छंटाई कर धो-धा, सुखा कर कट्टे बोरे में पैक कर रख लेते हैं. असली काम तो मण्डी तक पहुँचाना हुआ. टनकपुर, रामनगर, हरिद्वार, सहारनपुर और दिल्ली हर जगह आड़ती हुए. लाला लोग हुए फिक्स. सब रेट वगैरह फिक्स ही रहता है. उसी से हमारा दानापानी निकलता है. हमें जो पेमेंट मिलता है उससे सबका हिस्सा निकलना हुआ, आवत-जावत का खर्चा हुआ. जो बचा उसे हम मिल-बाँट लेते हैं. कभी ज्यादा कभी कम चलता रहता है. कभी अटक-बटक आई तो अपने लाला लोग मदद करते हैं. गर्ग गुपता अगरवाल हुए ज्यादा. डमर दा बोला.
“अब बड़ी रोक-टोक हुई. बेहिसाब खोदने वाले दुष्ट भी हुए. तभी सरकार ने कई जड़ियों के दोहन को रोक दिया है. जंगलात वालों के कानून हुए. लइसेंस रवन्ना कागज पत्तर.पतरोल, पटवारी, ऊपर से पुलिस की चैकिंग. सबको मालूम हुआ कहाँ क्या कितना जा रहा. कोई नया सैब आ जाये तो कुछ नई गजर-बजर. हफ्ते पंद्रह दिन में फिर वोई”. दल बहादुर ने तल्ख़ हकीकत बयां की.
बर्फ से ढके इन पहाड़ों के बीच फायदे और मुनाफे को ले अजीबोगरीब गठजोड़ पता चलते हैं. रेंजर साब कई बार इशारा कर चुके हैं कि माल पानी बटोरने की यह फेहरिस्त बड़ी लम्बी है. खून खच्चर भी ज्यादा हो चले हैं.अब ज्यादातर घपलों की जड़ में आ गई है कीड़ा जड़ी. खोदी तो ये कब से जा रही. पहले हुणिये लाते थे अदद के हिसाब से बेचते रहे. बड़े जटिल रोगों की दवा बताई गई.वैद्य लोग भी इसको परखे पर महिमा मुखाग्री फैली. इसका असल नाम पड़ा,”यरसा गो मवों”. चीन के जड़ी बूटी बाजार में तो हर बरस दाम दोगुन, बीस गुन, सौ गुन की रफ्तार से बढ़ रहा. कीड़ा जड़ी पहले भी बिकती रही पर ताकत और जोश का ऐसा ठप्पा इस पर लगा कि इसकी खोद खाद में मार काट मच गई. सब ऐरे गैरे धात-नामर्दी वाले फिराक में रहते हैं कि कैसे मिले?अब तो क्या कहो नेपाल से दिल्ली से इसे खोद-खाद, खरोड़ ले जाने वाले पहुंच जा रहे हैं. खून खच्चर लूट पाट होने लगी है.
रेंजर साब बता रहे कि अब तो गाँव गाँव के लफद्दढ़ निकल पड़े हैं बुग्याल खोदने. अपने देखा होगा न देवल थल से बागेश्वर के इलाके में खड़िया मेग्नेसाइट खोदने वालों का हाल. किल्मोड़े की जड़ भी खोद खोद दिल्ली की थोक बाजार पहुँच गई. जो मिले उसे काटो खाली अंग्रेजों ने थोड़ी किया, आज वालों ने तो ऐसी मिलीभगत की कि तमाम खेत बांजे कर दिए, खड्डे ही खड्डे दिखते हैं अब.वैसा ही हाल अब उच्च हिमालय में दिखाई दे रहा. सब सोच रहे कि नोटों की बारिश होगी. बड़े-बड़े आका हैं सब खेल में. वार पार से स्मगलिंग का खेल भी पुराना हुआ. कभी नेपाल के रास्ते सोना आया, फिर क्रीम, लिपस्टिक, छाता, चप्पल चली, बिजली का सामान आया, इलेक्ट्रॉनिक्स वल्ला पल्ला. बड़ी बड़ी कोठियाँ तन गईं खेती पाती की जमीन में, दुकानें दर खुलतीं गईं. नशे का कारोबार अलग हुआ, चरस गांजा, रक्सी. अब देखिये ये कीड़ा जड़ी का खेल तो अब खून खच्चर से भरा हो गया है. इधर की ही बात है कि इतनी ऊँचाई पर अपने हाड़ गला किलो पांच किलो कीड़ा जड़ी बटोर के नीचे पहुंचे तो लूट हो गई. ऐसे कितने ही किस्से हो गये जिनकी रपट भी दर्ज नहीं होती. कितनों को खुकरी च्याँप काली गोरी में खित दिया कोई हिसाब नहीं हुआ”.
