कॉलम

“चांचरी” की रचनाओं के साथ कहानीकार जीवन पंत

नैनीताल रईस होटल में रहते थे, गोरखा लाइन हाई स्कूल के नीचे, कृष्णापुर जाने वाले रास्ते के बायीं ओर. कोई बारह-तेरह साल की उम्र रही होगी. बाबू को देखता जो कला कृतियों के साथ किताब और पत्र-पत्रिकाओं से घिरे अपने कमरे के एक कोने में एक जगह दरी के ऊपर बिछे कालीन में मुंशियों वाला कलमदान लगाए चौखा मोड लिखते रहते. बीच-बीच में चित्र बनाते. ईजा और जया दी उनको बड़े गिलास में चाय देतीं रहतीं. बाबू हमेशा खुश रहते. उनके चेहरे में मुझे हमेशा अद्भुत संतोष दिखता. खाली बैठे तो मैंने उन्हें कभी देखा ही नहीं. कभी मिट्टी में रुई मिला छोटे डंडो की मदद से मूर्ति का ढांचा बनता, फिर उसकी बारीकी, उसका आकार उभरता. जब वो सूख जाती तो उसमें रंग भरा जाता .लिखते बखत भी वह कागज में रेखा चित्र बनाते. खूब लोग-बाग आते घर में तो बाबू की बातें अनोखी होतीं नाटक नौटंकी की, कथा कहानी की. बस जो पढ़ा जो देखा उसे लिख डालने की. कागज भरते जाते. उनमें काट पीट होती. फिर लिखते. साफ सुथरी लेखनी में. लिखते-लिखते कहीं खो जाते.
(Chanchree Book Review)

मैंने भी एक कहानी लिख डाली, जादू का अनार.1953 की बात है. तब मैं हाई स्कूल में पढ़ता था. ये बच्चों की कहानी थी. कहानी पढ़ना मुझको खूब अच्छा लगता. बाबू सुनाते थे तरह तरह की कहानी. राजा-मंत्री, गुरू-पुरोहित, सिपाही-जनता की कहानी, राक्षस-भूतप्रेत की कहानी, देश-विदेश की सैर वाली गल्प. ईजा के मुँह से सुनी परी की कहानी, चंदा मामा की कहानी, गोल-गोल गुलगुले की कहानी. मुझे और जया दी को खूब मजा आता.

अपनी कहानी जब बाबू को दिखाई तो वह बड़े खुश हो गए. उन्होंने कई जगह उसकी भाषा ठीक की. कहा इसे फिर से लिख अब छपने के लिए भेज दे. उनके कहे मुताबिक मैंने उसे बाल पत्रिका ‘मनमोहन’ में भेज दिया. बात आई-गई हो गई.

रईस होटल के बगल ही गोरखा लाइन स्कूल का खेल का मैदान था. दिन के बखत हम खेल रहे थे कि मेरा जिगरी दोस्त मंटी चिल्लाते हुए आया और हाँफ्ते हुए मुझसे बोला कि ले जीवन तेरी चिट्ठी आई है.

मेरी चिट्ठी? कहाँ से जो आई होगी?

चिट्ठी लिफाफे से निकाली.

अरे! ये तो इलाहाबाद से आई है, मित्र प्रकाशन इलाहाबाद से जिसमें लिखा है कि मेरी कहानी पत्रिका में छपने के लिए स्वीकृत हो गई है. मंटी चिल्लाया.

जादू का अनार क्या छपी ऐसा कुछ मेरे भीतर जाग गया कि फिर मैंने कई कहानियाँ लिख दीं. मनमोहन बाल पत्रिका में छपती रहीं, माया जाल, मंत्री पुत्र और भी कई.सब बच्चों की कहानियाँ.

