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जौनसार बावर के लोक गायक और उनके गीतों की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता

इंटरनेट और सोशल मीडिया के अस्तित्व में आने के बाद से जौनसार बावर में गीत गाने वालों की बाढ़ सी आ गयी है. गीत गाना और उन्हें रचना अपने आप में एक कलात्मक अभिव्यक्ति है. गीत गाने या रचने वाले से ऐसी उम्मीद की जाती है कि अगर वह कुछ नया रचता है तो उसके रचे गीतों में उस समाज और संस्कृति की ईमानदार झलक हो जिसके लिए वह गीत रच या गा रहा है. अगर वो पुराने और पारंपरिक गीतों को गाता है तो वो उसकी मौलिकता से छेड़छाड़ किए बगैर उन्हें उसी रूप में प्रस्तुत करे जिस रूप में वह अपने अतीत से चला आ रहा है.

लेकिन आजकल जौनसार बावर में यह देखा जा रहा है कि सांस्कृतिक प्रदर्शन के नाम पर कुछ गायक या तो ऊटपटांग, बिना सिर-पैर के गीत बना और गा रहे हैं या फिर पारंपरिक गीतों को आधे-अधूरे और इतने बेहूदा तरीके से गा रहे है कि सुनने पर ये गीत औचित्यहीन लगने लगते हैं. गीतों का सत्यानाश करने के बाद फिर सास्कृतिक मंचों के माध्यम से तुर्रा यह कि हम तो जौनसार बावर की संस्कृति के वाहक है.

मत भूलिए, जौनसार बावर में अतीत के दौरान सादे संगीत के साथ गाए जाने वाले गीतों की खासियत यह थी कि ये गीत स्थानीय समाज के मनोरंजन की सामूहिक अभिव्यक्ति हुआ करते थे जो कि अधिकतर गांवों में आज भी देखे और सुने जा सकते है. जौनसार बावर के यह पारंपरिक गीत अतीत में घटी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक घटनाओं की जानकारी के हस्तांतरण का ऐसा माध्यम है जिसे वरिष्ठ पीढ़ी पारंपरिक जलसों और उत्सवों के दौरान नाचते गाते हुए अपनी युवा पीढ़ी को सौंप देती है. जौनसार बावर के यह लोक गीत केवल मनोरंजन भर का साधन नहीं बल्कि अपने आप में इस क्षेत्र के ऐतिहासिक दस्तावेज है.

भले ही इन में से बहुत से गीतों में अतिशयोक्ति और व्यक्तिगत महिमा मंडन होता है लेकिन फिर भी ये गीत अपने आप में स्थानीय परिवेश की साहित्यिक कृतियां हैं. जौनसार बावर के इन पारंपरिक गीतों को यदि संयम के साथ शुरू से आखिर तक सुना जाय तो पता चलता है कि काव्यात्मकता के द्वारा कैसे एक घटना का विवरण सैकड़ों सालों के बाद भी ताजगी के साथ दिया जा सकता है. लोकोक्तियों से सुसज्जित गीतों के बोल सुनने के बाद हम अपनी उस भाषाई समृद्धि का आंकलन कर सकते हैं जो आज लगभग खत्म होने की कगार पर खड़ी है. गीत किसी भी समाज की संस्कृति का प्रतिबिंब होते हैं लेकिन आज के समय में सब कुछ बड़ी तेजी के साथ बदल रहा है. संसाधनो से लैस दुनिया भर की राष्ट्रीय भाषाओं के अतिक्रमण ने लोक भाषाओं के अस्तित्व संकट में डाल दिया है. आज की तारीख में दुनिया भर में ऐसे लोगों का एक बड़ा प्रतिशत हो गया है जो सांस्कृतिक रूप से अनाथ है. जौनसार बावर के तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के चलते मेलों और त्यौहारों के दौरान सामूहिक रूप से गीत गाने का चलन दिन प्रतिदिन कम होता जा रहा है. इसका दोष किसी एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता.

पारंपरिक त्यौहारों के प्रति उदासीनता और तकनीक की सुलभता के चलते एकल गायन के आकर्षण ने जोर पकड़ लिया है. युवाओं में धीरे-धीरे मेलों और त्यौहारों में शिरकत करने का शौक खत्म होता जा रहा है. उनके नृत्य की अभिव्यक्ति के दायरे सामुदायिक आंगन से सिमट कर कमरे के अंदर आ गये हैं. हर व्यक्ति अपने मोबाइल में सैकड़ों गाने लिए फिरता है. ऐसी स्थिति में गीत गाने वालों के लिए यह सुनहरा मौका है. उन्हें चाहिए कि वे इसका भरपूर लाभ उठाएं. जौनसार बावर की सांस्कृतिक बागडोर गांव के दैवीय प्रांगण से उन लोगों के हाथ आने वाली है जो संगीत को अपना सबकुछ समझते हैं.

टौंस और यमुना के इस भू-भाग में ऐसे बहुत से गायक हैं जो बहुत अच्छा गाते हैं. वे चाहें तो वे जौनसार बावर के भाषाई दूत बन सकते हैं. उन्हें चाहिए कि किसी की नकल से बचें और समाज के प्रति मानवीय और संवेदनशील नजरिये को मद्देनजर रखते कुछ नया सृजित करने के लिए मेहनत करें. जौनसार बावर में रतन सिंह जौनसारी द्वारा रचित गीत जौनसार बावर के नव सृजित गीतों के उत्कृष्ट उदाहरण है. अगर कोई पारंपरिक गीतों को गाना चाहता हैं तो उसे चाहिए कि वो इन गीतों को शुरू से अंत तक पूरा गाएं, ताकी उनकी मौलिकता बनी रहे. इसमे समय ज्यादा लगता हो तो लगने दें. जौनसार बावर के प्रति यही सच्ची सांस्कृतिक प्रतिबद्धता होगी. अगर इसमें हिचके तो समझ लिजिए कि जौनसार बावर की संस्कृति की जघन्य हत्या का अपराध केवल और केवल उनके सर होगा जो गीतों के माध्यम से इस क्षेत्र की संस्कृति के झंडे को उठाने का दावा कर रहे हैं.

 

स्वयं को “छुट्टा विचारक, घूमंतू कथाकार और सड़क छाप कवि” बताने वाले सुभाष तराण उत्तराखंड के जौनसार-भाबर इलाके से ताल्लुक रखते हैं और उनका पैतृक घर अटाल गाँव में है. फिलहाल दिल्ली में नौकरी करते हैं. हमें उम्मीद है अपने चुटीले और धारदार लेखन के लिए जाने जाने वाले सुभाष काफल ट्री पर नियमित लिखेंगे.

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Sudhir Kumar

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