कॉलम

यह उन्हीं दिनों की बात है – पंतनगर में दुष्यंत कुमार और वीरेन डंगवाल

कहो देबी, कथा कहो – 24 पिछली कड़ी:कहो देबी, कथा कहो – 23, कब्बू और शेरा हां, उन्हीं दिनों की…

7 years ago

समूचा हिंदुस्तान नजर आता है ‘बावर्ची’ फिल्म में

बावर्ची (1972) विघटित होते पारिवारिक मूल्यों की पुनर्स्थापना को लेकर आई एक नए मिजाज की फिल्म थी. तब के दौर…

7 years ago

सुतली उस्ताद और फेसबुक

जल के असंख्य नाम होते हैं. मेरे एक परम सखा के भी ऐसे ही असंख्य नाम हैं. कोई तीसेक साल…

7 years ago

कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 68

डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है - “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि…

7 years ago

बिना दूल्हे वाली बारात की भी परम्परा थी हमारे पहाड़ों में

अक्सर हमें अपने बड़े-बूढ़ों से सुनने को मिलता है कि एक ज़माने में सैनिकों या किसी अन्य वजह से घर…

7 years ago

जौनसार बावर के लोक गायक और उनके गीतों की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता

इंटरनेट और सोशल मीडिया के अस्तित्व में आने के बाद से जौनसार बावर में गीत गाने वालों की बाढ़ सी…

7 years ago

पहाड़ी फौजी की कथा मारफ़त छप्पन ए. पी. ओ.

फ़ौज की मुश्किल नौकरी से छुट्टियों के लिए पहाड़ के घर लौट रहे एक मामूली सिपाही से अपनी कविता 'रामसिंह'…

7 years ago

कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 67

डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है - “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि…

7 years ago

बावन सेज, तिरसठ आँगन, सत्तर ग्वालिन लूट लिए

साधो हम बासी उस देस के – 7 -ब्रजभूषण पाण्डेय (पिछली कड़ी : स्वस्थ बातचीत का वर्जित विषय ) साँकल…

7 years ago

कुमाऊनी लोकोक्तियाँ – 66

डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ने एक जगह लिखा है - “लोकोक्तियाँ मानवीय ज्ञान के चोखे और चुभते सूत्र हैं.” यदि…

7 years ago