बाबू नाटक लिखते थे. लिखने के साथ वह बाहर भी खूब जाते. कभी बरेली, कभी बॉम्बे, कभी दिल्ली कभी पूना. कभी हमको भी ले जाते. अब मुझे भी नाटक का शौक चढ़ा. काफी नाटक किये. बाबू का लिखा कॉमेडी-सस्पेंस नाटक था, “ख़ूनी लोटा”. उसमें लम्बोदर की मुख्य भूमिका मैंने ही की थी. वह नाटक पेट पकड़ हंसा देने गुदगुदी करने वाले कथ्य से भरा गजब तो था ही, मेरी भूमिका भी लोगों को खूब पसंद आई. साठवें दशक में शारदा संघ नैनीताल द्वारा ऑटम फेस्टिवल में नाट्य प्रतियोगिता कराई जाती थी . 1962 में शैले हॉल में हुए नाटकों में मुझे बैस्ट एक्टर का पुरस्कार मिला.
(Chanchree Book Review)

विष्णु प्रभाकर के नाटक “दो किनारे में मैं कवि की भूमिका में था.एक ओर भावनाओं का जग तो दूसरी ओर संपन्न बाहुबली जिनके बीच त्रासद उत्कर्ष की ओर जाता कथानक जिसमें घिरी है नायिका. ऐसे ही जगदीश चंद्र माथुर का, “भोर का तारा” भी किया.बाबू यानी गोविन्द बल्लभ पंत का लिखा, “परदा तोड़क क्लब” हास्य व्यंग के साथ कई कुप्रथाओं को तोड़ने वाला संदेश था. बाबू की खासियत थी कि वह हंसी मजाक में छोटी-छोटी बातों में रस घोल बड़ी गहरी बात कह जाते थे.उनके इतिहास से उठाए कथ्य हमारी शौर्य गाथाओं, पराक्रम से अपनी धरती का मोल चुकाने वाले युग पुरुषों की वीरता और बलिदान की ऊर्जा से भरे कथानक होते थे. एकांकी लिखते जो आम घट रही घटनाओं से शुरू हो फिर किसी विकृति पर प्रहार करते थे . उनके नाटकों का कैनवास काफी व्यापक था.सामाजिक मुद्दों के साथ भारत के इतिहास की झलकियां दिखाता. इलाहाबाद उपेंद्र नाथ अश्क़ से बाबू की दोस्ती थी जिनके दहेज की कुप्रथा पर लड़की के विरोध का सशक्त नाटक, “रीढ़ की हड्डी” में मेरी मुख्य भूमिका रही. डी एस बी कॉलेज, नैनीताल में पढ़ते, फिजिक्स से एमएससी करते इस दौर में पंद्रह नाटक तो किये ही होंगे.

इसी डीएसबी महाविद्यालय में तब इंटर कॉलेज भी था. 1965 से 1972 तक मैं यहां भौतिक विज्ञान में प्रवक्ता हो गया. यहीं मेरे लेखन मेरे साहित्य की समझ को नए विस्तार दिए तारा चंद्र त्रिपाठी ने जो पढ़ाते तो हिंदी थे पर संस्कृति समाज और इतिहास पर उनकी गहरी पकड़ थी. वह ही थे जिन्होंने मेरी साहित्य की समझ को अनगिनत विस्तार दे दिए. भौतिक शास्त्र की ऊर्जा व गति को संवेदना व स्पर्श का उत्प्रेरक मिला.

जो मेरा यह पहला कहानी संग्रह है “चांचरी” यह तारा चंद्र त्रिपाठी की प्रेरणा और लगातार मुझे लिखते रहने के प्रति दिए गये प्रोत्साहन से प्रकाशित हो पाया. 1972 से उत्तर प्रदेश सिविल सेवा में आने के बाद तो दिनचर्या में ऐसा बदलाव आया कि आम जीवन से जुड़ी घटनाओं और उनमें उलझे लोगों की कई-कई घटनाएं बार बार मुझे कुछ नया लिखने को बाध्य करतीं पर उन्हें पूरा कर पाना और अपने लेखन से संतुष्ट होना मेरे लिए संभव न हो पाया. सीतापुर में एसडीएम था तब राजेंद्र अवस्थी ने मुझे सुझाया कि ऐसा अक्सर होता है कि चौबीसों घंटे कार्य भार का तनाव रचना को पूरी तरह सामने नहीं रख पाता . तब जो भी विचार दिमाग पर हावी हो रहे है उसे डायरी में नोट करो. जब भी अवसर सही आएगा ये संकेत उसे रचना का रूप देने में देर नहीं करेंगे.

