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मेरे मोहल्ले की औरतें

मेरे मोहल्ले की औरतें, जो एक दूसरे से काफी अलग है. अलग स्वभाव, कद-भी  एकदम अलहदा, अलग-अलग सोच. कुछ जुबान की मीठी कुछ बड़ी चंठ सी. कुछ अपने से अपने तक मतलब रखती हैं और कुछ घर के अंदर बैठकर भी बोल रही हों तो आवाज चली जाती है चार मकान पार तक. दिन भर इनके चहकने से लेकर इनके चिढ़चिढ़ाई के निशान पूरे मोहल्ले में सुनाई देते हैं. (Women in my neighborhood)

लेकिन अक्सर देखा गया है इनके चहकने का समय सुबह-सुबह नहीं होता क्योंकि सुबह तो यह अक्सर चिढ़चिढ़ाई दिखती हैं पर क्या वजह सुबह-सुबह चिकर-चिकर करने की. खैर वजह तो काफी सारी हैं.

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अलग-अलग घर की औरत की अलग कहानी है. किसी के बच्चे के स्कूल की बस छूटने को है और किचन में रखा दूध उबलता हुआ गिर कर आधा हो गया है. या फिर किसी को प्रातः वंदना के लिए देर हो गई है, क्योंकि मोटर के 1 घंटे से ऊपर चलने पर भी अभी तक ताजा पानी नहीं आया. अब भगवान को स्नान कैसे कराया जाए? ऐसी ही सुबह की कई उलझनो में पड़ी यह औरतें अक्सर रोज सुबह चिढ़चिढ़ाती है. घर वाले खासकर बच्चे कहते रह जाते हैं कि सुबह-सुबह अलार्म की तरह क्यों बज रही हो? पानी ही तो है आ जाएगा. दूध ही गिरा है तो इसमें इतना बवाल क्या करना. सोचा जाए तो बात सही है , की पानी ही तो है या दूध ही तो है. पर क्या आपको सच में लगता है की बस इतनी सी ही वजह हो सकती है? बात दरअसल यह है कि दूध और पानी के इर्द-गिर्द ही इन औरतों की जिंदगी बन चुकी है. न जाने कितनी सुबहें इनकी जिंदगी की उबल कर गिरते हुए दूध और बाल्टी से छलकते पानी की तरह गुजर चुकी हैं और कई गुजरी दोपहरों का अवसाद उनके मन में इकट्ठा है.

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शायद कई रातों से खाते वक्त बने हुए खाने की तारीफ सुनने की लालसा से मिली निराशा कहीं इन औरतों के गले पर ठहर गई है. अब इन्हीं सबका मिला-जुला उफान सुबह-सुबह दूध, स्कूल बस और पानी के बहाने कहीं ना कहीं निकल जाता है.

लेकिन हां! शाम का वक्त एक ऐसा वक्त है जिसमें यह अक्सर चहकती हुई दिखती है. क्योंकि यह वक्त होता है इन औरतों के घर से बाहर निकलने का. यह अक्सर शाम के ही वक्त शीशे को देख, जरा सा खुद को संवारकर निकल पड़ती है. अपनी मोहल्ले वाली सहेलियों के साथ टहलने. और करती है तरह-तरह की बातें. दूसरों के घर से लेकर अपने घर की बातें, किसी तीसरे का मजाक बनाने से लेकर एक-दूसरे का मजाक बनाने तक और इस हंसी मजाक से लेकर अपने दुख-दर्द, भड़ास तक. यह शाम का वक्त पूरी तरह से इनका अपना वक्त होता है. और यही वह समय है जब यह चहकती हुई दिखती है. कुछ डेढ़ से दो घंटे ताजी हवा में अपनी सहेलियों के साथ समय बिताने के बाद इनका वक्त हो जाता है वापस घर आने का. और यह जुट जाती हैं रात के भोजन की तैयारी और अगले दिन के नाश्ते व लंच की चिंता में. खैर रात्रि भोजन होने तक यह निश्चय कर लेती हैं की नाश्ते में क्या बनाया जाएगा. जबकि अगले दिन के भोजन का विषय कई बार इनके सपनों में भी चलता रहता होगा.

और फिर आती है इनकी जिंदगी में एक और नई सुबह. जैसा कि मैं अक्सर कहती हूं कि एक नई सुबह का होना मेरी जिंदगी में एक नई उम्मीद के होने जैसा है. पर यह बात मैं इस बार नहीं कह सकती क्योंकि यह बात जिनके बारे में हो रही है वह है— मेरे मोहल्ले की औरतें. (Women in my neighborhood)

रामनगर की रहने वाली उपासना वैष्णव देहरादून में पत्रकारिता की छात्रा हैं. उपासना एक अच्छी अभिनेत्री होने के साथ ही अपने भावों को शब्द भी देती हैं.

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Sudhir Kumar

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