“अभी शिलाजतु भी बड़ी प्रसिद्ध हुई, नेपाल वाली. पिथौरागढ़ खूब लाते हैं डोटियाल. माचिस दिखा तार खींच बताते हैं कि यही है प्योर माल.” दीप बोला.
“सर जी, सब नकली माल भिड़ा उल्लू भिड़ाते हैं. अब ताकत सेहत बनाये रखने की सभी की हौस रहती है. उसी का फायदा उठाते हैं ये. दिखने में बड़े भ्यास से होंगे पर भारु समेटने में एकदम चंट बुद्धि”,कुण्डल दा बोले” भारू त समझते होगे न भारतीय रुपया हुआ, इसकी कीमत नेपाली रुपे से भौत ज्यादा हुई. नेपाल में दोनों चलते हैं”.
“प्रोफेसर साब, असली माल तो पहले ही बड़ी फर्म खरीद लेती हैं. फिर शिलाजतु तो कई पेटेंट दवाओं के फॉर्मूले में शामिल हुआ”. रेंजर साब ने बताया. “अब वार हो या पार, सौदागर हर माल के हर जगह हुए. बहुत ही ऊँची दुर्गम चट्टानों से निकलता है शिलाजतु का पत्थर. कितनी रस्सी बांध लोहे की सरिया में अड़ा चढ़ते हैं वहां तक. फिर डोके को पीठ पर लाद उतरते हैं. अब होती है इसकी प्रोसेसिंग. बड़े कड़ाहों में गाय के गोंत में इसे पका जो इसके पत्थर पकने से ऊपर काली मलाई जैसी तैरती है उसे जमा लेते हैं. गीली तरल भी रखी जाती है. ये फेरी वाले तो बस दोयम घटिया माल ले के ठगते हैं. साले गुड़ हुड़ जला के वैसा ही रंग रूप देते हैं. असली माल तो ऊँची काली चट्टानों में से इकट्ठा होता है. अब देखिये नदी भी काली, गोरी, धौली हुई तो पहाड़ भी एक तरफ आग्नेय हुए तो दूसरी ओर बर्फ से लकदक. आदमी ने हर जगह अपने मतलब की चीज – बस्त खोज ली. यहां आते भी छिपला के दूसरी ओर काली भुजंग चट्टान दिख रहीं थी ना और यहां ये ही बरफ से ढके पहाड़ हैं. भोले की नगरी हुई ये. नंदा का वास हुआ. शांति से भरा”. रेंजर साब इस समय ऊँचे पहुंचे दार्शनिक की मुद्रा में मुझे दिखे. खट्ट से मैंने उनके क्लोज अप ले लिए.
