समाज

महिलाओं के हिस्से है पहाड़ की खेती

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भारतवर्ष के अन्य पर्वतीय प्रदेषों की भांति कृषि उत्तराखंड की अधिकांश जनसंख्या के जिविकोपार्जन का मुख्य व्यवसाय हैं. पर्वतीय कृषि, भूमि, वन एवं पशु सम्पदा के समन्वय से प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग एवं नियोजन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती है एवं पर्वतीय कृशि का अस्तित्व वनों के बिना सम्भव नही हैं. सामान्यतः इस क्षेत्र की कृषि का 80 प्रतिशत से भी अधिक भाग वर्षा पर आधारित है. सिंचाई के साधनों की उपलब्धता मात्र नदी घाटी वाले क्षेत्रों में 10-15 प्रतिशत कृषि भूमि में ही उपलब्ध है. यहां के अधिकतर खेत छोटे, ढा़लदार व सीमित सिंचाई वाले है. इस क्षेत्र की विशिष्ट भू-आकृति, मौसम, मृदा, वनस्पतियों इत्यादि की प्रचुर विविधताओं के फलस्वरुप कृषि भूमि के उपयोग एवं फसलों में भी विविधतायें देखने को मिलती है.
(Agriculture in Uttarakhand Problems Suggestion)

वर्षा आधारित भूमि में दो वर्ष में तीन फसलें एवं सिंचित भूमि में प्रतिवर्ष 2-3 फसलें ली जाती है. उत्तराखंड में कृषि फसलों की प्रचुर जैव विविधता विद्यमान है, तथा लगभग 40 प्रजातियों की फसलें (अनाज, दलहन, तिलहन, मसाले इत्यादी) उगाई जाती है. जिसमें कि ‘‘बारहनाजा’’ (वर्ष भर में 12 विभिन्न फसलों के मिश्रण) प्रथा आज भी पर्वतीय क्षेत्र के दूरस्थ इलाकों में देखने को मिलती है. बेमौसमी सब्जी, फल, औषधीय व सुगन्धित पौधों के उत्पादन के लिये उत्तराखण्ड में उपलब्ध अद्वितीय भौतिकी व जलवायु इस क्षेत्र की विशेषता है. गेहूं एवं धान हमारे प्रदेश की मुख्य फसलें हैं जो कि सकल कृषि भूमि का क्रमशः 82 प्रतिशत एवं 40 प्रतिशत भाग घेरती है. सिंचित भूमि में यह फसलें एकल फसल के रूप में बोई जाती है जबकि बारानी भूमि में इन फसलों के साथ विभिन्न दलहनी (यथा उड़द, गहत, भट्ट, मसूर) तथा तिलहनी (सरसों, तिल) फसलें मिश्रित कर बोई जाती हैं. इस क्षेत्र के फसलों की औसत उत्पादकता 0.10-1.3 टन/हेक्टर/वर्ष मापी गई है.

पर्वतीय कृषि का अधिकतर भाग (70 प्रतिशत) छोटी जोतों वाली भूमि सीमान्त कृषकों के पास हैं. कृषि भूमि की जोतों का आकार बहुत छोटा (औसत 0.8 हैक्टेयर प्रति परिवार व कृषि भूमि सामान्यतः 1-2 वर्ग किमी के क्षेत्र में 10-15 छोटे-छोटे सीढ़ीनुमा खेतों में वितरित है) होने एवं उनमें भी पीढ़ी दर पीढ़ी पारिवारिक बंटवारे से खेतों का आकार इतना छोटा हो चुका है की उनकी जुताई एक समस्या बनती जा रही है. घर से दूर कृषि फसलों की जंगली जानवरों से रक्षा, सिंचाई साधनों का अभाव, प्रतिकूल मौसम (सूखा, ओलावृष्टि आदि) की मार से लोगों ने धीरे-धीरे घरों से दूर बारानी कृषि भूमि को स्थाई रुप से बंजर छोड़ना शुरु कर दिया है अतः यह क्षेत्र विवषतापूर्वक परती भूमि में तब्दील होते जा रहे है. बंजर भूमि का क्षेत्र वर्श दर वर्श बढ़ता जा रहा है.