सिविल सेवा में आया तो चुनाव आए. चुनाव में प्रशासन चौतरफा घिरता है. काम का बोझ रहता है. इस काम से परे व्यवहार में जो समाज की दशा का अधोपतन महसूस होता है वह भीतर से बहुत हिला देता है. एक तरफ जातिवादी व्यवस्था है. बाहुबलियों का वर्चस्व है. रेवड़ी खाओ गरीबी हटाओ का मूल मन्त्र है जहां हरे-नीले नोट पर मतदाता रुख पलट देता है. अलग अलग दलों के अलग-अलग राग हैं. जनता को निछावर करने वाले प्रलोभन हैं. नोटों से भरी अटेचियां कैसे बंटती हैं. अलग-अलग रंग के झंडे कैसे ख़ूनी खेल कर तिरंगे की दुहाई देते हैं यह सब मैंने बहुत करीब से देखा.

मेरा सिविल सेवा का अनुभव मेरे भीतर कुछ रचते रहने का बोध गहरा करता ही गया. थोड़ा बहुत मैं लिखता रहा. लिखने के संयम और रचना कर्म की एकाग्रता पर मैंने बाबू की जीवन चर्या देखी थी, उससे प्रभावित तो था ही. रोज वह सुबह चार बजे उठ जाते. संध्या, ध्यान की प्रक्रिया में उनका योग तो लेखन ही था. कहते बस एक दिन में कम से कम छः पेज साफ सुथरे कर लिख लूँ तो चैन आए. इस लेखन के पीछे उन्होंने बहुत संघर्ष किया था. जब इसमें हाथ सधा तो एक पेज लिखने का मेहनताना डेढ़ रुपया मिलता था.
(Chanchree Book Review)

बाबू 1944 में ही रानीखेत से नैनीताल आ गये थे. नाट्य लेखन में उनकी दक्षता से राधेश्याम प्रेस बरेली के राधेश्याम कथावाचक से उनका संपर्क बढ़ा. वह गीतात्मक नाटक लिखते. बाबू ने उनके नाटकों में अवधी से हट हिंदी में संवाद लिखे. राधेश्याम कथावाचक चाहते थे कि अब नाटकों से हट एक फ़िल्म बनायें जिसके संवाद लिखने का दायित्व उन्होंने बाबू को दिया. फ़िल्म बनाने के तामझाम और होने वाले खर्चे को लेकर राधेश्याम कथावाचक के बेटे सहमत न थे.वह बस यह चाहते थे कि नाटक जारी रखे जाएं. ऐसे माहौल में जब फ़िल्म बनने की कोशिश खतम होने लगी तो एक दिन राधेश्याम जी ने बाबू को बताया कि बम्बई के पृथ्वी थिएटर्स के मालिक पृथ्वी राज कपूर कानपुर आए हैं सो तुम उनसे जा कर मिलो.

राधेश्याम कथावाचक के लिए लिखी स्क्रिप्ट को पृथ्वी राज कपूर ने पढ़ा. तुरंत उन्होंने बाबू से कहा कि वह पृथ्वी थिएटर्स के लिए अलग से नाटक लिखें. उन्हें बॉम्बे आ लिखने का प्रस्ताव मिला. बाबू ने उनके लिए नाटक लिखे जिन्हें हफ्ते में एक-दो दिन ओपरा हाउस आ पृथ्वी राज सुनते थे. बाबू को पृथ्वी थियेटर ने अपने पहले नाटक के लिए तीन हजार रूपये में अनुबंधित किया.