कैमरा थमा तो उनकी भंगिमा ही बदल गई. और बात भी, “देखो, इन बरफ से ढकी चोटियों इन शांत वीरानों में भी गोलियों की ठाँssय सुनाई देगी. कभी भालू घेरा जायगा कभी बाघ. अब सुनी सुनाई चली आ रही कि भालू की पित्ती से कई कठिन रोग कट जाते हैं सो खरीदने वालों की कमी नहीं जो मुंहमांगा दाम गिन देते हैं. बाघ हुआ यहां हिम तेंदुआ हुआ जो कहा जाता है, “च्यान्गु” उसे भी मारा जाता है खाल के वास्ते. गोली नहीं चलाते उस पर, खाल जो खराब हो जाएगी. उसे जहर से फंदे से घोटते हैं. उसकी भी हड्डी-नाखून, चर्बी-दांत सब बिकते हैं.हड्डी के चूरे को नामर्दी दूर करने वाले फार्मूलों में डाला जाता है. ऐसे ही कस्तूरा मृग हुआ उसके पेट की थैली से कस्तूरी निकलती है. राजे रजवाड़े नवाबों के जमाने से चलन हुआ, आज लाला सेठ हुए, कमी थोड़ी उनकी जो मुहमाँगा दाम गिन देते हैं. ऐसे ही कितने जानवर पंछी वो मोनाल हुआ कितना खूबसूरत सब बड़े पेटों में भारी मोल चुका हज़म हो जाता है”.
बहुत बड़ा बाजार है इस हिमालय के जीव जंतुओं का,पोचिंग का बड़ा कारबार है. पूरी सिंडिकेट है. कितने ही हैं यह सब कण्ट्रोल करने वाले. इनमें बड़ा खिलाड़ी कोई संसारचंद है. जानकारी तो सबको है. वो कहाँ रहता किधर से ऑपरेट करता सब तार जुड़े रहते हैं.अब इतनी बड़ी काली नदी हुई. बगल में नेपाल हुआ. सब वार-पार का खेल हुआ. शिकारी सब यहीं से चुने जाते. बोली, चेहरा-पहनावा सब मिलता जुलता. यहां से माल गिराया और चाहे दिल्ली हो या पार की मण्डी सब धागे बंधे हुए हैं.
“इधर तो गुरूजी स्कूल-कॉलेज के लौंडो मोंडों तक ये चरस-गांजे का अमल बुरी तरह फैल गया है. सेना में पुलिस की भर्ती में हमारे इलाके के लड़के दौड़ कूद खेल में हमेशा आगे रह बाजी मार ले जाते थे. अब तो कॉलेज की हॉकी फुटबाल टीम के लिए खिलाड़ी मिलने मुश्किल हो रहे हैं. हमारे स्पोर्ट्स टीचर लल्लन सर परेशान रहते हैं इसी बात को ले..”
सोबन अपनी बात खतम भी न कर पाया था कि रेंजर साब को झांका चढ़ गया, “अरे, कैरियर बना इनका इस्तेमाल हो रहा. नेपाल से ऐसा माल खूब आ रहा. औरतें घास का पूला, लकड़ी के गट्ठर ला रहीं उसके भीतर आ रहा माल. पेट के ऊपर पिछोड़े से बांध के ला रहीं. रोज की आवत जावत हुई. काली गोरी के पुल पर रोज की चैकिंग हुई. जौलजीबी में पुलिस चौकी की जाँच हुई. सब खाने कमाने के सोर्स हुए. कितना माल तो काली नदी तैर कर वार पार हो जा रहा..”.
सुबह झटके से नींद टूटी. आँखों में सूरज का तेज प्रकाश. देखा डमर दा टेंट के बाहर शिलाखंडो से टिकाए मोटे तिरपाल को हटा रहा था. आस पास देखा बस मैं ही लुड़का पड़ा हूं, बाकी सब बाहर निकल गए हैं. चूल्हे में जलती लकड़ियों की खुशबू नाख से टकरा रही है. झटके से आलस छोड़ बाहर निकल आया.
बिल्कुल साफ आसमान था तो नीचे सब बर्फ से ढका. पूरी गर्दन घूमा के देखा तो अपने भव्य स्वरूप में दिखी पंचचूली. श्वेत दुग्ध धवल इस प्रतिरूप के साथ सूरज के ताप से ठंडी लहर को अकुलाहट देती धीमे धीमे जंगली गुलाब सी रंगत बदलती हवा की सरसराहट के साथ सूरज की रश्मियां झिलमिल करती,जगमगाती, हाथ के रोम कूपों में, नाक में, गले के पास,कनपटी में ऊर्जा का संचार करती लगीं. लगा कि कोई लहर उतर रही है, भीतर कहीं कुछ मचल रहा है.
