प्रमोद साह

उत्तराखंड की जमीन और जमीर को बचा सकती है चकबंदी

इन दिनों उत्तराखंड की सामरिक और सामाजिक महत्त्व की भूमि को बचाने के लिए “विशेष भूमि कानून” की मांग की मुहिम सोशल मीडिया में चल रही है. यह एक जरूरी मुहिम है मगर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है. पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी का लागू होना बगैर चकबंदी लागू हुए पहाड़ों में हजारों नाली बंजर पड़ रही कृषि भूमि को हम आबाद नहीं कर पाएंगे, फसल अथवा कृषि ही धरती का श्रृंगार है.
(Chakbandi in Uttarakhand)

जब हम किसी खेत में फसल बोते हैं, तो उससे हम सिर्फ उपज प्राप्त नहीं करते बल्कि जमीन की जुताई, बुवाई और निराई के द्वारा उस मृदा (मिट्टी) की आवश्यकता और गुणवत्ता का भी संवर्द्धन करते हैं. जो अंततया जल श्रोतों को जागृत कर पर्यावरण संतुलन का कारण बनते हैं. आबाद खेतों से निराई के बहाने झाड़-फूंस और सूखी पत्तियां हटती हैं जिससे जंगलों की आग बचती है. कुल मिलाकर खेती प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण का एक बड़ा सेतु है.

यह एक बड़ा सुंदर संयोग है कि पहाड़ में निवास कर रहे 90 प्रतिशत से अधिक लोग भूमिधारी किसान हैं, मगर छोटी और बिखरी जोत के कारण ही पर्वतीय खेती अपने बच्चों को अपनी जमीन पर रोक पाने में कामयाब नहीं हो रही. परिणाम स्वरूप “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती” यह लोकोक्ति आज भी चलन में है जो काफी हद तक सत्य है.

उपेक्षित पड़ी पहाड़ की हजारों हजार नाली कृषि योग्य भूमि आज बंजर पड़ गई है. उत्तराखंड के 9 पर्वतीय जनपदों में आज अनुमानित आबादी 45 से 50 लाख के मध्य हैं जबकि उत्तराखंड के प्रवासी उत्तराखंडियों की जनसंख्या 75 लाख से अधिक है. विशुद्ध पर्वतीय क्षेत्रों के जितनी आबादी है, उससे डेढ़ गुना आबादी आज उपेक्षित पड़ी खेती के कारण प्रवासी का जीवन यापन कर रही है. पलायन आयोग की रिपोर्ट में भुतहा गांव की संख्या 1048 से अधिक हो गई है, जो कुल गांव की है संख्या का लगभग 7 प्रतिशत है.
(Chakbandi in Uttarakhand)

जहां तक पलायन का संदर्भ है, पलायन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन जिस राज्य में 25 से 35 वर्ष की आयुवर्ग के 52 प्रतिशत लोग पेट के लिए पलायन कर रहे हों, आठ प्रतिशत आबादी बंदर और सूअर के कारण पलायन कर गई हो, जिस राज्य की आधी से अधिक आबादी स्वर्ग सा जीवन छोड 10 गुणा 10 फिट के एक कमरे में नरकीय जीवन जीने को मजबूर हो उस राज्य के नीति नियंताओं के लिए बंजर पड़ती भूमि के कारण यह आंकड़े शर्मसार करने वाले ही हैं.

आज चकबंदी को उत्तराखंड की बहुत सी समस्याओं के समाधान के रूप में देखा जा रहा है. कम से कम यह तो कहा जा सकता है कि पेट के लिए जो पलायन है उसे उत्तराखंड की चकबंदी रोक सकती है. उत्तराखंड में चकबंदी हो इसके संघर्ष का इतिहास अब लगभग 45 वर्ष पुराना होने जा रहा है. गणेश गरीब, ग्राम सूली ब्लॉक कल्जीखाल पौडी गढवाल, जब दिल्ली में छोटा रेडियो बनाकर फेरी लगाते थे तो बार-बार उनके जमींदार आत्म सम्मान को ठेस पहुंचती थी. वह तब बहुत छोटे कमरों में तंग जिंदगी जी रहे थे.

उन्होंने प्रगतिशील गढ़वाल महासभा की दिल्ली में स्थापना करने के साथ ही अखिल भारतीय प्रगतिशील गढ़वाली महासभा को स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा जी के संरक्षण में स्थापित कर, पहाड़ में चकबंदी के लिए जागरूकता अभियान चलाया लेकिन दिल्लीवासी होने के कारण जमीन में उलहाने सहन करने पड़े.
(Chakbandi in Uttarakhand)

जिस कारण 26 जनवरी 1981 को गणेश गरीब अपनी पूरी घर-गृहस्थी के साथ चकबंदी के सपने को साकार करने के लिए वापस अपने गांव आ गए. अपने गांव में उन्होंने स्वैच्छिक चकबंदी के लिए लोगों को प्रेरित किया और खुद तथा 14 अन्य परिवारों को शैक्षिक चकबंदी के लिए राजी कर लिया. उन्होंने खुद 18 नाली जमीन से चकबंदी ग्राम सूल, कल्जीखाल में प्रारंभ की. लगातार एक लड़ाई चलती रही. पहाड़ों में सरकारी प्रयासों से चकबंदी हो इसके लिए वह 1987 में स्वर्गीय राजीव गांधी से मिले जिन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी के लिए निर्देशित किया.

