कला साहित्य

चंद्रकुंवर बर्त्वाल की कविता ‘काफल पाक्कू’

हे मेरे प्रदेश के वासीछा जाती वसन्त जाने से जब सर्वत्र उदासीझरते झर-झर कुसुम तभी, धरती बनती विधवा सीगंध-अंध अलि…

5 years ago

प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

तुम्हारी निश्चल आंखेंचमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश मेंप्रेम पिता का दिखाई नहीं देताईथर की तरह होता हैजरूर…

5 years ago

ज्ञानरंजन की कहानी ‘पिता’

उसने अपने बिस्तरे का अंदाज लेने के लिए मात्र आध पल को बिजली जलाई. बिस्तरे फर्श पर बिछे हुए थे.…

5 years ago

शेखर जोशी की कहानी ‘बदबू’

एक साथी ने उसकी परेशानी का कारण भाँप लिया था, “ऐसे नहीं उतरेगा मास्टर. आओ, तेल में धो लो”, कहकर…

5 years ago

पहल पत्रिका के आखिरी अंक से हरि मृदुल की कहानी ‘बाघ’

मुझे अपने बूबू (दादा जी) की खूब याद है. अब तो उन्हें गुजरे हुए भी चालीस साल के ऊपर हो…

5 years ago

गाली में भी वात्सल्य छलकता है कुमाउनी लोकजीवन में

किसी भी सभ्य समाज में गाली एक कुत्सित व निदंनीय व्यवहार का ही परिचायक है, जिसकी उपज क्रोधजन्य है और…

5 years ago

कहानी : प्लेग की चुड़ैल

प्लेग महामारी के समय की व्यथा कहती मास्टर भगवान दास की यह कहानी 1902 में 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित हुई…

5 years ago

शेखर जोशी की कहानी ‘गलता लोहा’

मोहन के पैर अनायास ही शिल्पकार टोले की ओर मुड़ गए. उसके मन के किसी कोने में शायद धनराम लोहार…

5 years ago

एक शब्दहीन नदी: हंसा और शंकर के बहाने न जाने कितने पहाड़ियों का सच कहती शैलेश मटियानी की कहानी

'माई डियर हंसा!''ले प्यारी, इस दफा तेरे आर्डर की मुताबिक, खुले पोस्टकार्ड की जगह पर, बंद इंगलैंड लेटर भेज रहा…

5 years ago

डूबना एक शहर का : प्रसंग टिहरी

अपने डूबने में यह हरसूद का समकालीन थाशहरों की बसासत के इतिहास को देखें तोयह एक बचपन का डूबना था(Poem…

5 years ago