पर्वतीय क्षेत्र में कृषि कार्य में पशुओं की अहम् भूमिका है. सामान्यतः हर घर में लगभग 5-7 निम्न गुणवत्ता वाले पशु पाले जाते है. गौ-वंशी पशुओं की संख्या घट रही है कृषि कार्य में प्रयुक्त बैलों की उपयोगिता लगभग सीमित हो चुकी है एवं इसके बदले बैलों की साझा जोड़ी रखी जा रही है, या किराये पर बैलों से खेतों की जुताई करवाई जाने लगी है. चारा एवं पेयजल की अनिश्चित आपूर्ति के फलस्वरूप पशुओं की संख्या भी घट रही है. कृषि भूमि की प्रति परिवार उपलब्धता कम होने से जिविकोपार्जन हेतु निवासियों की निर्भरता अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ती जा रही है. वनों पर वर्ष भर ईधन हेतु लकड़ी, चारे, बिछावन एवं अन्य सूक्ष्म वन उत्पादों के दबाव से सघन वनों के क्षेत्रफल में कमी आ रही है एवं विरल छत्रक वनों एवं परती भूमि का विस्तार हो रहा है. कृषि भूमि पर जनसंख्या निर्भरता का दबाव बढ़ रहा है एवं कृषि भूमि को शीत ऋतु में मौसमी परती छोड़ने की प्रथा (जो कि भूमि की उर्वरा षक्ति बनायें रखने की पारम्परिक प्रथा थी) कम हुई है. कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि, मृदा अपरदन की रोकथाम एवं भूमि में आर्द्रता संचित रखने हेतु परम्परागत कई उपायों का प्रचलन घट रहा है. हमारे प्रदेश में रासायनिक उर्वरकों की औसत खपत मात्र 8 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष है जो कि हमारे पड़ोसी प्रदेश हिमाचल का मुकाबले लगभग चार गुना कम है.
(Agriculture in Uttarakhand Problems Suggestion)

अतः कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने हेतु प्रयुक्त गोबर की खाद की लगभग 1.7-3.5 टन प्रति हैक्टेयर मात्रा प्रतिवर्ष प्रयोग में लाई जाती है. बांज के वनों को इस प्रयोजन हेतु सबसे उपयुक्त पाया गया है. लेकिन समय के साथ-साथ बांज के वनों पर अत्यधिक जैविक दबाव के चलते एवं इन वनों के लगातार सिकुड़ने से चीड़ वनों की बिछावन का अत्यधिक मात्रा में इस्तेमाल हो रहा है. चीड़ के वन अपने विषिष्ट गुणों के कारण एवं दावाग्नि हेतु अनुकूलन के चलते बांज वनों में घुसपैठ करके अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे हैं जिससे कि कृषि फसलों पर कीटजनित व्याधियां (यथा कुरमुला) का प्रकोप बढ़ रहा है. अतः विशेषज्ञों का मत है कि समय के साथ-साथ भूमि की औसत उत्पादकता में कमी आना अवष्यम्भावी है. वर्तमान में खाद्यान्न उत्पादन स्थानीय लोगों की जरुरत का मात्र आधा ही पूर्ति कर पाता है एवं खाद्यान्न की पूर्ति मुख्य रुप से प्रदेश के मैदानी इलाकों से आयात की जाती है. अतः स्पष्ट है कि पर्वतवासियों (मुख्यतः महिलाओं) की हाड़-तोड़ मेहनत के बावजूद भी परम्परागत कृषि तंत्र में इतनी क्षमता अब नहीं रह गई है कि वर्ष भर की खाद्यान्न जरुरत की पूर्ति हो सके. परिवार के भरण-पोषण हेतु युवाओं एवं पुरुषों केा देश के अन्यत्र स्थानों में आजिविका की तलाश में पलायन करना मजबूरी बन गया है.

