Featured

लोक वाद्य बनाने और बजाने का प्रशिक्षण देने वाली कार्यशाला

भाव राग ताल नाट्य अकादमी पिथौरागढ एवं ओएनजीसी देहरादून के सहयोग से विलुप्त होते जा रहे लोकपर्व जैसे साँतु-आँठू और हिलजात्रा को संरक्षित करने हेतु कार्यशाला का आयोजन किया गया. यह कार्यशाला का द्वितीय चरण है.
(Workshop for making and playing Folk Instruments)

कार्यशाला में वाद्ययंत्रों को बनाना व वाद्ययंत्रों को बजाने का प्रशिक्षण दिया गया, साथ ही वाद्ययंत्रों में बजाये जाने वाले बोलों या तालों का लिपिबद्धकरण किया गया. संस्था द्वारा कार्यशाला के प्रथम चरण में मुखौटे निर्माणीकरण की कार्यशाला का आयोजन किया गया.

पिथौरागढ जिले की बोकटा ग्रामसभा के सूनी गांव तथा बसौड़ ग्रामसभा के जगतड़ी गांव में कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें ग्रामीणों ने बड़-चढ़कर प्रतिभाग किया.

द्वितीय चरण की इस कार्यशाला में नये ग्रामीण युवाओं को, वाद्ययंत्र बजाने वाले अनुभवी कलाकारों के द्वारा विभिन्न प्रकार की तालों से प्रशिक्षण तथा सम्पूर्ण रुप से जानकारी दी गयी.
(Workshop for making and playing Folk Instruments)

संस्था ने नये युवा पीढ़ी को अपनी लोक कलाओं को सहेजने तथा परम्पराओं को बढ़ावा देने के लिए ओएनजीसी देहरादून के सहयोग से ग्रामीण युवाओं के साथ ग्राम में रहकर कार्यशाला का आयोजन किया. संस्था कार्यशाला से मिली जानकारी को पुस्तक के रुप में प्रकाशित तथा डाक्यूमेंट्री के माध्यम से सहेजने का कार्य कर रही है.

गाँव के बुजुर्गो के द्वारा संस्था को साधुवाद दिया गया तथा उनके द्वारा आग्रह किया गया कि लोक कलाओं व लोक परम्पराओं को बचाने हेतु सरकार को भी इस तरह की कार्यशाला का आयोजन ग्रामीण क्षेत्रों में किया जाना चाहिए.
(Workshop for making and playing Folk Instruments)

काफल ट्री डेस्क

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

1 week ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

1 week ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

2 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

2 weeks ago