धरती धीरे-धीरे डोल रही है जो अपने भीतर छुपी हरीतिमा के ऊपर बिछ गई सफेदी की चादर को पलट देने के लिए बेकरार है इस जतन से कि कहीं कोई भी सिलवट न दिखे.अपनी पूरी श्रृंखला को पूरी तरह से दिखा रहा हिमालय यहां तक कि दोनों छोर के कोनों के बर्फ से लकदक शिखर भी साफ दिख रहे हैं. इनके बीच में पसरी पंचचूली और छिपलाकोट की पूरी श्रृंखला जैसे याद दिला रही है कि मैं ही सब कुछ हूं यहां. मैं ही ब्रह्म स्वरूप हूं. मुझसे ही सब कुछ यह सारा जगत उत्पन्न हुआ है. नीचे- ऊपर, अगल-बगल सब मैं ही हूं. ये पंचचूली और उसके उत्तर पूर्व दिशा की ओर विस्तृत दारमा घाटी के ऊपर के शिखर, पूर्व की ओर फैली नेपाल की चोटी आपी और दाहिनी ओर नाजुरी कोट पूरी तरह झिलमिलाता प्रकाश मान प्रतीत हो रहा है. नाजुरी कोट इस पूरे छिपलाकोट के परिसर का सबसे उन्नत शिखर है. इसे ही छिपला के राजा का निवास कहा गया है. ऐसा महसूस हो रहा है कि यहां से अव्यक्त आनंद की रश्मियां फूट रही हैं.
अब यहां से आगे बढ़ना है और पहुंचना है केदार कुंड. रेंजर साब कह रहे हैं कि यहां से आगे चलने की असीमित ऊर्जा इस शक्ति पीठ से स्वयं ही प्राप्त होती है. जैसे जैसे आगे बढ़ रहे हैं आगे के इस दुर्गम पथ पर कड़ाके की ठंड और सर पर पड़ते तेज घाम के बाद भी ऐसा महसूस हो रहा है कि प्रकृति का ऐसा स्वरूप तो पहले कभी देखा ही न था. हर अगला बढ़ता कदम बस आगे बढ़ते जाने और आँखों के सामने के हर दृश्य को कुछ नया सा बना रहा है. जो भी शक्ति यहां कण -कण में व्याप्त है अपने संसर्ग से वह यही संकेत दे रही कि मैं ही हूं सब ओर हर दिशा में. मैं सर्वव्याप्त हूं जो भी कुछ दिखाई दे रहा जो कुछ भी अनुभव हो रहा जो भी मन में अकुला रहा उसमें मेरी शक्ति निहित है. साफ ऐसा लग रहा कि यहां आते ही शरीर एक अनोखे उल्लास से भर गया है. विराट छिपला की की दृश्यावलि ने सम्मोहित कर दिया है. ऐसा क्या आकर्षण है जिसने सबको भीतर से कहीं ऐसा बांध लिया है कि सब चुप हैं बस चले जा रहे ऊपर की ओर जहां हर मोड़ के बाद कुछ नया सा अनुभव है.गहरा गया मौन है.
जैसे-जैसे धीरे-धीरे ऊपर की ओर हम एक कतार में ऊपर की ओर बढ़े जा रहे थे दक्षिण की ओर से कोहरे की एक पर्त हिम से ढकी चोटियों को ढकती दिखने लगी थी. देखते ही देखते दक्षिण पश्चिम के शिखरों के ऊपर बादल छाने लगे. बादल बड़ी तेजी से पूरी घाटी को घेरने लगे. बादलों का एक जत्था तो सूरज के नीचे से ऐसा गुजरा कि उसकी छाया से अँधियारा सा उभरने लगा. हम सब भी एक शिला के कोने तक आ पहुंचे थे.
“बस आज तो यहीं रुकना होगा”. दलबहादुर बोला. सबके चेहरों में सहमति दिखी.
छिपला केदार अंधकार में विलीन होने लगा, आश्चर्य तो यह कि चांदी की एक पर्त सी बादलों के पीछे मुकुट सी चमक रही थी.
(Chipla Kakri Kund Jyunli Temple)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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