उत्पादकता बढ़ाने के पूर्व में हुए उपायों में प्रमुखतः उन्नत कृषि बीजों एवं रासायनिक खाद का प्रचलन बढ़ा. लेकिन इसकी उपयोगिता मात्र सिंचित भूमि तक ही सिमित रही. बारानी कृषि में आज भी परम्परागत बीज ही ज्यादा विष्वसनीय है क्योंकि यह सूखे एवं व्याधियों को झेलने की क्षमता रखते हैं. गढ़वाल की हैवल घाटी में ‘‘बीज बचाओं आन्दोलन’’ के मुखिया बीजू नेगी के अनुसार परम्परागत बीज ही खाद्यान्न सुरक्षा एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु उत्तम हैं. पर्वतीय क्षेत्र में भूमि के स्वामी द्वारा भूमि में कृषि कार्य उपरोक्त वर्णित कारणों से छोड़ देने के पश्चात भी कृषि मजदूरों के लिए यह प्रथा लाभकारी नहीं है जबकि देश के मैदानी हिस्से में भू-स्वामी अपनी कृषि भूमि को मजदूरों के माध्यम से भी उत्पादन में लाकर आय अर्जित कर सकता है. अतः शारीरिक रूप से मजदूरी हेतु सक्षम लोग भी कृषि क्षेत्र में मजदूरी करके जिविकोपार्जन नहीं कर सकते एवं देश के अन्यत्र इलाकों में आजिविका पलायन करना एकमात्र विकल्प रह गया है. अतः कृषि कार्य का पूरा भार अब अधिकांशतः महिलाओं पर आ टिका है. लोग पुश्तैनी कृषि एवं पशुपालन कार्य को छोड़ आजिविका हेतु अन्य धन्धे अपना रहे हैं. कहीं-कहीं तो गांवों की सम्पूर्ण कृषि भूमि का 60 प्रतिशत से भी अधिक भाग परती भूमि में बदल चुका है.
(Agriculture in Uttarakhand Problems Suggestion)

बढ़ती हुई जनसंख्या (जो कि पिछले दशक में 19.3 प्रतिशत बढ़ी है) के फलस्वरुप खाद्य पदार्थ, ईधन, पशुधन के लिए चारा एवं अन्य वन्य उत्पादों की खपत बढ गई है. गांवों में अधिकांश महिलाएं व वृद्ध लोग ही रह चुके हैं.

अतः सदियों से स्थानीय निवासियों का भरण-पोषण करने वाले ‘‘कृषि-पशुधन-वनों के अन्र्तसम्बन्ध’’ पर आधारित परम्परागत कृषि तंत्र लड़खड़ा चुका है. इस क्षेत्र के लोगों में आधुनिक तकनीकी, जैसे- खेती का तरीका, खाद्य प्रसंस्करण मूल्य वर्धन, गुणवत्ता में सुधार, पैकेजिंग, विपणन आदि की जानकारी की कमी है. पुनः बुनियादी सुविधाओं जैसे यातायात, भंडारण, विपणन की अच्छी व्यवस्था न होने से काश्तकारों को उनकी मेहनत व कृषि उपज का वाजिब मूल्य नही मिलता है एवं बिचैलिए मुनाफा कमा रहे हैं. अक्सर कृषि उत्पाद व कच्चा माल मध्यस्थ व्यक्ति के हाथों बेच दिया जाता है. अतः कृषि, पशुपालन वानिकी, फलोत्पादन एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं नियोजित विकास एवं उपभोग हेतु महिलाओं को तकनीकी रूप से सशक्तिकरण की महत्ती आवश्यकता है.