इसी थिएटर में पहाड़ के ही जगदीश पंत एक्टर थे. वह बाबू की लेखन शैली से बड़े प्रभावित हुए. वह एक फ़िल्म मदमस्त बनाने की योजना में थे. उन्होंने बाबू को इस फ़िल्म के संवाद लिखने को दिए. पृथ्वी थिएटर को नाटक लिख वह दे चुके थे और अभी पृथ्वी राज कपूर ख़्वाजा अहमद अब्बास के लिखे नाटक,’गद्दार’ में व्यस्त थे. उधर पूना जा मदमस्त फ़िल्म बनी तो सही पर चली नहीं. तभी बाबू को पता चला कि साहित्यिक पत्रिका “धर्मयुग” के संपादकीय विभाग में एक पद रिक्त है. बाबू वहां गये व उसके संपादक डॉ हेम चंद्र जोशी से मिले. संयोग ऐसा हुआ कि जोशी जी उसी दिन धर्मयुग छोड़ अन्यत्र जा रहे थे. उन्होंने सत्यकाम विद्यालंकार से बाबू को मिलाया. धर्मयुग में काम करते पृथ्वी थिएटर्स से जुडा रहना भी संभव था.
(Chanchree Book Review)

तभी हिंन्द साइकिल के मालिक गोपाल नेवटिया ने साहित्य पत्रिका, “नवनीत” निकाली. इसके संपादक सत्यकाम विद्यालंकार नियुक्त हुए और बाबू सब एडिटर. स्वतंत्र लेखन की चाह में बाबू 1953 में नैनीताल आ गये और 1958 तक यहीं रहे. मेरी लिखाई -पढ़ाई व सोच समझ के किशोरावस्था वाले इस दौर में उनके अनूठे अनुभवों व संयमित लेखन में डूबे अनुराग का बड़ा प्रभाव पड़ा. जहाँ भी वह रहे वहां उन्होंने हमें घुमाया . वह खूब विस्तार से एक एक बात का वर्णन करते.उनकी बात भी बिम्ब और चित्र से भरी महसूस होती. हर किसी से हमें मिलाते. नैनीताल में प्रख्यात कवि लेखक आते रहते. बाबू का उनसे घनिष्ठ सम्बन्ध बना रहता. मुझे याद है नैनीताल से कुछ पहले ताकुला गांव में प्रख्यात कवियित्री महादेवी वर्मा रहीं थीं जिन्हें नैनीताल के साहित्य अनुरागी श्री गोविन्द साह सेठ ने अपनी जमीन दे दी थी. यहां रह महादेवी जी की वह निवास स्थली बड़े साहित्य समागम का केंद्र बन गई. महादेवी जी ने बाबू को उसका सचिव बनाया जिसके लिए उन्हें सौ रूपये प्रति माह का मानदेय दिया जाता. महादेवी जी वहाँ कन्याओं का स्कूल भी खोलना चाहती थीं. कालांतर में एक अन्य नामी लेखक द्वारा वहीं जमीन पाने की इच्छा ने उनकी इस महत्वकांक्षा पर विराम लगा दिया.

1958 में बाबू का सम्पर्क श्री जगदीश चंद्र माथुर से हुआ जिन्होंने बाबू को ऑल इंडिया रेडियो के सोंग एंड ड्रामा डिवीज़न में नियुक्त कर दिया.1972 तक बाबू यहीं रहे और इस दौर में उन्होंने सामाजिक समस्याओं के साथ कई ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित नाटकों का लेखन किया जो सभी छपे भी.