तब पर्वतीय विकास मंत्री बलदेव सिंह आर्य और गोविंद सिंह मेहरा आदि के प्रयासों से गढ़वाल मंडल का चकबंदी कार्यालय पौड़ी और कुमाऊं मंडल के लिए चकबंदी कार्यालय रानीखेत में खोला गया . इधर पौडी के विधायक पुष्कर सिंह रौथाण, जो कि पर्वतीय चकबंदी विकास परिषद के अध्यक्ष और रमेश पोखरियाल निशंक जिसके सचिव थे, ने पर्वतीय चकबंदी की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया.

कुमाऊं मंडल में केवलानंद तिवारी जो कि अरुणाचल प्रदेश सरकार में उद्यान विभाग में अधिकारी थे जो बिखरी पर्वतीय खेती को बहुत घाटे का सौदा बता रहे थे, ने सरकार से पर्वतीय क्षेत्र में चकबंदी लागू करने, बागवानी बड़ाने के लिए अपने स्तर से प्रयास शुरू किए.

केवलानंद तिवारी ने रानीखेत के पास अपने ग्राम झलूडी की लगभग 4 हजार नाली भूमि के किसानों को स्वैच्छिक चकबंदी के लिए तैयार किया. इधर 1997 में पर्वतीय क्षेत्र में अलग चकबंदी कानून की सिफारिश के साथ अल्मोड़ा और रानीखेत के चकबंदी कार्यालय बंद हो गए, राज्य गठन के बाद चकबंदी का सवाल पिछड़ गया. लेकिन जमीन में गणेश गरीब, कपिल डोभाल और केवलानंद तिवारी जैसे संकल्प के धनी व्यक्ति इस मुहिम को आगे बढ़ाने में लगे रहे तमाम संघर्षों के बाद 2016 में चकबंदी के उद्देश्य से एक ” चकबंदी एंव भूमि ब्यवस्था ” विधेयक तैयार हुआ, जिसमें स्वैच्छिक चकबंदी को प्रोत्साहित करने की भावना थी.
(Chakbandi in Uttarakhand)

लेकिन तमाम राजनीतिक और व्यवहारिक अडचनों के कारण चकबंदी अधिनियम जमीन पर अपना असर नहीं दिखा सका. सरकार परिवर्तन के साथ इस अधिनियम में भी परिवर्तन हुआ अब 2019 में “उत्तराखंड कृषि भूमि एवं भू राजस्व अधिनियम 2019” का प्रारूप तैयार है. जिसमें 23 अध्याय और 171 धाराएं हैं.

गरीब क्रांति अभियान के कपिल डोभाल जो देहरादून में पर्वतीय उत्पादों के प्रचलन को बढ़ाने के लिए अपना व्यवसाय कर रहे हैं. 84 वर्षीय गणेश गरीब ने पर्वतीय चकबंदी के लिए अपना पूरा जीवन दाव पर लगाए हुए हैं. वहीं केवलानंद तिवारी एक्ट पास होने के बाद भी जमीन पर चकबंदी की दिशा पर कोई काम न होने के कारण उच्च न्यायालय नैनीताल की शरण में हैं.

आप चंद संघर्षशील व्यक्ति उत्तराखंड में चकबंदी की मुहिम की अलख जगाए हैं, इस प्रयास के भगीरथ हैं. इन दिनों जब उत्तराखंड के लिए विशेष कानून की बात सोशल मीडिया में चल रही है. तब यह समझना जरूरी है कि धरती बगैर कृषि अधूरी है. कृषि बगैर लाभ के संभव नहीं है.

पहाड़ों में लाभकारी कृषि चकबंदी के बगैर संभव नहीं, पर्वतीय भूमि बचे, पहाड़ के लोगों का जमीर बचे, इसके लिए जरूरी है जमीन बचे. जमीन बची रहे इसके लिए जरूरी है पर्वतीय क्षेत्रों में अनिवार्य चकबंदी हो.
(Chakbandi in Uttarakhand)

प्रमोद साह

हल्द्वानी में रहने वाले प्रमोद साह वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत हैं. एक सजग और प्रखर वक्ता और लेखक के रूप में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफलता पाई है. वे काफल ट्री के नियमित सहयोगी.

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इसे भी पढ़ें: उत्तराखंड में वन्यजीव संघर्ष, पर्यावरण और समाज का मिश्रित सवाल

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