पर्वतीय कृषि के टिकाऊ विकास के लिए निम्नलिखित सुझावों पर ध्यान देने की आवश्यकता है –

1. परम्परागत कृषि फसलों/प्रजातियों का संरक्षण व विकास, गुणवत्तायुक्त बीजों व रोपण सामग्री की सुगम उपलब्धता, मानव संसाधन का प्रशिक्षण, कौशल विकास व प्रदर्शन, देशज ज्ञान को प्रोत्साहन. प्रत्येक जिला/ब्लाक स्तर पर आधुनिक तकनीकी जानकारी से परिपूर्ण कृषि संसाधन केन्द्रों व उप केन्द्रों की श्रृंखला की स्थापना जहां पर विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्र के अनुसार फसलों व कृषि प्रणाली विशेष के लिए नवीनतम सूचना व संसाधन उपलब्ध हों.

2. पर्वतीय क्षेत्र की विषिष्ट पारिस्थितिकी एवं जलवायु का पारंपरिक जैविक खेती हेतु उचित व लाभकारी उपयोग कर अनाज, बागवानी, बेमौसमी सब्जियों एवं औषधीय एवं सगन्ध पौधों एवं स्वास्थ्यवर्धक खाद्यों एवं फल व सब्जी के उत्तम बीजों तथा फलों की पौधों का उत्पादन.

3. बारानी भूमि में कृषि उत्पादन बढा़ने, मृदा जल संरक्षण, हानिकारक कीट व फसल रोगों के नियन्त्रण एवं मृदा के पोषक तत्वों में वृद्धि के लिए एकीकृत प्रबंधन. जैविक खेती, न्यूनतम जुताई, खरपतवार बिछावन, संरक्षित कृषि अपनाने के लिए कृषकों को प्रोत्साहित करना एवं आधुनिक कृषि उपकरणों को मानव श्रम एवं समय की बचत हेतु उपलब्ध कराना.

4. मौजूदा पशुधन विकास कार्यक्रमों को मजबूत करने, पशु रोगों की रोकथाम, चारा व पशुओं के पौष्टिक आहार का विकास एवं सम्बन्धित सुविधाओं का उन्नयन. सामुदायिक बंजर भूमि में चारागाह एवं बहुउद्देशीय वनों का विकास जिससे कि सरकारी वनों पर ईधन, चारा, बिछावन, आदि के दबाव को कम किया जा सके.

5. कृषि-जलवायु क्षेत्र विशेष के आधार पर किसान सहकारी समितियों के द्वारा कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण, परिरक्षण, मूल्यवर्धन, पैंकिजिंग व विपणन, बाजार में कृषि उत्पादों की बिक्री का प्रबन्ध व परिवहन सुविधायें एवं रियायती दर पर बिजली उपलब्ध कराना तथा प्रगतिशील किसानों को जो कि जैविक कृषि, मृदा व जल संरक्षण के उपाय अपनाते है उन्हें प्रोत्साहित करना, आदि. इस संदर्भ में राज्य सरकार द्वारा लागू की गई कृषि एवं बागवानी बीमा योजना के अच्छे परिणाम होंगें.

6. तकनीकी समझ, योजना निर्माण व निर्णय क्षमता के लिए महिलाओं को सक्षम बनाने व सशक्तीकरण के लिए महिला केन्द्रित कार्यक्रमों की आवश्यकता है. हांलाकि इस बात का ध्यान रखा जाए कि कृषि एवं अन्य घरेलू कार्य का जो बोझ उनके उपर है उन पर उक्त कार्यक्रमों का अतिरिक्त बोझ न पड़े.
(Agriculture in Uttarakhand Problems Suggestion)

डॉ. गिरीश नेगी

डॉ. गिरीश नेगी का यह लेख हमें काफल ट्री की ईमेल आईडी पर प्राप्त हुई है. डॉ. गिरीश नेगी से उनकी ईमेल आईडी negigcs@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें : उत्तराखण्ड में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

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