1972 में मैं भी सिविल सेवा में आ चुका था. इस दौर तक के मेरे लेखन में इस परिवेश का गहरा प्रभाव पड़ा.इस दौर में देश व विदेश के साहित्य को जब भी समय मिला खूब पढ़ा. फिर लम्बी सरकारी प्रशासनिक सेवा से मुक्त होते हल्द्वानी अपने निवास में रहना संभव हुआ. बाबू अब भी रचना कर्म में संलग्न थे. बार बार मुझसे इब्सन के नाटक पढ़ने को कहते जो उन्हें बहुत प्रिय था. ऐसे ही जेम्स जोएएस व अन्य कई नए लेखक भी जो प्रयोग धर्मी थे. अभी भी वह महात्मा बुद्ध पर नाटक सिद्धार्थ लिखने में जुटे रहते. वृद्धावस्था के तकाजों से यह पूरा न हो पाया.
(Chanchree Book Review)

 जब मैं इंटर कॉलेज में प्रवक्ता भौतिकी था तो तारा चंद्र त्रिपाठी जी ने मेरी कहानी ‘कलमुँहे का मोल’ पढ़ी. उन्होंने कहानी की तारीफ के साथ मुझसे कहा कि मैं लगातार लिखते रहूं. नैनीताल कॉलेज में उनकी संगति रही.मेरी लेखन प्रवृति भी नए आकार लेती रही. प्रशासनिक सेवा में जाने के प्रयास भी जोरों में थे. चला भी गया. अपने उसूलों में डटे रह हर दबाव का मुकाबला किया. कर्तव्य निर्वाह होता रहा. अवसर, सुविधा, समझौता और तटस्थता ये ही हैं चार रास्ते.प्रशासन में रहते मेरा लेखक लम्बे समय तक उदासीन ही बना रहा. जब सेवानिवृत हो हल्द्वानी सुभाष नगर अपने आवास आया तो वहीं समीप रौतेला कॉलोनी में बस गये त्रिपाठी जी का सान्निध्य फिर मिलने लगा. उनसे सम सामयिक हालत पर, साहित्य पर संस्कृति के अवधान पर हो रहे आघात पर खूब संवाद होते.वह मुझसे बस यही चाहते कि ये सब अब मैं लिख डालूं. कहते कि अब तक जो सब लिखा है उसे बटोरो किताब का स्वरूप दो.

किताब छपना लिखने से अधिक दुष्कर है. इसके लिए जो योग्यताएं होनी चाहिए उनका अभाव अपने भीतर मैंने लगातार महसूस किया. अब तो किताब छापने के कई पैकेज हैं. जमे जमाए प्रकाशक उन लेखकों को ही तरजीह देते हैं जो बड़े नाम वाले हैं. नए प्रकाशन सोशल मीडिया, पैकेज और ऑनलाइन के त्रिकोण -बहुकोण से मांग और पूर्ति का संतुलन होता है. अब किताब खरीद कर पढ़ने की इच्छा और शौक भी गिने चुनों को है. ऐसे समय में समय-साक्ष्य से मेरी सात कहानियों का संग्रह “चांचरी” के नाम से प्रकाशित होना ‘पॉइंट ऑफ़ ब्लिस’ की ओर तो ले ही गया.
(Chanchree Book Review)

“चांचरी” में संग्रहित कहानियों की कहानी के लिए कहना है कि मैं कभी अपने एक मित्र के यहां गया था जिनका घर बाजार में मोटर सड़क के किनारे था. वहां एक लावारिस कुत्ता दुर्घटना ग्रस्त हो गया था जिसने मेरे मन में ‘कलमुहें का मोल को जन्म दिया. नैनीताल की भीषण बारिश में एक बार हम कुछ लोग फंस गए थे. घंटों लाइब्रेरी के बरामदे में रुके रहे थे. बारिश रोकने के लिए हमने टोटका भी आजमाया था. इस घटना के बाद कहानी ‘सात काने और बरसात’ लिखी गई. डिग्री कॉलेज की कैंटीन में गर्ल्स रूम से एक कच्ची उम्र के वेटर को शर्म से लाल हुए बाहर निकलते देखा तो ‘बछिया लाड़’ प्रकट हो गई. जनपद पिथौरागढ़ के एक ग्राम ‘होकरा’ में जाने का अवसर मिला था. वहाँ ग्रामवासियों ने ‘चांचरी’ नृत्य प्रस्तुत किया था. यहीं से कहानी ‘चांचरी ‘ बनी. कहानी में गीत ग्रामवासियों का है और शेष मेरी कल्पना है. चीनी मिल बाजपुर में पहली गाड़ी को पुरस्कृत करने की परम्परा थी, जिससे प्रभावित हो कर मेरे बाबू पं. गोविन्द बल्लभ पंत ने एक कहानी लिखी. उन्होंने वह कहानी मुझको दी कि मैं पढ़ कर देख लूँ, उसमें चीनी मिल के दृष्टिकोण से कोई विसंगति तो नहीं है. पर मैंने अत्यंत व्यस्ततावश उस कहानी को फाइलों के ढेर के बीच कहीं रख दिया. फाइलें इधर उधर हो गईं और वह कहानी मुझे ढूंढे नहीं मिली. तब मैंने निर्णय लिया, मैं स्वयं ही कहानी ‘पहली गाड़ी’ लिख देता हूं. अपनी सेवा के दौरान एक सत्यनिष्ट किन्तु परेशान रहने वाले कर्मचारी को देख कर कहानी ‘दाह अकिंचन’ लिखी गई. स्टेट बैंक लखनऊ में उत्तराखंड के एक रिटायर्ड फौजी को बैंक के गार्ड के रूप में देख कर और पहाड़ के एक फटेहाल कुली की याद करके तथा पहाड़ों से हो रहे पलायन को दृष्टिगत करते हुए कहानी ‘दौलतराम’ बन गई.”

अजीबोगरीब फंतासियों से परे जीवन पंत की कहानियाँ एक गहरे मर्म को भेदती पर्त दर पर्त उस परिवेश को जीवंत कर देती हैं जिसकी चुभन आम जन महसूस करता है. वह अनगिनत समस्याएं उठाते पात्र रख देते हैं घटनाओं के प्रसंग रचते हैं पर उनके निदान के लिए समाधान के लिए कोई नैतिक मापदंड की वकालत नहीं करते और न ही कोई ऐसा ब्लैक होल रचते हैं जैसा समकालीन हिंदी रचनाओं में महसूस किया जा रहा है. उनकी आम बोल चाल की भाषा उस परिवेश को रचने वाली शैली से जुड़ते सीधी सी बात कहते बड़ा प्रभाव पैदा कर देती है.

जीवन पंत की कहानियों में उनके द्वारा विकसित प्रयोगधर्मिता है जो साहित्य में उनकी गहरी पैठ व रंगमंच के सुदीर्घ अनुभव से उत्पन्न हुई है. धर्म और जाति के टंटों को उठाते इनके पीछे निहित स्वार्थो की आड़ में किस तरह लगातार अपने हित साधने वाला चरित्र लगातार हावी हो जाता है इसके क्षेपक वह बड़ी सहजता से दिखा जाते हैं. लगातार अध्ययन मनन में डूबे जीवन पंत अपने स्वभाव और बोलचाल में जितने सरल हैं उनका रचना संसार भी धीमी लय से, मंद गति से, सहजप्रवाह से आकर्षित कर ले जाता है. संभवत: इस कारण से कि इनका धरातल शाब्दिक जीवन प्रतिबिम्ब पर टिका है मानवीय संवेदना से परिपूर्ण अपने आस पास के परिवेश को सजीव रूप से उभारने में समर्थ.
(Chanchree Book Review)

‘चांचरी’ का प्रकाशन समय साक्ष्य, देहरादून द्वारा किया गया है. यह अमेजन पर ₹200 पेपरबैक में उपलब्ध है.

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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